फोटो : उत्तराखंड टूरिज्म की वेबसाईट से साभार
उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में एक खूबसूरत सा शहर है श्रीनगर. जिसके आसपास कई दर्शनीय स्थल हैं. कुछ सालों से खिर्सू के पर्यटन स्थल के रूप में उभरने की खबरें सुनी थीं और जल्द ही जाने का मौका भी मिल गया. श्रीनगर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर समुद्र तल से लगभग 1700 मी की ऊंचाई पर स्थित है यह स्वर्ग सरीखा स्थल जो धीरे-धीरे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो रहा है और लोगों की पसंद बन रहा है.
(Khirsu Offbeat Hill Station Uttarakhand)
जाने के लिए सिंगल रोड मगर ऑल वेदर रोड से अपेक्षाकृत बेहतर. चट्टानों को रोककर रखने के लिए तैनात पौध वनस्पति. ट्रैफिक अपेक्षाकृत कम. इन दिनों यात्रा सीजन समाप्त है अतः पर्यटकों की आवाजाही भी कम है. पेड़ों के बीच से गुजरती सड़क में अचानक इक्का-दुक्का वाहन सामने से आ जाते हैं. सॅंभल कर चलना ज़रूरी है. रास्ते भर कई ऐसे पॉइंट्स हैं जहां से श्रीनगर शहर पूरा दिखाई देता है और वहां स्थित बांध भी.
यहीं से सामने देवलगढ़ दिखाई देता है. यह गढ़वाल के राजा की राजधानी भी रही. शहर का नाम कांगड़ा के राजा देवल के नाम पर पड़ा. 16वीं शताब्दी में राजा अजय पाल के शासन में यहां गढ़वाल की राजधानी रही. उन्होंने चांदपुर गढ़ी से अपनी राजधानी यहां स्थानांतरित कर दी थी. सन् 1512 से 1517 तक यह पूर्णकालिक राजधानी रही. उसके बाद भी राज परिवार अपनी गर्मियां देवलगढ़ में और सर्दियां श्रीनगर में बिताता था. यहां का राजराजेश्वरी मंदिर समुन्नत गढ़वाली वास्तु कला का उत्कृष्ट नमूना है. यह गढ़वाल राजाओं की आराध्य देवी हैं. हर साल अप्रैल यानि बैशाख के महीने में यहां पर मेला लगता है. स्थानीय लोग प्रकृति और ईश्वर को कृतज्ञता प्रकट करते हुए ताजी गेहूं की रोटियां भेंट चढ़ाते हैं.
बांज और देवदार के हरे-भरे पेड़ रास्ते पर साथ निभाते रहे. बहुत अधिक तो नहीं लेकिन कहीं-कहीं चीड़ के भी दर्शन हो जाते हैं. पूरे रास्ते से श्रीनगर के सुंदर नज़ारे मन लुभाते रहते हैं. यहां के गांवों में अच्छी खासी बसासत है. आधुनिकता और चकाचौंध से दूर सादा सरल जीवन, कच्चे पक्के मकान, आंगनों में बंधे हुए गाय बछड़े, गांव की पगडंडियों में दौड़ती बकरियां, छोटे-छोटे खेतों में उगे साग-पात. एक बड़ा सा मैदान जिसके दूसरे छोर पर बना हुआ एक मंदिर.
(Khirsu Offbeat Hill Station Uttarakhand)
गांव में छोटे-छोटे होटल और ढाबे हैं, जिनमें पारंपरिक भोजन परोसकर पर्यटकों को इस क्षेत्र की खूबियों से रूबरू कराने का पूरा प्रयास रहता है. गढ़वाल मंडल विकास निगम के गेस्ट हाउस के अतिरिक्त समय की मांग को देखते हुए कुछ होम स्टे और रिसॉर्ट्स भी यहां जगह ले रहे हैं. इस क्षेत्र में बद्दी मेला भी आयोजित होता है, जिसका सार ग्रामीणों की उन्नति और आपदा मुक्त जीवन की कामना में निहित है. पुराने समय में काठ के घोड़े में व्यक्ति को बैठाकर ऊॅंचाई से छोड़ा जाता था जिसमें जान जाने का भी खतरा रहता था. समय के साथ-साथ यह परंपरा भी बदली और मनुष्य की जगह लकड़ी का इस्तेमाल किए जाने लगा. दूर गांव के किसी घर में कुछ भीड़ सी दिखाई दे रही थी और थोड़ी देर में ढोल दमाऊ बजने की आवाज़ आने लगी. पता चला कि जागर लगा था. आधे घंटे तक आवाज़ आने के बाद चुप्पी छा गयी. फिर रात भर यह कार्यक्रम चला. आस-पास सार्वजनिक शौचालय की व्यवस्था अच्छी नहीं है जिससे पर्यटकों को असुविधा का सामना करना पड़ता है.
