फोटो जयमित्र सिंह बिष्ट
हमारे एक कुमाउंनी मित्र ने कुछ समय पूर्व अपनी आंखों का आपरेशन कराया. उन्हें मोतियाबिंद हो गया था. मिलने पर जब बातचीत हुई तो उन्होंने आंखों में ‘बडू जाव’ शब्द का प्रयोग किया, मोतियाबिंद का नहीं. ‘बडुवा’ कुमाउंनी में मकड़ी को कहते हैं और ‘जाव’ जाल शब्द का रूपांतर है. जिस प्रकार मकड़ी जाला तानती है जो धीरे-धीरे फैलता जाता है, उसी प्रकार जब आंख के भीतर गोल झिल्ली सी पड़ जाती है उसे ‘बडुजाव’ या मोतियाबिंद कहते हैं. किंतु मोतियाबिंद में वह मूर्तिमत्ता नहीं है जो ‘बडु जाव’ शब्द में है. यही लोकभाषा की विशेषता है. हम अपने कुमाउनी मित्र की बातें शिष्य की भांति मन लगाकर सुनते हैं. (Intricacies of the Kumaoni Language)
भारतीय परंपरा की दृष्टि से शब्दार्थ तीन प्रकार के माने गए हैं – मुख्यार्थ, लक्ष्ययार्थ और व्यग्यार्थ. जब कि शब्द का पारंपरिक कोशगत अर्थ लिया जाता है तो इसे मुख्यार्थ कहते हैं. जब किसी प्रयोजन के कारण शब्द का विशेष अर्थ लिया जाता है तो इस लक्ष्यार्थ कहते हैं. जब कोई शब्द मुख्यार्थ और लक्ष्यार्थ के अतिरिक्त किसी तीसरे विलक्षण अर्थ की प्रतीति कराता हो तो इसे व्यंग्यार्थ कहते हैं. कुमाउंनी लोक भाषा के सन्दर्भ में हम यहां पर इसी विशेष अर्थ की, विलक्षण अर्थ की चर्चा करना चाहते हैं. (Intricacies of the Kumaoni Language)
सामान्य रूप से इस अर्थ की प्रतीति मुहावरों और कहावतों द्वारा होती है. किंतु विशेष प्रकार के शब्दों, शब्दांशों और वाक्यांशों में भी यह विशेषता दिखाई देती है. दो शब्द लीजिए – ‘असजिलि’ और ‘भन्योल’, ‘भन्योल का सामान्य अर्थ है भड़ैती करना, जैसा कि होली आदि के समय लोग करते हैं. इस समय अप्रिय, अश्लील व्यवहार करने की छूट रहती है जिससे लोग अपने दबे हुए मनोविकारों को प्रकट करते हैं. सामान्य बोलचाल में यह शब्द अश्लील व्यवहार के लिए रूढ़ हो गया है, ‘असजिलि’ शब्द का अर्थ है असुविधापूर्ण, जिसे असजीला भी कह सकते हैं. किंतु प्रत्येक व्यक्ति को असजीला नहीं कह सकते. केवल गर्भवती नारी को ही इस शब्द से संबोधित करेंगे. हिन्दी में इसके लिए ‘पैर’ भारी होना’ मुहावरा प्रचलित है.
दो सामासिक शब्द लीजिए – ‘ज्वेक वल्द’ और ‘मुख म्वाल’. ‘ज्वे’ जहां अपनी पत्नी को कहते हैं और ‘वल्द’ का अर्थ है बैल. समास का अर्थ हुआ पत्नि का बैल. किन्तु यहां मुख्यार्थ से काम नहीं चलता. यह वस्तुतः उस पति के लिए प्रयुक्त होता है जो पत्नि का गुलाम हो. हिन्दी में इसके लिए ‘जोरू का गुलाम’ प्रयोग चलता है. गुलाम और बैल की स्थिति एक जैसी है. पहाड़ में बैल से गुलाम की तरह काम लिया जाता है. वही अर्थ पति के साथ जुड गया. ‘मुख म्वाल’ में मुख तो मुख ही है, ‘म्वाल’ डोरी वाली उस छोटी जाली को कहते हैं जो पशुओं के मुख पर बांधी जाती है. इसे बांधने से पशु भोजन नहीं कर पाता. तात्पर्य है कि अपना मुंह बंद रखो.
