फोटो: स्व. कमल जोशी
बजट का कौतिक निबट गया. किसान-मजूर, आम वेतन भोगी, वरिष्ठ नागरिक, पेंशनरों के लिये ‘ट्रिपल धमाका’ कर गया. आय-कीमत मौद्रिक-राजकोषीय, देशी-विदेशी व्यापार और पूंजी के प्रवाहों पर की गयी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’. लोक लुभावन होली की गुजिया बंट गयी. लाल गुलाल से रंग दिये समस्त तनाव-दबाव-कसाव. ताकि वो चेहरे जो फटीचर-मुफलिसी के शनि से हैरान-परेशान-नाराज-असंतोषी दिख रहे वह माघ महीने मंगल के अभ्युदय से आशा-उल्लास में रंग जायें. सब के केन्द्र में बैठा मध्य वर्ग कर की छूट के नवरल से अल्प काल में संतुष्ट रहे, सुखी रहने के स्वप्न बुने.
संभवतः बजट निर्माण में व्यस्त अर्थशास्त्री दुनिया को तीसा की महामंदी से उबारने वाले इकोनोमिस्ट ‘जॉर्ज मेनार्ड कीस’ के फोलोअर हैं जो यह कहता था कि अल्पकाल की बात करो, दीर्घकाल में तो हम सब मर जाते हैं. अब अंतरिम बजट की समय अवधि तो अति-अल्पकाल की है. यानी मौजूदा संसद के कार्यकाल जितनी. नई लोकसभा के गठन होने के बाद साल की शेष अवधि के लिये जनता द्वारा चुनी सरकार अपना अलग बजट पेश करेगी. कींस ने ‘उध्धार की वैतरणी’ के लिये समर्थ मांग यानी इफेक्टिव डिमांड का सूत्र दिया था. जिसके साथ चार्वाक के दर्शन से सम्मोहित हुई सरकार और चला दिया ब्रह्मास्त्र. ‘ऋणम कृत्वा-घृतम पिवेत’.
पिछले साढ़े चार से यही हो रहा कि राज कोषीय घाटे के लक्ष्य को भेदने से चूकते रहे नीति नियंताओं के तीर. 2019-20 के लिये भी घाटे को 3.4 प्रतिशत को बरकरार रखना टेढ़ी खीर बना. कई घंटों तक चला मेजों को अनवरत पीटने का सिलसिला. जिनमें कहीं गुम थे राजस्व बढ़ाने के जंतर-मंतर. ‘कैश फॉर वोट’ के वीसियस सर्किल में चुने हुए वर्ग से इफेक्टिव डिमांड यानी प्रभावी मांग पैदा होने का रास्ता खुला. अब कुल जमा वित्तीय बोझ क्या पेड़ेगा. राजस्व जुटाने की रणनीति क्या होगी ? संसाधनों को किस प्रकार गतिशील किया जायेगा. जैसे सवाल आसमान में ध्रुव तारे से अटल बन तकते हैं. पिछले बरस कर राजस्व में जो वृद्धि हुई क्या समुचित वित्त जुट पायेगा? छोड़िये भी साक्ष्य समय सबूतों को. बैकग्राउंड में रख देते हैं कींस इम्प्लॉयमेंट की बात करता या आप रोजगार के आंकड़ों को छुपा दो.
अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता एंगसडीटन तक ने भारत की सांख्यिकी को छुपाने पर आश्चर्य प्रकट किया. उन्होंने कहा कि 1940 और 50 के दशक में प्रो.प्रशांत चन्द्र महालनोबिस के नेतृत्व में एनएसएसडी के सर्वेक्षण में रेंडम सेम्पलिंग का पहली बार अनूठा इस्तेमाल किया गया. आज आंकड़े छुपा कर उनके काम, विरासत और संस्था को झटका दिया जा रहा है. इसी एनएसएसडी की रपट को आधार बना बिजनेस स्टेंडर्ड ने बताया कि 2017-18 में बेकारी की दर 6 प्रतिशत रही जो 1972-73 के बाद सर्वाधिक है. नवम्बर 2016 में नोटबंदी से अर्थतंत्र पर ऐसा फाजिल पड़ा कि नौकरियां सुन्न पड़ गयी, काम धंधे पसर गये. इसके जवाब में बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर नीति आयोग के अध्यक्ष राजीव कुमार ने बताया कि इस रपट को अभी अमली जामा पहनाया ही नहीं गया और आखरी रपट तो मार्च 2019 तक ही आ पायेगी. जब उनसे यह पूछा गया कि इसे अंतिम मंजूरी कौन देगा तो उन्होंने कहा कि उनके विचार से कैबिनेट ही मंजूर करेगी इसे. वैसे मुझे नहीं मालूम! देश में रोजगार सृजन के प्रमाणों की बात उन्होंने खूब रखी. पर आयोग के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष पी.एस. मोहनन ने साफ कहा कि यही अंतिम रपट थी. इसे किसी की मंजूरी की जरूरत नहीं थी और इसे जारी न करने के कारण ही उन्होंने पद त्याग करना बेहतर समझा.
आंकड़ों को छुपाने पर राजीव कुमार साहेब कहते हैं कि सन् 2014 से बैंकों से क्रेडिट मिलना लगभग खत्म हुआ या बिल्कुल कम हो गया. अब आप कहें कि नौकरियां भी कम हो रहीं तो ग्रोथरेट सात प्रतिशत की कैसे हुई ? आर्थिक वृद्धि के लिये नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने तीन जरूरी चीजें बतायी. पहला रोजगार दूसरा पूंजी आदा या केपिटल इनपुट और तीसरी उत्पादकता यानी प्रोडक्टीविटी फिर उन्होंने फरमाया कि नौकरियां मात्र कोई सरकारी क्षेत्र में ही थोड़े बढ़ती हैं. नौकरी तो ओला-उबर में भी बढ़ती हैं. आयुष्मान भारत की जो योजना है उससे भी नौकरियां बढ़ी हैं. और भी कितने धंधे है जो फले-फूले हैं. अब मोदी सरकार में महंगाई बहुत कम रही. कुलजमा 4.6 प्रतिशत ही. अब वृद्धि दर का ऊँचा रहना और महंगाई का सिमटना तो पिछले 70 साल में नहीं हुआ. वो मनमोहन सरकार में वृद्धि दर 8 प्रतिशत रही होगी पर महंगाई भी तो 10 से 12 प्रतिशत बढ़ी थी. साथ ही राजीव कुमार जी ने यह भी फरमाया कि हमारा कर से जी.डी.पी. का अनुपात बढ़ रहा है. करदाता बढ़ रहे हैं. (आय कर सीमा बढ़ाने के बाद भी बंधू!) टैक्स कलेक्शन भी बढ़ रहा है. सो बजट की घोषणाओं के लिये वित्त जुटाना और संसाधनों की गतिशीलता कोई चिंता का विषय नहीं है.
शायद इसी कारण इस बजट में राजस्व जुटाने पर कोई रणनीति प्रस्तुत नहीं की गयी. जो भी घोषणायें हुई वह अतिरिक्त खर्च ही है. अब यह बजट दो महीने में ही अपने गुल खिलायेगा क्योंकि 31 मार्च तक तो मौजूदा बजट ही चलेगा. बजट में शिक्षा और स्वास्थ्य के वित्त में कटौती हुई है. साफ दिखाई देता है कि प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा सरकार की प्राथमिकता से बाहर है. स्वास्थ्य बजट में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की हिस्सेदारी कम हुई है. ग्रामीण स्वास्थ्य के ढांचे के बजट में भी केंची चली है. संक्रमित बिमारियों जैसे टी.बी., डायरिया, न्यूमोनिया, हैपेटाइटिस के कार्यक्रमों को भी सटका दिया गया है. प्राइमरी हेल्थ सेंटर की जगह वेलनेस सेंटर बनाने की बात हो रही है जिसमें गैर संक्रामित बिमारियों पर जोर होगा. राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन का बजट घटा दिया गया है.3391 करोड़ रुपये की आवश्यकता थी पर मिला 950 करोड़ रुपये. जिला अस्पतालों को उच्चीकृत करने का बजट 39 प्रतिशत कम कर दिया गया. बस प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना का बजट सबसे अधिक बढ़ा है जो 6556 करोड़ रुपये होगा. इसके अंतर्गत 10 करोड़ निर्धनों के 5 लाख रुपये तक को बीमा मिलेगा.
