बागेश्वर में आपदा की दृष्टि से संवेदनशील गांवों के विस्थापन के मामले में सरकार चुप्पी साधे है. जबकि भूवैज्ञानिकों ने सरकार को चिह्नित संवेदनशील दर्जनों गांवों के शीघ्र विस्थापन की रिपोर्ट कई बार शासन को भेजी जा चुकी है. रुद्रप्रयाग, बागेश्वर, चमोली, टिहरी, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ आदि जिलों को भूवैज्ञानिकों ने आपदा से प्रभावित, भूस्खलन की दृष्टि से अति संवेदनशील गांवों को अन्यत्र विस्थापन के लिए कई बार सुझाव दिया लेकिन सालों बाद भी हाल-बदहाल है.
अकेले बागेश्वर जिले के 20 गांवों में भूस्खलन का खतरा मंडरा रहा है. कपकोट ब्लाक के 16 तथा बागेश्वर ब्लाक के 4 गांवों को विस्थापन के लिये चिह्नित किया गया. सरकारी सुस्ती का आलम यह है कि कई साल बाद भी सरकार की तकनीकी टीम आज तक गांवों के निरीक्षण के लिए बागेश्वर नहीं पहुंच पाई है.
टिहरी बांध झील का जल स्तर सालों से कई परिवार को दहशत में जीने को मजबूर कर रहा है. झील किनारे रहने वाले 17 गाँवों के 450 परिवार मानसून में भूमि भू-धंसाव व भूस्खलन की संभावनाओं से भय में है. विगत कई वर्षो से प्रभावित गाँवों का पुनर्वास नहीं हो पाया हैं.
वर्ष 2010 में टिहरी बांध जलस्तर आरएल 830 पहुँचने पर झील के किनारे भू-धंसाव की समस्या हुई थी. तब तत्कालीन सरकार ने विशेषज्ञ समिति गठित कर आसपास के 45 गाँवों का भू-गर्भीय सर्वेक्षण करवाया था. सर्वेक्षण रिपोर्ट में भिलंगना घाटी के 9 व भगीरथी घाटी के 8 गाँवों को खतरे की जद में पाया था. 2013 में सरकार ने इन 17 गाँवों के 450 परिवारों के पुनर्वास की नीति बनाई जो आज भी कागजों तक ही सीमित है. लगता है कि सरकार किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रही है.
इस वर्ष भी टिहरी झील का जलस्तर 805 मीटर के करीब तक पहुँचा.और लगातार बढ़ता जा रहा. लेकिन सरकार सात सालों के बाद भी पुनर्वास नीति को जमीन पर नहीं उतार सकी है. टिहरी पुर्नवास नीति 1998 व भू-गर्भीय सर्वेक्षण के बाद बनाई गई 2013 की नीति के अंतर्गत भिलंगना घाटी खांड, धरामंडल, भातखंड, बड़कोट, नंदगाँव, कैल्बागी, पिलखी, गोजयाड़ा, बौर गाँवों व इसके साथ ही भागीरथी घाटी के गडोली, रौलाकोट, गोजमेर, शिल्पा उप्पू, सरोठ, तिवाड, चिन्याली सौड़, नागड़ी छोटी गाँवों के पुर्नवास के लिए देहरादून में 157. 94 हेक्टेयर वन भूमि चिह्नित ही गयी थी. गौरतलब है कि सालों बाद भी इस मसले पर अभी तक कागजी खानापूर्ति के सिवाय धरातल पर कुछ भी नहीं हो पाया है. ग्रामीणों की दयनीय स्थिति को देखने के बाद भी सरकार का दिल नहीं पसीज रहा है.