इन शब्दों से अर्थ का बिंब ग्रहण होता है. दो शब्दांशों के मेल से यह बिंब ग्रहण होता है जो लोक भाषाओं की प्रमुखता विशेषता है. अब ‘टपुक’, ‘टपकिया,’ ‘फसक’, ‘फराल’, ‘हत पलास’, ‘हन्तरैन’, ‘घुराट’, ‘नौराट’, ‘लमालम’, ‘समेरा समेर’, दातूइ जैसे विशेष शब्दों पर ध्यान दीजिए जिनकी एक लंबी श्रृंखला मिलती है. ये शब्द कहीं मात्र आवृत्ति से, कहीं विशेष प्रत्यय से, कहीं उच्चारण भेद से नए अर्थों की व्यंजना करते हैं. हिन्दी में इनके समानार्थी स्वतंत्र शब्द नहीं दिखाई देते. ‘टपुक’ चीनी, गुड या नमक की वह अल्प राशि जो दूध, चाय या भोजन के साथ धीरे-धीरे खाई जाती है. ‘टपकिया’ पालक, चौलाई, मैथी आदि की बनी वह सब्जी जो दिन के भोजन में दाल भात के साथ खाई जाती है. ‘फसक’ केवल गप्प नहीं है, वह अतिशयोक्ति की सीमा तक पहुंचने वाली ऐसी कोरी गप्प है कि अनायास हास्य उत्पन्न करती है. ‘फराल’ या ‘फराव’ फलाहार है, किंतु प्रतिदिन का फलाहार ‘फराव’ नहीं है. यह व्रत उपवास के दिन एक बार किया जाने वाला भोजन है.
‘हतपलास’ अंधेरे में हाथ लगा कर किसी को टटोलना है, तो सूती वस्त्र जलने से होने वाली गंध ‘हन्तरैन’ है, कोई व्यक्ति जब सोते – सोते खर्राटा भरने लगे तो ‘घुराट’ या ‘घुरघुराट’ कहेंगे. कोई व्यक्ति जब पीड़ा से रह रह कर कराहने लगे तो ‘नौराट’ कहेंगे. पशुओं की आवाज के लिए अलग ‘डुडाट’ शब्द है. जिसका प्रयोग मनुष्य के सन्दर्भ में नहीं होगा. ‘लमालम’ शब्द ‘लंबा’ से बना है, किंतु भिन्न अर्थ देता है, लंबे कदम रख कर लगातार चलते रहने को ‘लमालम’ कहते हैं. ‘समेरासमेर’ में ‘समेर’ शब्द की आवृत्ति हुई है. इसका मुख्यार्थ है समेटना. ‘समेरा समेर’ समेटने की ऐसी क्रिया है जहां सोचने समझने का भाव नहीं रहता.
‘दातुइ’ छोटी दरांती को कहते हैं. यह ‘दातुल’ का स्त्रिलिंग है. दीर्घ के स्थान पर हृस्व ध्वनि लगाकर अथवा स्वर परिवर्तन द्वारा प्रायः कोमलता और लघुता का भाव उत्पन्न किया जाता है. जैसे ‘खताड’ रूई का बड़ा गद्दा है तो इसे ‘खातड़ि’ बना कर छोटे गद्दे का भाव प्रकट करेंगे. ईजा से इजु, जांठ से जांठि, मुख से मुखड़ि शब्द इसी प्रक्रिया से बने हैं जिनसे अर्थ व्यंजकता आ गई है.