2014 नेशनल सेंपल सर्वे हैल्थ के आंकड़े बताते हैं कि देश के 24.85 करोड़ परिवारों में से 5.72 करोड़ परिवार साल-दर-साल अस्पताल जाते हैं. मतलब यह कि 10 करोड़ परिवारों में हर साल 2.3 करोड़ परिवार अस्पताल जायेंगे ही. इससे यह सिद्ध नहीं होता कि बीमा कंपनियों के पास हर मरीज को भर्ती देने को 2,850 करोड़ रुपये ही होंगे. साफ है कि मरीज की अपनी गांठ से खर्च करने का औसत अभी भी बहुत अधिक रहेगा. एन.एस.एस.के अनुसार 2014 में यह 15,244 रुपये का औसत था जो 2019-20 तक बढ़ कर 19,500 रुपये हो जायेगा. स्वास्थ्य बीमा इस औसत का मात्र पन्द्रह प्रतिशत देने की गुंजाइश रखता है.
बजट में जो व्यय बढ़ाया गया है उसकी प्राथमिकता आम आदमी को सीधा फायदा पहुंचाने की होनी चाहिये पर जरा सरकारी अस्पतालों के मौजूदा ढांचे पर गौर फरमाइये. अधकचरा आधा अधूरापन जिसमें अगर महंगी मशीनें खरीद ली गयी हैं तो विषय विशेषज्ञ डॉक्टर व टेक्नीकल स्टाफ है ही नहीं. उस पर कभी पीपीपी मोड तो कभी कुछ और टोटके. अब स्वास्थ्य के नाम पर बीमा पालिसीको बेहतर बनाने की प्राथमिकता. एनएसएस 2014 के आंकड़े ही बताते हैं कि देश में 97 बीमारियों को निदान ओपीडी पर होता है जिस पर चिकित्सा खर्च का 6.7 प्रतिशत है. ज्यादातर इलाज बीमा से बाहर होता हैं. बीमा की नीतियां कॉरपोरेट की झोली भरने के टोटके हैं. यह सही है कि प्राइवेट सेक्टर में सरकारी क्षेत्र से बेहतर चिकित्सा सुविधायें बटोरी जा सकती हैं. पर वहां चिकित्सा व्यय का जो मूल्यांकन अस्पताल का निजी प्रबंधन करता है वह वाकई दी गयी सुविधाओं के मुकाबले कहीं अधिक है यानी यहां भी ओवर वेलुएशन ट्रिक काम करती है. क्या ऐसा नहीं होना चाहिये कि सरकारी प्रणाली को इस तरह बेहतर और कारगर बनाया जाये कि निर्धन व मध्य वर्ग को तुरंत इलाज मिले. उसे बार-बार रेफर न किया जाये. ओपीडी में पर्चे की कीमत कम होने के बाद भी उसे कम खर्चा करना पड़े. दर-दर भटकता मरीज फिर से मिलीभगत वाली फर्मों की महंगी दवाई डॉक्टर के लिखे अनुसार खरीदने को बाध्य है. अनापशनाप जांचें वो भी बाहर से. जन औषधी केन्द्रों की जैनेरिक दवाओं को पर्चे पर अछूत बना दिया जाता है. वैसे ही इनके स्टोर बहुत कम है जो हैं भी उनमें आधी अधूरी दवायें हैं. औषधी केन्द्र चलाने वालों को भी बिक्री के अनुपात में मिलने वाली संचालन धनराशि सरकार से समय पर नहीं मिल पाती.