एक ईको डायवर्सिटी पार्क भी यहां पर है. जिसमें बांज, देवदार, यूकेलिप्टस, पॉपलर, महल, काफल, बुरांस, नाशपाती और सेव के पेड़ है. विविध वनस्पति और पशु पक्षियों का घर है यहां. काफ़ी अंदर जाने पर भालू और तेंदुए जैसे जानवरों का डर बना रहना स्वाभाविक है. नंदा देवी, त्रिशूल, नंदकोट, पंचाचूली समेत हिमालय की कई चोटियां यहां से देखी जा सकती हैं. सुबह-सुबह जब हिम शिखरों पर सूरज की किरणें अपनी छटा बिखेरती हैं तो चांदी सी बर्फ़ की रंगत स्वर्णिम हो उठती है. यहां से सूर्यास्त का दृश्य भी अद्भुत दिखाई देता है. अंखियों के झरोखे खोल अपलक निहारते रहने का जी चाहता है और पता ही नहीं चलता कि सूरज कब आंख मिचौली खेल कर पहाड़ के पीछे लुप्त हो गया.
(Khirsu Offbeat Hill Station Uttarakhand)
खिर्सू ट्रैकिंग के शौकीन लोगों को भी बेहतरीन अवसर देता है. यहां से चौबट्टा तक का मार्ग बहुत ही खूबसूरत है. इसके साथ ही कैंपिंग कर विविध पशु-पक्षियों को देखने का भी सुखद अवसर यहां पर बनता है. गर्मियों में अप्रैल से जून और जाड़ों में सितंबर से जनवरी यहां पहुंचने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त महीने हैं. आज प्राइवेट वाहनों की संख्या बढ़ने के कारण स्थानीय लोग भी पिकनिक के तौर पर सुकून का दिन व्यतीत करने यहां आ जाते हैं.
यह पूरा एरिया शांति का वास है. सुबह के साफ़ मौसम ने ऑंखों को हिमालय के भरपूर दीदार कराये. दिन होते-होते बादलों की बारात ने हिमालय को अपने आगोश में लेकर अपना नृत्य शुरू कर दिया था. इसका भी अलग अनुभव रहा. सर्दियों जब चरम पर होती हैं तो खिर्सू बर्फ की चादर में सिमट कर अद्भुत सौंदर्य से लकदक हो जाता है, पेड़ों में लदे लाल गुलाबी सेव, जी चाहता है कि कुदरत के इस करिश्मे को निहारते ही रहें. गर्मियों में पेड़ों से होकर गुजरने वाली ठंडी बयार इसे स्वर्ग सरीखा बना देती है. बीच-बीच में विविध पंछियों के चह-चहाट मानो अपनी बोली में हमसे कुछ कह रही हो.
जैसे-जैसे क़दम आगे बढ़ते जाते हैं नयन और भी खुशनुमा नज़ारे पाते हैं. मन कभी बहक जाता तो कविता के स्वर फूट पड़ते, कभी ठहर जाता तो खूबसूरत कायनात नज़रों के सामने सिमट जाती. फिर अगले ही पल मन सोच में पड़ जाता कि हम इस प्राकृतिक खूबसूरती के संरक्षण के लिए कितने प्रतिबद्ध हैं.
(Khirsu Offbeat Hill Station Uttarakhand)
मूलरूप से अल्मोड़ा की रहने वाली अमृता पांडे वर्तमान में हल्द्वानी में रहती हैं. 20 वर्षों तक राजकीय कन्या इंटर कॉलेज, राजकीय पॉलिटेक्निक और आर्मी पब्लिक स्कूल अल्मोड़ा में अध्यापन कर चुकी अमृता पांडे को 2022 में उत्तराखंड साहित्य गौरव सम्मान शैलेश मटियानी पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
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