अर्थ विज्ञान अर्थात ‘सिमेन्टिक्स’ की दृष्टि से कुमाउंनी शब्दावली में अर्थ परिवर्तन की तीन प्रमुख दिशाएं मिलती हैं जिन्हें क्रमशः विस्तार, अर्थ संकोच और अर्थादेश की दिशाएं कह सकते हैं. पहली स्थिति में शब्दार्थ का क्षेत्र-विस्तार हो जाता है, वह पहले की अपेक्षा अधिक व्यापक अर्थ में प्रचलित हो जाता है. दूसरी स्थिति में उस शब्द का प्रचलित अर्थ सीमित हो जाता है. कोई शब्द कारणवश संकुचित अर्थ का द्योतक हो जाता है. तीसरी स्थिति कें शब्द का मूल अर्थ बिल्कुल बदल जाता है. मूल अर्थ के साथ दूसरा अर्थ आकर जुड़ता है, फिर वह दूसरा अर्थ ही प्रमुख हो जाता है.
‘कुमाऊं’ शब्द को ही लीजिए जिसकी उत्पत्ति सामान्य धारणा के अनुसार कूर्मावतार से हुई. यह अवतार कुर्माचल में हुआ जिससे आगे चल कर कुमंअ बन गया. पहले यह नाम एक छोटे से भू भाग का द्योतक था जिसे अब काली कुमाऊं कहते हैं. चन्द राजाओं के विस्तार के साथ कुमं कुमाऊं शब्द का भी अर्थ विस्तार हुआ जो ब्रिटिश राज में कुमाऊं कमिश्नरी बन कर गढ़वाली क्षेत्र तक फैल गया. यह शब्द के अर्थ विस्तार ‘एक्सपेंशन’ का समय था.
फिर ‘कुमाऊं’ शब्द के अर्थ संकोच ‘कंटै्रक्शन’ का समय प्रारम्भ हुआ. प्रशासनिक कारणों से इस भू भाग को केवल जिला नैनीताल और जिला अल्मोड़ा के भू भाग तक सीमित कर दिया गया. सन् 1892 में कुमाऊं के दो जिले नैनीताल और अल्मोड़ा बनाए गये थे. इसी प्रकार कुमाऊंनी में ‘भोल’, ‘पोरूं’, शब्द अर्थ विस्तार के उदाहरण हैं जिनका प्रयोग कल परसों से लेकर आगामी भविष्य तक किया जाता है. अर्थ संकोच के लिए ‘गंध’, ‘बास’, ‘तिथि’, ‘मैंस’ शब्द लिए जा सकते हैं. ‘गंध’, बास’, दोनों यहां दुर्गंध के लिए रूढ़ हो गए हैं. शब्दों की अर्थ व्यंजना यहां विस्तार की ओर कम, संकोच की ओर अधिक प्रवृत्त हुई है.
अर्थ परिवर्तन की तीसरी दिशा अर्थादेश अर्थात् ‘ट्रांसफरेंस आव मीनिंग’ के तो अनेक उदाहरण मिलते हैं. प्राचीन काल में चन्द राजा जिस व्यक्ति को अपने यहां कर वसूलने का अधिकार देते थे, उसे ‘नेगी’ कहते थे. वह व्यक्ति ब्राह्मण या राजपूत कोई भी हो सकता था. आगे चलकर ‘नेगी’ एक जाति विशेष बन गई, अर्थात एक शब्द दूसरे अर्थ का द्योतक हो गया. राजा के भण्डार की देख रेख करने वाले ‘भण्डारी’ कहे गए. फिर भण्डारियों की जो जाति बनी उसका भण्डार से कोई संबन्ध नही रहा. राजाओं के जहां से लोग प्रातः काल भगवान का नाम लेकर, हरिबोल कह कर दूसरों को जगाते थे वे आगे चलकर ‘हरिबोला’/ ‘हरबोला’ नाम से प्रसिद्ध हो गए. आज कुमाऊं में राजा तो चले गए, ‘हरबोला’ जीवित हैं.