स्वास्थ्य के क्षेत्र बहुचर्चित मातृ वंदन योजना का बजट भी आधा बचा रहा. प्रधानमंत्री मातृत्व योजना में 2400 करोड़ रुपया दिया गया मगर खर्च हुआ 1200 करोड़ इसी तरह स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण के बजट भी खर्चे बिना बचा रह गया इसलिये 2018-19 में इस मद से 15,343 करोड़ रुपये दिये गये तो 2019 के बजट में कम कर 10,000 करोड़ कर दिये गये.
प्रधानमंत्री कौशल निर्माण योजना का बजट भी 400 करोड़ कम कर दिया गया. यह भी पता नहीं कि बहुकौशल प्रक्षिशण संस्थानों के दिन कब फिरेंगे. विज्ञान और तकनीकी मंत्रालय का शोध बजट 609 करोड़ से कम कर 493 करोड़ रुपये कर दिया गया है. संभवतः यह अर्द्धसत्य सरकार जानती है कि भारत में ही रही अधिकांश वैज्ञानिक शोध के मूल बिंदू भी विदेशों से आयतित हैं ठीक हिट विदेशी फिल्मों की थीम पर बनी हिंदी व तेलगू फिल्मों की तरह. विज्ञान में हमारे यहां कितने सीमित पेटेंट हुए हैं और हमारे उत्पादों को किस तरह विदेशी पेटेंट करा देते है यह पुनः चर्चा का विषय है.
2015 में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत हर खेत को पानी देने की योजना भी बनी. देश के ऐसे 96 जिलों में जहां 30 प्रतिशत से कम सिंचित भूमि थी. 2018-19 के बजट में इसके लिये 2600 करोड़ रुपये दिये गये पर व्यय हो पाया 2181 करोड़. अब 2019-20 के लिये कुल जमा 903 करोड़ मिले हैं. क्या 2015 से 2018 तक हर खेत को पानी पहुंच गया ?
वहीं नीति आयोग उपाध्यक्ष स्मार्ट सिटी योजना की नाकामी छुपाते हुए बताते हैं कि सरकार का ध्यान तो गांवों पर रहा इसलिये शहर स्मार्ट होने से रह गये. पर अब मध्य वर्ग को लुभाने के लिये फिर से शहरों पर फोकस किया जायेगा. बड़ी नौकरियों के वादे टेक्सटाइल क्षेत्र में भी हुए. कहा गया था कि इसे 6000 करोड़ के पैकेज मिलेंगे पर इसके बजट में 1300 करोड़ रुपये की कमी हो गयी. दस लाख रोजगार मुहैया करने का वादा उड़न छू. सरकार ने यह भी नहीं बताया कि अटल पेंशन योजना से कितने मजदूरों को कितनी पेंशन दी जा रही है और यह भी नहीं कि कितने मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करायी गयी है. असंगठित क्षेत्र में करीब 40 करोड़ लोग मजदूरी करते हैं.
आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं को 3000 रुपये के बदले 4500 रुपये का मानदेय मिलेगा. पर क्या यह न्यूनतम मजदूरी के मानक से कहीं कम नहीं है. वहीं 2 हैक्टेयर से कम जोत के किसानों को 500 रुपये का प्रसाद मिलेगा. जिसे वह बड़ी श्रद्धा से आशीष की भांति ग्रहण करने में समर्थ होंगे. बजट में किसानों को इस सौगात देने के साथ ही 30 लाख रुपये तक के उधार की प्रक्रिया में किसी भी तरह के शुल्क देने से मुक्त कर दिया है अर्थात कोई प्रोसेसिंग, इन्सपेक्शन या सर्विस चार्ज उस पर नहीं देना होगा. जाहिर है इतना भारी उधार तो फार्म स्वामी छवि वाला किसान ही लेगा. छोटा-मोटा भूमिहार नहीं.