अन्तरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार जहां भी चट्टान आधारित बांध बनते हैं वे अति सुरक्षित क्षेत्र में बनने चाहिए. 1991 में उत्तरकाशी में जो भूकम्प आया था वह रिक्टर पैमाने पर 8.5 की तीव्रता का था. टिहरी बांध का डिजाइन जिसे रूसी एवं भारतीय विशेषज्ञों ने तैयार किया है केवल 9 एम. एम. तीव्रता के भूकम्प को सहन कर सकता है. इससे अधिक पैमाने का भूकम्प आने पर यह धराशायी हो जाएगा. इस तरह की दशा में बड़ी तबाही का अंदेशा था.
हिमालय का पर्वतीय क्षेत्र काफी कच्चा हैं. इसलिए गंगा में बहने वाले जल में मिट्टी की मात्रा अधिक होती हैं. देश की सभी नदियों से अधिक मिट्टी गंगा जल में रहती हैं. अत: जब गंगा के पानी को जलाशय मे रोका जाएगा तो उसमें गाद भरने की दर देश के किसी भी अन्य बांध में गाद भरने की दर से अधिक होगी. दूसरी ओर टिहरी में जिस स्थान पर जलाशय बनेगा वहाँ के आस-पास का पहाड़ भी अत्यंत कच्चा है.
जलाशय में पानी भर जाने पर पहाड़ की मिट्टी कटकर जलाशय में भरेगी और गंगा द्वारा गंगोत्री से बहाकर लायी गयी मिट्टी तथा जलाशय के आसपास के पहाड़ से कटकर आयी मिट्टी दोनों मिलकर जलाशय को भरेंगे. गाद भरने की दर के अनुमान के मुताबिक टिहरी बांध की अधिकतम उम्र 40 वर्ष ही आँकी गई हैं. अत: 40 वर्षो के अल्प लाभ के लिए करोड़ों लोगों के सिर पर हमेशा मौत की तलवार लटकाए रखना लाखों लोगों को घर-बार छुड़ाकर विस्थापित कर देना एवं भागीरथी और भिलंगना की सुरम्य घाटियो को नष्ट कर देना पूरी तरह आत्मघाती होगा.
विगत वर्ष संसद की एक समिति ने कहा था कि उत्तराखंड में टिहरी परियोजना द्वारा क्षेत्र में पौधारोपण कार्य नहीं करने के कारण भूस्खलन के रूप में बड़ा पर्यावरणीय खतरा उत्पन्न हो सकता है. और ऐसे में वृक्षारोपण दीर्घकालीन समाधान साबित हो सकते हैं. लोकसभा में पेश गृह मंत्रालय से संबंधित आपदा प्रबंधन पर याचिका समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तराखंड में 1400 मेगावाट का विद्युत उत्पादन कर रही टिहरी परियोजना ने क्षेत्र में पौधारोपण कार्य पर ध्यान नहीं दिया है जिससे पर्यावरण को खतरा उत्पन्न हुआ है.
समिति ने गौर किया कि पर्वतों पर बार-बार होने वाले भूस्खलन को कम करने में वृक्षारोपण दीर्घकालीन समाधान साबित हो सकता है. समिति ने गृह मंत्रालय से सिफारिश की कि वह राज्य सरकारों को सलाह दे कि ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिसमें स्थानीय लोगों को पौधारोपण कार्य कलापों में शामिल किया जा सके. साथ ही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के कार्यकलापों को इसमें प्रभावी तरीके से शामिल करने की भी समिति ने सिफारिश की है.
तमाम विशेषज्ञों की राय व गृह मंत्रालय से सम्बंधित आपदा प्रबंध पर याचिका समिति की रिपोर्ट में आवश्यक क़दमों को उठाने के निर्देशों के बाद भी राज्य सरकार निद्रा की मुद्रा में है. स्थानीय ग्रामीण जहां भय में जीने को विवश है वहीं पर्यावरणविद भी भविष्य को लेकर चिंतित है. इन सब के बाद भी सरकार की कानों में जूं तक नहीं रेंग रहीं हैं. तंत्र की इस तरह की गंभीर अनदेखी किसी बड़ी तबाही को निमंत्रण देने जैसा प्रतीत होता हैं.
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