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उत्तराखंड के जख्म हरे कर गयी यह उड़ान

योगेश भट्ट देहरादून में रहते हैं. योगेश उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकारों में शामिल हैं. वर्तमान में  दैनिक उत्तराखंड में कार्यरत हैं.

देहरादून हवाई अड्डे से स्पाइस जेट के विमान ने जब बायो फ्यूल से उड़ान भरी तो सिर्फ देश की ही नहीं दुनिया की नजरें भी उत्तराखंड पर थी. एक ओर देहरादून स्थित भारतीय पेट्रोलियम संस्थान के वैज्ञानिकों की नौ साल की मेहनत को कामयाबी के ‘पंख’ लगने जा रहे थे तो दूसरी ओर छत्तीसगढ़ और राजस्थान के किसानों के लिए जेट्रोफा की खेती मुनाफे का सौदा होने जा रही थी. विमान के दिल्ली में सुरक्षित उतरते ही मानो वर्षों पुराना एक सपना साकार हो गया. भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया, जो विमान उड़ाने में बायो फ्यूल का इस्तेमाल कर रहे हैं. निसंदेह भविष्य के लिहाज से देश के लिये यह बड़ी उपलब्धि है.

उम्मीद की जा रही है कि विमानों में ‘बायो’ फ्यूल यानी जैव ईधन के इस्तेमाल से किराये की दरों में बीस प्रतिशत तक की कमी आएगी. पर्यावरण के लिहाज से भी इसे बेहद अहम माना जा रहा है, अनुमान है कि इसके इस्तेमाल से कार्बन उत्सर्जन में लगभग 60 फीसदी की कमी आएगी. इस उपलब्धि में उत्तराखंड की भी बड़ी भूमिका हो सकती थी, लेकिन अपने नकारेपन के चलते उत्तराखंड इस उपलब्धि में हाशिये पर है. प्रदेश के राजनेताओं और नौकरशाहों को शर्म आनी चाहिए कि जिस जेट्रोफा से इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है, उत्तराखंड में उसी जेट्रोफा परियोजना को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया गया. प्रदेश में पंद्रह साल पहले शुरू की गयी 25 करोड़ रुपये की जेट्रोफा परियोजना यदि राजनेताओं, अफसरों और ठेकेदारों के भ्रष्टाचार की भेंट नहीं चढ़ी होती तो देश में आज बायोफ्यूल के उत्पादन के लिए उत्तराखंड जेट्रोफा का बड़ा उत्पादक होता.

स्पाइस जेट की बायो फ्यूल से सफल उड़ान ने उत्तराखंड को घोटाले से मिले जख्म ‘हरे’ कर दिये हैं. विडंबना देखिए तकरीबन डेढ़ दशक पहले जेट्रोफा से बायो फ्यूल उत्पादन का सपना उत्तराखंड को दिखाया गया, खूब प्रचार हुआ करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाया गया. अंतत: उत्तराखंड में जेट्राफा से बायोफ्यूल तैयार तो हुआ लेकिन वह उत्तराखंड बायोफ्यूल बोर्ड ने तैयार नहीं किया. उत्तराखंड में पंद्रह साल पहले जो जेट्रोफा परियोजना शुरू की गयी थी उसका इसमें कोई योगदान नहीं रहा. बायोफ्यूल का उत्पादन करने के लिये भारतीय पेट्रोलियम संस्थान ने छत्तीसगढ़ और राजस्थान के किसानों से जेट्रोफा लिया. सच यह है कि उत्तराखंड जेट्रोफा देता भी कहां से, यहां तो करोड़ों रुपये की जेट्रोफा परियोजना सिर्फ कागजों में ही चलती रही. पहले ही पायेदान पर यहां पूरी परियोजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी थी. दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि करोड़ों रुपये के घोटाले को अंजाम देने वालों का पंद्रह साल में बाल तक बांका नहीं हुआ. जबकि उत्तराखंड में जेट्रोफा घोटाले को ठीक बिहार के चारा घोटाले की तर्ज पर अंजाम दिया गया. तकरीबन 25 करोड़ रुपये की इस परियोजना से संबंधित दस्तावेज तक गायब हो चुके हैं. जिम्मेदार अफसरों ने परियोजना की जांच विजिलेंस को सौंप कर अपना पल्ला झाड़ लिया है. दस्तावेजों के अभाव में विजिलेंस जांच वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ी है.

प्रदेश में जेट्रोफा परियोजना सन 2003 में एनडी तिवारी के मुख्यमंत्रित्व काल में लायी गयी. योजना के लिये उस वक्त बकायदा उत्तरांचल बायो फ्यूल बोर्ड गठित किया गया. उत्तरांचल बायो फ्यूल नाम की कम्पनी के साथ परियोजना का करार भी हुआ. परियोजना के तहत जेट्रोफा की पौध वन विभाग के माध्यम से किसानों को दी जानी थी, किसानों से जेट्रोफा की खरीद बोर्ड करता और उसका इस्तेमाल बायोफ्यूल तैयार करने में किया जाता. उस वक्त बड़े-बड़े सपने दिखाये गये. योजना के आकार का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बायो फ्यूल तैयार करने के लिए प्रदेश में प्लांट की भी स्थापना की गयी, कहते हैं कि नीयत में खोट हो तो कोई भी योजना कामयाब नहीं होती. इस योजना के साथ यही हुआ. अफसरों और राजनेताओं की नीयत में खोट के चलते पहले ही पायेदान पर जेट्रोफा योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयी. नतीजा योजना व्यवहारिक धरातल के बजाय अधिकतर कागजों में चलायी गयी. योजना में जैविक खाद और जेट्रोफा पौधों की ढुलाई के नाम पर जिन वाहनों पर धनराशि व्यय दिखायी गयी उनके नम्बर स्कूटर और मोटरसाइकिलों के निकले. एक जांच में यह खुलासा हुआ कि योजना में जिन नम्बरों पर भुगतान हुआ है उनमें से 85 फीसदी नम्बर फर्जी हैं. जहां जेट्रोफा का पौधरोपण दिखाया गया वहां अधिकांश स्थानों पर जेट्रोफा था ही नहीं.

मौजूदा स्थिति यह है कि जिस कंपनी से परियोजना का करार हुआ वह भी लापता है. बायोफ्यूल बोर्ड ने जो प्लांट स्थापित किया था, उसे कुछ समय पहले औने-पौने दाम पर रूचि सोया नाम की कंपनी को दिया जा चुका है. जानकारों की मानें तो इस कंपनी की योजना भी जेट्रोफा से बायोफ्यूल तैयार करने की है. जहां तक सरकार और प्रदेश के वन विभाग का सवाल है तो जेट्रोफा का अब कोई नाम भी नहीं लेता. इस उपलब्धि के मौके पर उत्तराखंड को एक बार फिर नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है. प्रदेश में यदि वाकई जेट्रोफा की संभावना है तो पुराने अनुभवों से सबक लेते हुए सरकार को ईमानदारी से योजना तैयार करनी चाहिए. काश सरकारों ने थोड़ा ईमानदारी दिखायी होती, तो आज पछताना नहीं पड़ता. जिम्मेदार राजनेताओं और अफसरों ने निजी हितों से ऊपर उठकर काम किया होता तो उत्तराखंड यूं शर्मसार नहीं होता.

 

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