अर्थादेश के आधुनिक उदाहरणों में ‘सरगवास’ शब्द लीजिए तो जो स्वर्गवास का स्थानीय रूपांतर है. ‘सरगवासी’ होने का अर्थ है मर जाना. लोक परंपरा ने शब्द का मुख्यार्थ बिल्कुल छोड़ दिया. यहां ‘घर’ और ‘कुड़ि’ दोनों शब्द अलग-अलग बोलने पर मकान के द्योतक है. किंतु समस्त पद बनने पर ‘घर कुड़ि’ परिवार तथा धन संपत्ति का द्योतक हो जाता है. ‘‘तुमरि घर कुड़ि कों भैं?’’ जैसे वाक्यों में इसका अर्थ मूल निवास स्थान भी हो जाता है. अर्थात मूल स्थान कहां है, तुम कहां के रहने वाले हो, यहां मकान का अर्थ बिल्कुल छूट गया है.
कुछ शब्द तत्सम और तद्भव दोनों रूपों में प्रचलित हैं और सामाजिक सांस्कृतिक स्थितियों के अनुसार उनमें अर्थ परिवर्तन हो जाता है. तद्भव शब्द तत्सम से ही विकसित होते हैं किन्तु देश काल के अनुसार उनका अर्थ भिन्न हो जाता है. यही भिन्नता व्यंजना की दृष्टि से उल्लेखनीय है. जैसे ब्राह्मण-बामण, साधु-साहु, श्राद्ध-सराद शब्द लीजिए. ब्राह्मण शब्द पारंपरिक अर्थ में ही प्रयुक्त होता है. एक जाति विशेष के लिए उसकी पद मर्यादा का भाव इसमें बना हुआ है. किंतु ‘बामण’ कहने से उस जाति/व्यक्ति के प्रति उपेक्षा का भाव प्रकट होता है. ‘साधु’ शब्द सामान्य साधु संत का ही वाचनक है और इनका यहां स्वागत-सत्कार किया जाता है. किंतु इसका तद्भव रूप ‘साहु’ सौज्यू बनकर स्थानीय बनियों की एक जाति विशेष का बोधक हो गया है.
‘श्राद्ध’ शब्द अपने तत्सम रूप में एक लोकाचार का द्योतक है और पितृ तर्पण की क्रिया के लिए प्रयुक्त होता है. कुमाऊं के कर्मकाण्डी इस लोकाचार को विधि विधान सहित संपन्न करते हैं. किंतु इसका तद्भव रूप ‘सराद’ एक अप शब्द जैसा बन गया है. यदि कोई कहे ‘‘वील सरादे जसी करि दे’’, अर्थात उसने श्राद्ध जैसा कर दिया, तो इसका तात्पर्य होगा-उसने खूब गाली गलौच की.
व्यंजना की दृष्टि से मिलते-जुलते शब्दों का अर्थ भेद भी उल्लेखनीय है जिससे पर्यायवाची शब्दों की प्रकृति पर सुन्दर प्रकाश पड़ता है. सारा पर्याय वस्तुतः एक दूसरे के पूर्ण पर्याय नहीं होते, और अपूर्ण पर्यायों में ही अर्थ भिन्न होता है. भाषाओं में विकास के साथ-साथ उसके शब्दों का अर्थ भेद वातावरण आदि के कारण बढ़ने लगता है. इसके फलस्वरूप् एक ओर मिलते जुलते शब्द परस्पर दूर होने लगते हैं, दूसरी ओर समूह वाची शब्द भी विशिष्ट अर्थों में प्रयुक्त होने लगते हैं. अर्थ विधान में इसे भेदी करण का नियम, ‘लॉ आफ डिफरेन्सियेशन’ कहते हैं.
किसी स्थान पर पहरा देने के लिए यहां तीन शब्द ‘पहरयूण’, ‘फाम करण’, और ‘ताकण’प्रचलित हैं. इनका सूक्ष्म अंतर यह है कि ‘पहरयूण’ अपना रूढ अर्थ प्रकट करता है. पहरा देने वाला व्यक्ति उस स्थान के आस पास घूमता रहेगा भले ही उसका ध्यान कहीं और रहता हो. ‘फामकरण’ में देख रेख करने के अतिरिक्त सावधानी का, जागरूकता का भाव जुड़ जाता है. किसी भूली बिसरी घटना का स्मरण भी ‘फाम’ ही है. ‘ताकण’ शब्द की यह व्यंजना है कि उसी पदार्थ या स्थान पर ध्यान जमाए रहो. इस क्रिया में शरीर के अन्य व्यापार चलना फिरना सीमित हे जाते हैं.
