फोटो: रवि वल्दिया
उत्तराखंड की यात्रा के दौरान अनेक स्थानों के नाम ऐसे हैं जिनके आखिर में ‘कोट’ शब्द लगा होता है. नाम के आखिर में ‘कोट’ शब्द वाले स्थान गढ़वाल और कुमाऊं दोनों में ही हैं. बहुत कम लोग ही जानते हैं कि आखिर इस कोट शब्द का अर्थ क्या है.
(Kot in Pithoragarh)
‘कोट’ का सामान्य शाब्दिक अर्थ किले से है. कोट माने ऐसा स्थान जहां उस क्षेत्र का राजा और उसका परिवार रहता है. आज भी उत्तराखंड में ऐसे स्थान हैं मसलन पिथौरागढ़ जिले में स्थित कोट.
पिथौरागढ़ जिले की सोर घाटी में स्थित कोट के विषय में बद्रीदत्त पांडे लिखते हैं कि सोर में पहले 9 राजा हुआ करते थे इसलिए सोर को “ना ठुकुर सोर” भी कहते हैं. बद्रीदत्त पांडे सोर में 9 किले या कोट होने ही बात कहते हैं. इन 9 कोट का वर्णन वह कुछ इस तरह करते हैं –
(Kot in Pithoragarh)
(1) उचाकोट – पंगूट व हुड़ेती गाँव के बीच.
(2) भाटकोट – पिठौरागढ़ से पूर्व चैसर व कुमौड़ गाँव के उत्तर आधे कोस पर.
(3) बैलर कोट – मौज़े थरकोट के निकट.
(4) उदयपुरकोट – बाजार से पश्चिम को मौज़े पयदेव व मजेड़ा के ऊपर.
(5) डुंगराकोट – मौजा धारी व पाभैं के पास.
(6) सहजकोट – बाज़ार के उत्तर मौजा पंडा व उर्ग पहाड़ के ऊपर.
(7) बमुवाकोट – बाज़ार के दक्षिण तरफ़ पहाड़ की चोटी पर.
(8) देवादारकोट – वलदिया पट्टी में मौज़े सिमलकोट के निकट.
(9) दुनीकोट – मौज़े दुनी व कासनी के नज़दीक छावनी से पूर्व तरफ़.
बद्रीदत्त पांडे लिखते हैं कि अब इन राजाओं का कुछ भी पता ज्ञात नहीं है और इनके किले वीरान पड़े हैं, खण्डहर मात्र हैं.
(Kot in Pithoragarh)
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