समाज

‘झूलाघाट’ की कहानी

अल्मोड़ा-झूलाघाट अश्व-मार्ग/पैदल मार्ग का अंतिम पड़ाव सीमान्त क़स्बा झूलाघाट था. 1829 में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा बनवाये गए झूलापुल के आर-पार नदी किनारे कोई बस्ती नहीं थी. भारतीय क्षेत्र में अंतिम गांव जुलगांव था जिसकी विस्तारित नई बस्ती को झूलाघाट कस्बे के रूप में पहचान मिली. इसी प्रकार नेपाली क्षेत्र में पुल से लगती बस्ती जूलाघाट या जुलघाट कहलाई.
(History of Jhulaghat Pithoragarh)

बद्री दत्त पाण्डे जी ने अपनी पुस्तक ‘कुमाऊँ का इतिहास’ में इस सम्बन्ध में जो जानकारी दी है वह रोचक भी है और ऐतिहासिक रूप से सत्य के निकट भी है उन्ही के शब्दों में –

सोर व डोटी (नेपाल) के बीच काली नदी है. काली बड़ी तेज व गहरी नदी है. इसे पार करना कठिन है. क़िस्सा भी है ‘काली हूँ जनार नै,स्वर्ग सूं ठंगार नै’. झूलाघाट के पास नदी तंग है. इसे पहले जूआघाट भी कहते थे. कहते हैं कि यहाँ नदी इतनी तंग थी कि लोग बैलों का जुआ रख नदी पार कर लिया करते थे. अब तो फाट बहुत चौड़ा हो गया है. अब वहां लोहे का पुल या झूला होने से झूलाघाट कहलाता है. काली में स्नान करने का कुछ भी पुण्य नहीं, कहा जाता है ‘काली नयो, भालू खयो’.
(History of Jhulaghat Pithoragarh)

उपरोक्त तस्वीर में नदी का वह संकरा भाग स्पष्ट देखा जा सकता है जिस पर हल का जुआ रखकर नदी पार करने की बात कही गयी है. यह स्थान पुल के समीप ऊपर की ओर है. ढाई सौ वर्ष पूर्व निश्चित रूप से बहुत संकरा रहा होगा. उस समय का जुआघाट कालांतर में झूलाघाट के नाम से जाना जाने लगा. झूलापुल तो अन्य स्थानों और नदियों पर भी  बनाये गए लेकिन उन स्थानों के नाम के साथ झूला शब्द नहीं जुड़ा इसलिए झूला पुल से झूलाघाट नामकरण सही प्रतीत नहीं होता.

जुल गांव की नई बस्ती होने के कारण पहले जुलघाट फिर जूलाघाट और बाद में झूलाघाट हो गया. पुल के दूसरी और नेपाली क्षेत्र आज भी जूलाघाट कहलाता है. यह निश्चित है कि वर्तमान झूलाघाट क़स्बा लगभग 175 वर्ष पूर्व अस्तित्व में आया वर्ष 2013 की आपदा में जब काली ने विकराल रूप धारण किया तो नदी के किनारे स्थित दुकानों/भवनों को बहुत नुकसान पहुंचा.

संकरी घाटी में बसा प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर यह सुन्दर स्थान पंचेश्वर बाँध में डूब जायेगा और टिहरी की ऐतिहासिक नगरी की तरह डूबा हुआ इतिहास बनकर रह जायेगा.
(History of Jhulaghat Pithoragarh)

मोहम्मद नाज़िम अंसारी

पूर्व बैंक अधिकारी मोहम्मद नाज़िम अंसारी इतिहास की गहरी समझ रखते हैं. पिथौरागढ़ के रहने वाले मोहम्मद नाज़िम अंसारी से उनकी ईमेल आईडी mnansari@ymail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

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इसे भी पढ़ें : कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्र में मुहर्रम जुलूस निकालने की प्राचीन परम्परा

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