किसी पदार्थ की अधिक मात्रा के लिए ‘भौत’ शब्द है. उसकी मात्रा बहुत अधिक होने पर ‘निमुखण’ कहेंगे जिसे हिन्दी में बेशुमार, अत्यधिक कह सकते हैं. अत्याधिक में दो शब्दों की सन्धि हुई है. किंतु ‘निमुखण’ स्वतंत्र शब्द है. गोरे रंग के लिए ‘फनार’ शब्द प्रचलित है. यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक गोरा हो तो उसे ‘ग्वर फनार’ कहेंगे. भूली हुई वस्तु की याद करना ‘फाम’ है तो स्नेहवश किसी की याद आना ‘नरै’ है. हम ‘फाम’ भी करते हैं, और हमें ‘नरै’ भी लगती है. इस अंतर को ‘फाम करण’ और ‘नरै लगाण’ से समझा जा सकता है. क्रिया पद बदल कर इन्हें ‘फाम लागण’ या ‘नरै करण’ नहीं कह सकते. तब शब्दों का कोई अर्थ नहीं निकलता.
इस वर्ग के दो चार और उदाहरण लीजिए. पूरी उंगली को ‘आंगुइ’ कहते हैं जो उंगली का ही रूपांतर है. किंतु आधी उंगली के लिए दूसरा शब्द आ गया ‘पौंस’. दूध या पानी धीरे-धीरे पीना ‘चुस्स चुस्स’ है, उसी को घूंट घूट कर पीना ‘घटाघट’ है. उसी पदार्थ को तेजी से निगलने पर ‘गटागट’ कहा जाएगा. बच्चों का धीरे-धीरे चलना ‘खुट खुट’ है. ‘खुट’ पैर को कहते हैं. व्यस्क व्यक्ति का सामान्य रूप से चलना ‘हिटणा’ है. वही अगर लंबे कदम रखते हुए चलने लगे तो इसे ‘लमालम’ कहेंगे जैसा कि हम पहले बता चुके हैं.
अनेकार्थी शब्दों की व्यंजना संदर्भ विशेष पर निर्भर करती है. उसी सन्दर्भ को जान कर वास्तविक अर्थ मालूम होता है ऐसे शब्द का प्रचलित अर्थ पहले समझा जात है, फिर गौण अर्थ या दूसरे अर्थ का अनुमान किया जाता है. ‘चटै’ शब्द अनेकार्थी शब्द है जिसके कम से कम दो अर्थ हैं-चटाई और चाटना. एक संज्ञा पद है, दूसरा क्रिया पद. वक्ता शब्द का प्रयोग किस प्रकार कर रहा है, यह उसकी वाक्या योजना से मालूम होगा. यदि वक्ता किसी श्रोता से कहता है-‘‘जा, ऊ चटै उठै ल्या’’-जाओ, वह चटाई उठा लाओ, तो पहला अर्थ व्यंजित होगा. यदि वह कहता है-‘‘मील दाव माठू माठू चटे हाली’’- मैंने दाल धीरे-धीरे चटा दी, तो दूसरा अर्थ व्यंजित होगा.
‘डान’ शब्द पहाड़ की ऊंचाई या चोटी और दण्ड दोनों अर्थों की व्यंजना करता है और वास्तविक अर्थ वक्ता के प्रयोग पर निर्भर है. अगर कोई कहे-‘‘पारा डाना को छै घस्यारी’’-पहाड़ी चोअी के उस पार कौन है घसियारिन, तो पहला अर्थ व्यंजित होगा. अगर कोई कहे-‘‘भौते डान पड़िगो हो’’-अरे बहुत दण्ड देना पड़ा तो दूसरा अर्थ व्यंजित होगा. ये दोनों शब्द संज्ञा रूप में प्रयुक्त हुए हैं. विशेष अर्थ प्रकट करने के लिए वक्ता कभी अन्य उपायों का भी उपयोग करता है. पहाड़ों की ऊंचाई का फैलाव व्यंजित करने के लिए वह ‘डाना’ के साथ ‘काना’ मिलाकर ‘डानाकाना’ बना लेगा इसी ‘डान’ का उच्चारण दीर्घ करके वह ‘दण्ड’ का अर्थ व्यंजित कर देगा. यही विशिष्ट व्यंजना है जिसके लिए वह सुर, तान, बलाघात का यथास्थान सहारा लेता है. कुमाऊंनी में सुर-तान का बड़ा महत्व है.
