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लच्छू कोठारी और उसके सात बेवकूफ बेटे

अभी पिछले दशक तक की बात थी जब कुमाऊं के स्कूलों में मास्टर बच्चे की मूर्खतापूर्ण हरकत पर ताना देकर कहता – “तुझसे भली तो लच्छू कोठारी की संतान.” लच्छू कोठारी की संतानों के किस्से पहाड़ के हर घर में विख्यात हैं. हालांकि इसे कुमाउनी फिल्मों में लटू कोठारी, अज्जू कोठारी आदि के नाम से पात्र बना कर फूहड़ दृश्य रचे गये लेकिन लच्छू कोठारी की संतानों की सादगी और उनके कारनामों से उत्पन्न विनोद के करीब भी कोई नहीं पहुँच पाया.

पहाड़ों में शताब्दियों से चले आ रहे लच्छू कोठारी की संतानों के किस्से किसने गढ़े इसकी किसी को भी जानकारी नहीं है, न ही कोई इस बात को जानना चाहता है कि लच्छू कोठारी की संतानों के किस्सों की हकीकत क्या है. पहाड़ में किसी के द्वारा हद दर्जे की मूर्खता करने पर उसकी तुलना अक्सर लच्छू कोठारी की संतानों से की जाती है.

बहुत से पुराने बुजुर्गों से बातचीत के बाद एक बात जो समझ आई है वह यह कि लच्छू कोठारी कोई धनी और संपन्न व्यक्ति रहा होगा जिसके सात बेटे स्वयं से विद्वान किसी को नहीं समझते. उनके पास अपनी हर समस्या का मूर्खतापूर्ण समाधान होता. पहाड़ में लच्छू कोठारी की संतानों से जुड़े सैकड़ों किस्से हैं.

एक दिन लच्छू कोठारी ने अपने सातों लड़कों को सुई खरीदने बाजार भेजा. जब लड़कों को दुकानदार ने सुई दी दिखाई और उसका दाम दो पैसे बताया तो लच्छू कोठारी के लड़के दुकानदार से लड़ गये कि हमारे पिताजी ने हम सात लोगों को भेजा है और तुम हमें इतनी छोटी सी चीज दे रहे हो. बहुत समझाने पर भी जब लच्छू कोठारी के लड़के नहीं माने तो दुकानदार ने कहा कि तुम्हें बड़ी सुई तो दूंगा लेकिन वह बीस रुपये की है. लच्छू कोठारी के लड़के खुश हो गये. उन्होंने तुरंत दुकानदार को बीस रुपये पकड़ा दिये दुकानदार ने उन्हें एक बड़े पेड़ का सूखा तना पकड़ा दिया. अब लच्छू कोठारी के लड़के बड़े खुश हुये और कंधे में लकड़ी लिये घर पहुंच गये.

एकबार लच्छू कोठारी ने अपने बेटों को दूसरे गांव एक बैल लेने भेजा. सातों भाई दूसरे गांव बैल लेने गये. नुकीली सींगों वाला एक हष्ट-पुष्ट बैल सातों भाईयों को खूब भाया. बैल के मालिक को तय कीमत चुकाकर सातों भाई निकले अपने गांव की ओर. लम्बे पैदल मार्ग में एक ताल के किनारे सातों भाईयों ने बैठकर अपना खाना खाया और बैल को भी हरी घास दी गयी. खाना खाने के बाद तय हुआ कि अब बैल को पानी पिलाया जाय. सातों भाई बैल के साथ ताल किनारे आ गये. बैल ने पानी पीना शुरू किया और जैसा कि बैल करता है, उसने साथ में पेशाब करना भी शुरू कर दिया. लच्छू कोठारी का सबसे बड़ा भाई गुस्से से लाल हो गया. उसने भाइयों को कहा बैल के मालिक ने हमें ठग दिया. देखो यह बैल टोटा है इसके पेट में पानी ठहर ही नहीं रहा. बाकी भाईयों ने बड़े भाई से सहमति भरी और तुरंत बैल वापिस करने लौट पड़े.

इसी तरह एकबार लच्छू कोठारी ने अपने लड़कों को भाबर में जाकर नौकरी करने को भेजा. सातों भाई इस बार भाबर की ओर चल पड़े. सातों भाइयों ने खूब मेहनत की और पैसा कमाया. खूब सामान वगैरह लेकर एक दिन वे वापस गांव को चल दिये. लौटने से पहले तीनों भाइयों ने सबके लिये कुछ न कुछ ख़रीद लिया. मां की बारी आई तो भाइयों ने तय किया कि ईजा के लिये घाघरा लेकर जायेंगे. ईजा के लिये घाघरे का कपड़ा लिया गया. जैसे ही दर्जी के यहाँ पहुंचे तो दर्जी की दुकान बंद. भाईयों ने तय किया कि घाघरा वो सातों खुद सीलेंगे. सूई-तागे का इंतजाम हुआ और भाई बैठ गये सीलने. तभी मंझले भाई को याद आया कि बिना कमर की नाप के तो घाघरा सिला ही नहीं जा सकता. बड़ी देर की माथापच्ची के बाद तय हुआ कि ईजा की कमर साल के पेड़ की गोलाई के बराबर होगी. सातों भाई जंगल गये और साल के एक पेड़ के चारों ओर घाघरे का कपड़ा बांधकर घाघरा सील दिया. लच्छू कोठारी के लड़के घाघरा बना देख बहुत खुश हुये. अब बारी थी घाघरा निकालने की. भाईयों ने घाघरा निकालने के लिये साल का पेड़ काट दिया जिसमेंं घाघरा ही फट गया.

