केंद्र सरकार ने पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री पुरस्कारों की घोषणा की है. उत्तराखण्ड के अनिल जोशी और कल्याण सिंह रावत को पद्मश्री पुरस्कार दिया जायेगा. उत्तराखंड में मैती आंदोलन पर्यवारण से जुड़ा एक बहुत बड़ा आन्दोलन है. इस आन्दोलन को शुरु करने का श्रेय जाता है कल्याण सिंह रावत जी को. पिछले दिनों काफल ट्री की कल्याण सिंह रावत जी से एक लम्बी बातचीत हुई. जिसका प्रकाशन काफल ट्री पर किया गया. फ़िलहाल कल्याण सिंह रावत से इस बातचीत के दौरान उनका एक अनुभव पढ़िये कि कैसे उन्होंने रंवाई घाटी के लोगों को पेड़ लगाना सिखाया : संपादक (Kalyan Singh Rawat Work in Ranvae Ghaati)
मेरा दूसरा ट्रांसफर रंवाई घाटी क्षेत्र में हुआ. यहां के लोग केवल पेड़ काटना जानते थे. पेड़ लगाना नहीं जानते थे. लोगों ने मुझसे कहा कि गुरूजी रंवाई जा रहे हो वहां तो बड़ा खतरनाक इलाका है आप कैसे काम करोगे. मैंने कहा कोई बात नहीं अपने देश का ही तो भाग है वो. मैंने कहा मैं लोगों का जागरुक करूंगा. जब मैं वहां गया तो देखा सच में वहां लोग केवल पेड़ काटना जानते हैं लगाना तो जानते ही नहीं और अगर आप उनसे पेड़ न काटने की बात करोगे तो लोग तुम्हें मार देंगे.
वहां स्कूल की स्थिति ऐसी थी कि बच्चे कभी पढ़ते नहीं थे. पास-करने वाले इंटर पास कर जाता था लेकिन अपना नाम नहीं लिख पाता था. नकल चलती थी. स्कूल के प्रबंध में उन दिनों मैदानी और पहाड़ी वाली गुटबंदी भी खूब हुआ करती थी.
मैंने सभी अध्यापकों को एक किया और बच्चों को पढ़ाना शुरु किया. राजगढ़ी स्कूल में मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि रही स्कूल परिसर में बच्चों की सहायता से बनाई गयी थी. इस नर्सरी में 45000 पौध तैयार किये थे. यह उत्तराखंड शिक्षा विभाग की यह सबसे बड़ी नर्सरी थी.
उन दिनों हमारे स्कूल में आस-पास के चालीस गावों के बच्चे आते थे. मैंने उन बच्चों के माध्यम से वह पेड़ गावों में भेजे और वहां पेड़ पहुंचा कर मैंने वृक्षारोपण का एक नया तरीका खोजा. सच पूछें तो मुझे पर्यवारण के प्रति जो एक बहुत बड़ी प्रेरणा मिली रवांई घाटी के राजगढ़ी से ही मिली थी.
आपने 1930 का तिलाड़ी काण्ड जरुर सुना होगा जिसमें स्थानीय लोगों ने अपने वन अधिकारों के लिये आन्दोलन किया था. इससे जुड़ी घटना को उत्तराखंड जलियांवाला काण्ड भी कहा जाता है. 30 मई 1930 को तिलाड़ी काण्ड हुआ था इसी वजह से 30 मई के दिन उत्तरकाशी में शहीद दिवस मनाया जाता है और सरकारी अवकाश रहता हैं.
मैं राजगढ़ी में था तब मुझे लगा कि आज शहीद दिवस है तो तिलाड़ी मैदान जाना चाहिये. मैं यमुना किनारे तिलाड़ी मैदान पर गया देखा वहां कोई नहीं था. उन दिनों उत्तार प्रदेश में बलदेव सिंह आर्य मंत्री हुआ करते थे वो बेचारे नीचे तिलाड़ी मैदान नहीं जा सकते थे तो उन्होंने स्मारक नीचे से उठा कर हमारे स्कूल के पास ही बना दिया. जिसमें लोगों में किसी प्रकार की कोई रूचि नहीं थी कोई चला गया तो दो एक फूल चढ़ा देता था.
यह सब देखकर मुझे बहुत बुरा लगा. शहीदों के नाम पर यहां दो आदमी भी नहीं आ रहे हैं. यह अच्छा नहीं है. मैंने एक संकल्प ले लिया कि मैं यहां शहीद दिवस का आयोजन यहां बड़े भव्य रूप में करुंगा.
1987 में मैंने राजगढ़ी में एक वृक्ष अभिषेक कार्यक्रम की रुपरेखा बनाई. इसी साल इस क्षेत्र में भयंकर सूखा पड़ा लोगों की खेती बरबाद हो गयी. बारिश की कामना के लिये लोगों ने अपने स्थनीय देवताओं को डोलियों में बैठाकर चारधाम यात्रा की. यह सब मार्च अप्रैल की घटना थी. मुझे भी अपना कार्यक्रम मई 30 को करना था.