कुछ मुहावरे लीजिए. यहां शब्द अपना स्वतंत्र अर्थ नहीं व्यंजित करते. ‘ख्वार चढूण’ में ‘ख्वार’ तो सिर का द्योतक है, ‘चढूंण’ क्रिया का अर्थ है स्थापित करना. किंतु वास्तविक अर्थ सिर पर स्थापित करना न होकर ‘सिर चढ़ाना’ है. किसी की इतनी प्रशंसा कर दीजिए कि वह दूसरों को कुछ नहीं समझे, वह फूल कर कुप्पा हो जाए.’ अकास चाणी’ मुहावरे का शब्दार्थ है आकाश की ओर देखना. ताकना. किंतु तात्पर्य है असहाय अवस्था का संकेत करना. ‘ढुंग में धरण’ मुहावरे का मुख्य शब्दार्थ है पत्थर पर रखना, किंतु यहां अर्थ है त्याग देना. किसी की उपेक्षा करने का भाव इससे व्यंजित किया जाता है. इससे मिलता जुलता मुहावरा है ‘गाड़ बगूण’ अर्थात् नदी में बहा देना. इसका प्रयोग भी किसी को त्यागने और भूलने के लिए होता है. ग्रामीण लोग बात बात पर मुहावरे कहते हैं.
अर्थ व्यंजना को बढ़ाने में अव्यय विशेष महत्व रखते हैं जिन्हें अविकारी शब्द कहते हैं. कुमाउंनी में अटक बिटक, अहा, एति, ऐल, त, तबै, दै, धैं, नै, ले, लै, हला, हंहो जैसे अव्यय प्रमुख हैं जो कभी वाक्यार्थों को जोड़ते हैं, कभी तोड़ते हैं, कभी विरोध बतलाते हैं, कभी किसी अर्थ पर अधिक जोर देते हैं, कभी किसी भाव का चित्र जैसा खड़ा कर देते हैं. ये सब अव्ययों के कार्य अर्थात ‘फंक्शन्स’ हैं. लोक भाषा की अर्थवत्ता तो हम समझने लगे हैं, फिर भी उसके विभिन्न प्रयोजनों की ओर हमारा ध्यान नहीं गया.
इस अर्थ व्यंजना से एक बात स्पष्ट होती है. इसकी कुछ कुछ विशेषताएं हिन्दी की अन्य लोक भाषाओं में भी दिखाई देती हैं, कुछ विशेषताएं केवल कुमाउंनी में हैं. कहीं घ्वनि परिवर्तन से विशेष अर्थ निकलता है, कहीं वाक्यांश अथवा शब्दांश से अर्थ व्यंजित होता है. अनेकार्थी शब्द ही व्यंजना श्रोता के बुद्धि कौशल तथा स्थिति विशेष पर निर्भर होती है. आवश्यकता यह जानने की है कि ऐसा कब होता है और क्यों होता है. यह क्या शब्दों की रूप रचना पर निर्भर नहीं होती? यदि वक्ता श्रोता दोनों की उसमें भागीदारी है तो हमें शब्द प्रयोग के सामाजिक -सांस्कृतिक सन्दर्भों की ओर अधिक ध्यान देना होगा.
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पुरवासी में डॉं. त्रिलोचन पाण्डे का लेख कुमाउंनी लोकभाषा-अर्थ व्यंजना
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Bahut Sundar vishleshan Kumaoni Bhasha ka. Dhanyavad