एक बार लच्छू कोठारी ने लड़कों के लिये कपड़े की दुकान डाल दी. सातों लड़कों को लच्छू कोठारी ने अच्छे से समझाया पांच रुपये का एक मीटर कपड़ा बेचना है. पांच सौ मीटर कपड़े की थान रखकर लच्छू कोठारी घर आ गया. उसके घर पहुंचे घंटा भर नहीं हुआ था सातों भाई हँसते खेलते घर के आँगन में पहुँच गए. इससे पहले लच्छू कोठारी कुछ समझता एक लड़के ने सीना फुलाकर कहा ‘बाबू सारा का सारा कपड़ा बेच दिया हमने.’ लच्छू कोठारी आश्चर्य से प्रसन्न हुआ. तभी बड़े लड़के ने आगे बढ़कर बाबू के हाथ में पैसों का थैला रखकर कहा ‘लो बाबू, एक रुपये के पांच मीटर के हिसाब से पूरे सौ रुपये.’ लच्छू कोठारी फिर सिर पकड़कर बैठ गया.

पहाड़ों में पाथर वाले मकान होते हैं. छत पर लगाने वाले इन पाथरों को सहारा देने के लिये बीचों बीच एक लम्बी मोटी लकड़ी डाली जाती हैं जिसे धूर कहते हैं. जिन जगहों पर दीमक अधिक लगता है सो इस लकड़ी को चार से पांच सालों में बदला जाता है. पहाड़ों में पहले जंगलों में चिरान लगता था जिसमें पंचायती जमीन में लगे पेड़ों का उपयोग गाँव वाले अपनी सुविधा ने अनुसार करते थे. एक बार लच्छू कोठारी को भी अपना मकान सुधारना था तो उसने अपने लड़कों को चिरान में धूर लेने के लिये भेजा. लच्छू कोठारी के लड़के जब धूर कंधे में रखकर लौटने लगे तो धूर की लम्बाई के कारण उन्हें बहुत दिक्कत होने लगी. एक भाई कहता कि मेरी तरह ज्यादा भार आ रहा है दूसरा कहता मेरी तरफ आ रहा है. लच्छू कोठारी के लड़कों ने समस्या का समाधान भी चुटकियों में निकाल दिया और धुर के सात टुकड़े कर, सातों भाई एक-एक टुकड़ा ले कर अपने घर पहुँच गये.

लच्छू कोठारी के लड़कों का एक बड़ा कारनामा उनके आलस्य और मूर्खता से भी जुड़ा है. कहते हैं एक साल पहाड़ों में सात दिन से लगातार खूब बर्फ गिर रही थी. लच्छू कोठारी के लड़के दिन-रात घर में पड़े रहते और रुखा-सूखा जो भी घर में हुआ उसे खाकर रजाई में पड़े रहते. एक सातों भाईयों ने खाना-पीना किया और रजाई में घुस गये. अब जब सातों भाई रजाई में आये तो दूसरे नम्बर के लड़के ने देखा दरवाजा खुला रह गया है. सातों भाइयों में दरवाजा बंद करने जाने को बहस हो गयी. घंटे भर चली बहस के बाद जब कमरे में ठण्ड बढ़ने लगी तो बड़े भाई ने सुझाव दिया कि एक लम्बी लकड़ी जुटाई जाय और दरवाजा धकेल दिया जाय. नज़र दौड़ाने पर कोई इतनी लम्बी लकड़ी नज़र ही नहीं आई. सातों भाईयों ने तय किया वे बिस्तर से दरवाजे की दूरी नापेंगे और उतनी लम्बाई की लकड़ी जंगल से लायेंगे. सातों भाई जंगल गये उतनी लम्बाई की लकड़ी बनाई और उसे घर लाये फिर रजाई में घुसकर दरवाजा बंद किया.

इसी तरह लच्छू कोठारी के लड़कों से जुड़ा सबसे लोकप्रिय किस्सा है ‘एक भाई मर गया’. एकबार सातों भाई रामगंगा के किनारे नहाने गये. सातों भाईयों ने रामगंगा में दोपहर तक खूब मौज काटी. जब भूख लगी तो उन्होंने अपने-अपने कपड़े पहनकर घर की ओर चल दिये. नदी से थोड़ा दूर पहुचने पर सबसे छोटा भाई दहाड़ें मारकर रोने लग गया. जब बड़े भाई ने रोने का कारण पूछा तो उसने बताया कि हमारा एक भाई रामगंगा में ही डूब गया. बड़े भाई ने जल्दी से सबकी गिनती करी तो उसकी गिनती में भी छः भाई निकले. हर भाई गिनती करता और अपने आप को छोड़ देता इसके बाद सारे भाई साथ में दहाड़ें मारकर रोने लगे.

सातों भाई दुबारा रामगंगा के किनारे चले गये. बहुत ढूंढने पर भी जब भाई नहीं मिला तो उन्हें लगा उनका एक भाई मर गया. सातों भाई एक पंडित के पास अपने मरे भाई के क्रिया-कर्म के लिये चल दिए. पण्डित पहले ही मिनट में लच्छू कोठारी के लड़कों की मूर्खता समझ गया. पंडित ने कहा – “मैं तुम लोगों के भाई को जिन्दा कर लाऊंगा.” पंडित ने सातों भाईयों को एक लाईन में खड़ा किया और सबके पीछे ओम-हीम-क्लीम करते हुये लात मारने लगा. पंडित की हर लात पर लच्छू कोठारी के लड़के गिनती गिनते जाते. पंडित की सातवीं लात पर भाइयों में ख़ुशी की लहर छा गयी और उन्होंने उसे गले से लगा लिया.

– गिरीश लोहनी

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Girish Lohani

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  • लोहनी जी आभार किस्से तो टुकडों मे सुने थे। आज आपने एक साथ कई किस्से सुना कर बहुत नेक काम किया है।

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