मैंने जब डी.एफ.ओ. साहब से बात की तो उन्होंने कहा कि हम पेड़ तो दे देंगे लेकिन इतने भयंकर सूखे में कम वृक्षारोपण करेंगे तो लोग क्या कहेंगे और पेड़ कैसे बचेंगे? मैंने कहा सर मैं मेरे राजगढ़ी में प्राकृतिक स्त्रोतों में पानी है मैं बच्चों के द्वारा पानी डालूंगा. मैं चाहता हूं कि मेरे गांव में पढ़ने वाले चालीस गांवों के बच्चों के चालीस पेड़ लगें.
मैंने चालीस गांवों के ग्राम प्रधानों की मीटिंग बुलाई और प्रस्ताव रखा कि 30 मई के दिन आप लोगों को एक डोली में एक पेड़ रखकर लाना है यह पेड़ ग्राम वृक्ष कहलायेगा. इस दिन वृक्ष अभिषेक कार्यक्रम मनाया जायेगा. हम पहले से गड्डे खोद कर रखेंगे और उसमें गांव का प्रधान पेड़ लगायेगा और प्रधान के साथ गांव की सात लड़कियां परम्परागत परिधान में एक कलश में पानी के साथ आयेंगी. प्रस्ताव तय हो गया.
30 मई को 1987 को मैंने डीएम इत्यादि को भी बुलाया. तीस मई के दिन सुबह 11 बजे से चालीस गांव के लोग ढोल दमाऊ बजाते हुये एक पेड़ डोली में रखकर स्कूल पहुंचने लगे. उस साल राजगढ़ी के मैदान में चार हज़ार लोगों की भीड़ थी.
वहां हमने वेद मंत्रों के साथ वृक्षों को पूजा और फिर हमने ग्राम प्रधानों से कहा कि अपने गांव की लड़कियों के साथ अपने गांव के नाम वाले गड्डे के पास जाइये और पेड़ लगाइये. पेड़ लगने के बाद गांव की सात लड़कियां पेड़ की सात परिक्रमा कर पेड़ में कलश से पानी डालेंगी. इसके बाद एक भव्य कार्यक्रम हुआ.
इन चालीस गांवों में कुछ ऐसे गांव भी थे काफ़ी दूर थे. इन गावों के लोग रात को वापस अपने घर नहीं जा सकते थे इसलिये हमने पास में स्थित राजा का कोठा में उनके रहने खाने की व्यवस्था कर दी. उन लोगों ने कभी सिनेमा नहीं देखा था मैंने पहले ही डी.एफ.ओ साहब से निवेदन किया था कि इन्हें रात को एक चलचित्र दिखाया जाये. डी.एफ.ओ. साहब ने इसकी व्यवस्था कर दी. रात को सिनेमा देखेने आस-पास के लोग और वहां रुके हुये दूर गांव के लोग सिनेमा देखने लगे. Kalyan Singh Rawat Work in Ranvae Ghaati)
मैं दिन भर की थकान के बाद सो चुका था एक बजे रात एक लड़का मेरे पास आया बोला बाहर चलिये आपरेटर लोग कह रहे हैं सिनेमा बंद करना है. मैंने कहा बंद क्यों करना है उसने कहा कि बाहर बारिश आ गयी. मैं बाहर गया बाहर बूंदाबांदी शुरु हो गयी मैंने आपरेटर को कहा कि तुम्हारी रील ख़राब हो जायेगी थोड़ी देर के लिये बंद कर लो. लेकिन बारिश अगले सात दिन तक बारिश तक नहीं रुकी. गांव के लोग भीगकर अगले दिन अपने गांवों की ओर गये.
डी.एफ.ओ. साहब का मुझे फोन आया कि रावत जी ये क्या चमत्कार हो गया. यह दिन मेरे जीवन का ऐसा अद्भुत अनुभव था जब मुझे लगा कि हम ईमानदारी से काम करते हैं तो प्रकृति साथ देती है.
इस घटना के कुछ समय बाद रंवाई घाटी की कुछ महिलायें मेरे पास आई और कहने लगी कि भाई साहब हमको लगाने के लिये कुछ पेड़ दीजिये. मैंने डी.एफ.ओ. साहब से बात की गांव की महिलाओं और डी.एफ.ओ. साहब के बीच की मीटिंग में डी.एफ.ओ. साहब ने प्रस्ताव रखा कि मैं तुम्हें पेड़ भी दूंगा, गड्डा खोदने के पैसे भी दूंगा लेकिन तुम्हें केवल एक काम करना है तुम्हें पेड़ को बचाना है. महिलाओं ने कहा हमें केवल पेड़ दो साहब गड्डे भी हम खोद लेंगे और सुरक्षा भी हम करेंगे.
आज रवांई घाटी के लोगों ने अपने क्षेत्र में शानदार जंगल बनायें हैं.
-काफल ट्री डेस्क
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अखण्ड आनंद