अंतरिम बजट में पन्द्रह हजार रुपये हर महीने कमाने वाले श्रमिकों के लिये प्रधानमंत्री श्रमयोगी मानधन योजना में कहा गया है कि अगर कोई कामगार 20 वर्ष की आयु में इस स्कीम में शामिल होता है तो उसे हर महीने सौ रुपये का योगदान करना होगा. अगर उसकी आयु 18 साल है तब जमा की जाने वाली यह राशि 55 रुपया प्रतिमाह होगी. सरकार हर माह अपनी ओर से कुछ धनराशि उसके पेंशन खाते में डालेगी. जब वह 60 साल का हो जायेगा तब उसे हर महीने तीन हजार रुपये की पेंशन मिलेगी. इस योजना में यह आशंका उठनी स्वाभाविक है कि यदि कामगार की आय पन्द्रह हजार रुपये से अधिक हो गयी तो क्या उसे इस पेंशन योजना से बाहर कर दिया जायेगा. आला अधिकारी स्रोत यह बताते हैं कि यदि सरकार चाहे तो पन्द्रह हजार को आरंभिक निर्धारक मान कर चला जा सकता है. अब यदि श्रमिक का वेतन बदला है तो इसमें वह अपनी आय का अंश डालते हुए योजना का लाभ लेता रह सकता है. दूसरा तरीका यह भी सोचा जा रहा है कि एक अवस्था में आकर अगर आय बढ़ती है तो योजना के अधीन सरकार का अंशदान योगदान कम भी किया जा सकता है. अब करीब तीस-चालीस वर्ष तक मासिक रूप से जमा करने, मजदूरी बढ़ने पर सरकारी हिस्से के संकुचन के बाद साठ वर्ष की आयु में जो तीन हजार रुपल्ली मिलेगी उसकी क्रय शक्ति क्षमता क्या होगी ? अपने परिवार के जीवन यापन में कितनी राशन रसद की टोकरी क्रय कर पायेगा ? मुद्रा प्रसार इतनी लंबी अवधि में अपनी गति बढ़ायेगा ही. ऐसे प्रश्नों पर अधिक सर खुजाने की जरूरत नहीं शायद गंजे होकर नाखून बढ़ाना खुद ही बदनसीबी हो.
नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार पूरे आशावाद से कहते हैं कि अंतरिम बजट के बाद मोदी सरकार को फिर से 5 साल का मौका मिलेगा और जुलाई 2019 में वह पूर्ण बजट पेश करेगी. यह वह सम-विच्छेद बिंदू है जिसे अर्थशास्त्र में ब्रेक इवन पोइंट कहते हैं. नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया साहब ने भी कहा कि मजदूर-किसान को भी बड़ी राहत मिली है. मध्यवर्ग के शिक्षित प्रक्षिशित प्रशासनिक प्रबंधकीय तकनीकी कुलियों और सरकारी नौकरी में घिस चुके तटस्थ उदासीन हो गये सीनियर सिटीजन के पास सामान्यतः पेंशन आय, ब्याज की आय और हाड़ हाड़ गला क्या कुछ गिरवी रख कहां-कहां से उधार पटा बने मकान के किराये से मिलने वाली रेंटल आय होती है. बड़ा ध्यान रखा है बजट प्रभू ने कि इन तीनों तरह की आय पर कौम्प्लीऐंस भार सिकोड़ दिया है. ईमानदार का का तमगा लगाये इस वर्ग के करदाता को अंतरिम बजट में से सेक्शन 87 ए के अंतर्गत 2,500 रुपये की छूट मिलती रही थी जब उसकी आय कुल साढ़े तीन लाख से अधिक न हो. पर अगर आय 6 लाख है तो कर देयता 32,500 रुपया व 10 लाख है तो कर देयता 1,12,500 रुपये ही रहेगी. जो पहले के बराबर है. इस रकम पर स्वास्थ्य व शिक्षा का सेस 4 प्रतिशत अतिरिक्त होगा. हां अगर आय बीमा, म्यूचअल फंड में बचत कर रहे हैं तो हाउस लोन का सुख उठा रहे हैं तो थोड़ी कम कर देयता की अनुभूति कर सकते हैं.
