Featured

हर किसी का अपना-अपना बनवारी का तिकोना ज़रूर होता है

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये क्लिक करें – Support Kafal Tree

रामनगर में बौने के बमपकौड़े के बाद जो डिश सबसे फेमस थी उसे बनवारी का तिकोना कहा जाता था और बनवारी जिस चीज़ को तिकोना कहकर बनाता-बेचता था उसे ज़माना समोसा कहता आया था.
(Samosa History Hindi)

और ज़माना जिस चीज़ को समोसा कह रहा था वो दरअसल सम्सा था जिसे हज़ार-बारह सौ या उससे भी ज़्यादा बरस पहले कज़ाकिस्तान या तुर्कमेनिस्तान के किसी उस्ताद नानबाई ने अपने तंदूर में बनाया था. नानबाई ने अपने पुरखों से सुदूर सिकन्दरिया के महान पिरामिडों की कहानियाँ सुन रखी थीं. रोज की तरह उस दिन भी तंदूर में डालने के लिए वह भरवां डबलरोटियों की लोइयां बना रहा था. रोज़ की तरह थोड़ा सा गुंदा हुआ आटा बच गया था जिसे वह मवेशियों के बरतन में डालने जा रहा था जब उसने देखा कि थोड़ा सा कीमा भी बच गया है. उसने कीमे में थोड़ा सा मसाला मिलाया और बचे हुए आटे की लोई में भरकर पिरामिड की सूरत देकर डबलरोटियों के साथ तंदूर में डाल दिया. जो चीज़ बनकर निकली उसके बेमिसाल स्वाद ने खुद नानबाई को हैरत में डाल दिया. पिरामिड की आकृति के लिए उसकी भाषा में सम्सा शब्द था सो उसने अपनी इस ईजाद को भी यही नाम दिया.

इतिहास में जिसे सिल्क रूट कहा जाता है में उस सारे रास्ते पर शनैः-शनैः नानबाई के इस दिव्य कारनामे की कथाएँ चल निकलीं. मिस्र से लेकर लीबिया और चीन से लेकर ईरान तक सम्सा के शैदाई पैदा हो गए जिन्होंने आटे की लोइयों के भीतर कीमे से लेकर काजू-पिस्ता और तरबूज से लेकर गोभी जैसी हर चीज़ को भरकर अपने तरीक़े का सम्सा बनाया. किसी ने उसे सम्बूसा कहा किसी ने सम्बूसक.
(Samosa History Hindi)

दिल्ली सल्तनत पर मुगलों के गद्दीनशीन होने के साथ ही मध्य-एशिया के तमाम रसोइये भी अपनी क़िस्मत आजमाने भारत चले आये. इन रसोइयों-बावर्चियों ने सम्सा को तंदूर से निकाल कर तेल की कढ़ाई तक पहुंचा दिया था. सो इस लज़ीज़ व्यंजन को अमीर खुसरो की ‘बाग़-ओ-बहार’ के दरवेशों के किस्सों में भी जगह मिली और इब्नबतूता के सफ़रनामों में भी.

उधर ढाई हज़ार साल पहले सुदूर दक्षिण अमेरिका के बोलिविया और पेरू में रहने वाले किसानों ने टिटिकाका झील के किनारे आलू उगाना-खाना शुरू कर दिया. बाकी दुनिया को आलू से परिचित कराने का श्रेय आक्रान्ता जहाजियों-व्यापारियों को जाता है जो कोई तीन सौ बरस पहले आलू को यूरोप लेकर आए. यूरोप में लम्बे समय तक इसे जानवरों के लिए सस्ते भोजन की तरह इस्तेमाल किया गया. यही जहाजी पहले वेस्ट इंडीज़ और उसके बाद दक्षिणी भारत से कालीमिर्च लेकर पहुंचे थे. हम कभी नहीं जान पाएंगे कि जब यूरोप के किसी देश के किसी भूखे महात्मा ने पहली बार उबले आलू के ऊपर कालीमिर्च पाउडर छिड़ककर उदरस्थ किया होगा तो उसकी आत्मा ने कुदरत का शुक्रिया कैसे किया होगा. फिर यूं हुआ कि सारा यूरोप आलू खाने लगा. रूस वाले तो उसकी शराब बनाकर भी पीने लगे.

भारत में आलू गोरों की मेहरबानी से आया. अपने प्रवेश के साथ ही वह हमारी रसोइयों में किसी देवता की तरह पूजा जाने लगा होगा क्योंकि उसके भीतर पेट के साथ साथ आत्मा को भर देने की कूव्वत मौजूद थी.

फिर किसी उकताए हुए रसोइये ने सम्से के भीतर कीमे और पनीर की जगह आलू भर दिये. उसके बाद गदर हो गया. हरी चटनी में समोसे डुबोते हुए जिस स्वाद की कल्पना से जीभ तर हो जाती है, वह दुनिया भर के महाद्वीपों की शताब्दियों लम्बी यात्रा करने के बाद हम तक पहुंचा है. हर किसी का अपना-अपना बनवारी का तिकोना ज़रूर होता है.
(Samosa History Hindi)

अशोक पाण्डे

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय : हिमालय की सामाजिक अर्थव्यवस्था का आरंभिक अकादमिक अध्ययन

पिछली कड़ी : उत्तराखंड राज्य की अवधारणा किसी एक नेता या आंदोलन से नहीं बनी…

5 days ago

कर्ज पर युधिष्ठिर का जवाब : लोककथा

बड़ी पुरानी बात है. पांडु राजा के पाँच पुत्र थे, पांडव और धृतराष्ट्र के सौ…

3 weeks ago

दिव्य आम का स्वाद जीभ पर नहीं पेट के सबसे चोर हिस्से पर कब्ज़ा जमाता है

हमारे इलाक़े में लंगड़ा आम अमूमन इन्हीं दिनों यानी जून के तीसरे-चौथे हफ़्ते में सलीके…

3 weeks ago

उत्तराखंड राज्य की अवधारणा किसी एक नेता या आंदोलन से नहीं बनी

पिछली कड़ी : एटकिंसन : पहाड़ आधारित प्रशासन का निर्माता हिमालय को जानने समझने व…

1 month ago

एक ‘युवा’ एथलीट जिनकी उम्र 92 वर्ष है!

आम तौर पर एक उम्र के बाद व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से अशक्त, बेबस…

1 month ago

रिंगाल: पहाड़ की बुनावट में छिपा रोजगार और जीवन

पहाड़ों में जीवन हमेशा प्रकृति के साथ जुड़कर चला है. यहाँ जंगल सिर्फ पेड़ों का…

1 month ago