नौकरीपेशा वर्ग को स्टेंडर्ड छूट की सीमा दस हजार से बढ़ा कर चालीस हजार कर दिया गया. करदाताओं द्वारा जो बचत की जा रही है उसके ब्याज पर बैंक पोस्ट ऑफिस, सहकारी बैंक 1 अप्रेल 2019 से इसी हिसाब से कर काटेगा. पेंशन भोगियों के लिये यह दस हजार से बढ़ पचास हजार रुपये होगी. इसी तरह किराये पर छूट की सीमा 1,80,000 रुपये वार्षिक से बढ़ा कर 2,40,000 रुपये कर दी गयी है. सेक्शन 54 में अपने एक आवास की बिक्री से हुए पूंजीगत लाभ को बचाने के लिये दूसरी आवास सम्पत्ति में विनियोग का सुनहरी मौका दे दिया गया है. सेक्शन 80-बीए में आवास परियोजना की समय सीमा को 31 मार्च 2019 से एक साल के लिये विस्तारित कर 31 मार्च 2020 कर दिया गया है. यदि एक व्यक्ति के पास अपने रहने के लिये एक से अधिक ठिकाने हैं तो उसकी प्राथमिकता के अनुसार केवल एक आवास संपत्ति को उसके स्वयं के रहने के लिये माना जायेगा तथा दूसरी को सेक्शन 23 के अधीन हाउस प्रोपर्टी के तहत किराया वसूल करने वाली मान लिया जायेगा. वित्तीय बिल 2019 में इस पर सुधार करते हुए प्रस्तावित किया कि वह किन्हीं दो आवासों पर वार्षिक आय को तब शून्य माने जब वह दोनों को स्वयं के रहने हेतु घोषित करे. याने वह स्वयं के रहने की दो संपत्तियों का दावा कर सकता है. तब दोनों आवासों के संदर्भ में उधार ली गयी पूंजी पर ब्याज की छूट ली जा सकती है. छूट की सकल मौद्रिक सीमा दो लाख रुपये रहेगी. नौकरी के स्थानों, बच्चों की शिक्षा व बुजुर्गों की देखरेख जैसे बिंदुओं को देखते हुए दो स्थानों में आवासों को बना रखना और उस पर सरकार द्वारा छूट मिलना मध्यवर्गीय युवा अधेड़ पेशेवरों व सरकारी कॉरपोरेट नौकरी में संलग्न वर्ग के लिये असीम प्रसन्नता लेकर आ गया है. सुकून से स्मार्ट फोन पर चमगोइयां करने और टीवी चैनलों के जंगल में राजशाही के पंचतंत्र की गाथायें देखने का अविरल वरदान मिला है उसे – बी.एस.एन.एल. तो पहाड़ पठार मैदान समुद्रतट तक अपना जंजाल फैलाता रहा पर अब सब कुछ देखने की डिजिटल क्रांति तो जियो ही ला पाया. अब सहोदर इंडीपेंडेंट भी आ गया है तो सरकारी संस्तुतियों को चरम बिंदु तक स्तम्भित कीजिये. फरवरी 1 से एनडीटीवी भी गायब कर दिया है उसने.
हम धाराओं, संकल्पनाओं, मान्यताओं में जीते हैं. अनुभव सिद्ध अवलोकन के लिये चाहिये सोच और संवेदना जो यह तय करती है कि डिजिटल इंडिया के लिये हम किन आर्थिक सुविधाओं का वरण करेंगे. और ग्रामीण मजूर भारत के लिये हमें कौन से अनार्थिक घटकों की बलि चढ़ानी होगी. प्रश्न तटस्थता व उदासीनता का नहीं प्राथमिकता चयन और प्रकट अधिमान का है. परिवेश-पारिस्थितिकी-पर्यावरण के साथ बहुरेंगे सांस्कृतिक मूल्यों के उत्थान और अघः पतन की कितनी अचीन्हीं संभावनायें हैं…..आगे.
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