समाज

हरेला पर हो हल्ला नहीं, रोपें संस्कारों के बीज

जी रया, जाग रया, यो दिन यो मासन भेटनै रया … सिर पर हरेला (हरे तिनके) रखते हुए इन आशीर्वाद रूपी वचनों से हम खुद को धन्य समझते हैं. जिसका मतलब है, जीते रहो, जागते रहो और इस दिन से आपकी हमेशा मुलाकात होती रहे. कितना गहरा मंतव्य है इस आशीर्वाद में. कुमाउंनी समृद्ध लोकसंस्कृति का यह लोकपर्व हम सभी की बाहरी प्रकृति ही नहीं, बल्कि भीतरी प्रकृति की समृद्धि का भी परिचय कराता है. Harela Message by Ganesh Joshi

 वैसे तो हरियाली को लेकर अलग-अलग प्रदेशों व देशों में सदियों से कुछ न कुछ लोकपर्व प्रचलन में हैं, जो हमें धरा को हरा-भरा करने का संदेश देते हैं. लेकिन मुझे उत्तराखंड के मानसखंड में बेहद प्रचलित पारंपरिक पर्व हरेला बेहद रोमांचित करता है. घर के अंदर ही मंदिर के पास सात अनाज के बीजों को बोना, नौ दिन तक नियमित पूजा-अर्चना के साथ पौधों को पानी देना और फिर हरेला पर विधि-विधान से उन्हें काटना और सिर पर सजाना. बडे़-बुजुर्गों द्वारा इन तिनकों को सिर पर रखते हुए जी रया … आशीर्वाद से नवाजना. है न अनूठा पर्व.

 अगर हम सरसरी तौर पर देखें तो यह महज सामान्य सी प्रक्रिया लगती है, लेकिन जब हम इस लोकपर्व की गहराई को महसूस करते हैं तो हमें बाहरी तौर पर ही नहीं, बल्कि आंतरिक तौर पर आत्मिक सुकून भी महसूस होने लगता है. Harela Message by Ganesh Joshi

मानसून के चरम पर पहुंचते समय हरेला पर बीजों को बोने का स्पष्ट संदेश है कि हमें पूरे मनायोग से खेती-बाड़ी करनी है. हरियाली को अपने आसपास बनाए रखना है. यही तो असली जीवन है. जहां से हमें पेट भरने को अन्न और जीवन जीने के लिए प्राणवायु प्राप्त होती है. बाहरी प्रकृति को खूबसूरत बनाए रखने के लिए यह सब करना हमारे जीवन का ही अहम हिस्सा तो है.

दुनिया भर के तमाम मनोवैज्ञानिक हों या आध्यात्मिक गुरु, हर किसी का यही प्रेरणादायी संदेश होता है, बाहरी प्रकृति से हमारी मनोस्थिति प्रभावित होती है. जैसा हम बार-बार देखेंगे और उसके बारे में सोचते रहेंगे, वैसा ही हमारी आंतरिक प्रकृति भी होने लगती है. योग, ध्यान व आत्मिक सुकून का चरम सुख प्राप्त करने के लिए तो हमें प्रकृति के ही करीब रहना पड़ता है. तो हम जहां हैं, वहां की प्रकृति ठीक करने के लिए क्यों नहीं मचल उठते हैं. Harela Message by Ganesh Joshi

हरे पेड़ की छांव किसे पसंद नहीं. भोग-विलासिता वाले मेट्रो शहरों में अब हम शुद्ध हवा के लिए भी तरसने लगे हैं. कितनी महंगी कार खरीद लें, अगर कहीं कार खड़ी करनी हो तो पेड़ की छांव तलाशते हैं, ताकि गाड़ी भी खराब न हो और जब हम उसमें बैठें तो ठंडक मसहूस हो. बीमार पड़ गए तो ताजे फलों को तलाशने लगते हैं, ताकि प्रतिरोधक क्षमता बढ़े. काम का दबाव बढ़ा तो हमें सैर-सपाटे के लिए प्राकृितक सुंदरता चाहिए. प्रकृति का महत्व हमें पल-पल महसूस होता है. फिर भी हम अनदेखी कर देते हैं. पता नहीं क्यों…?

हरेला पर्व से हमें शांत और सहज होकर जीने की प्रेरणा मिलती है. ऐसे में हम पौधे रोपने जैसे पुनीत कार्य को हो-हल्ला और तस्वीरें खींचने तक सीमित क्यों करने लगे. ऐसे में हमें प्राकृतिक सुंदरता कैसे मिल पाएगी. जब हम प्रकृति से इस तरह का मजाक करते रहेंगे, तो हमारी आंतरिक प्रकृति सहज कैसे रह पाएगी. जाहिर सी बात है, प्रकृति भी हमारे साथ मजाक से ही पेश आएगी. हरियाली की बातें कर और घर की दीवारों को हरे रंग से पोत देने और घर में कृत्रिम हरे पौधे सजाने भर से हमारी आंतरिक प्रकृति वास्तविक रह पाएगी. यही सोचनीच और चिंतनीय विषय हो जाता है.

हरेला पर्व हमें यही सीख देता है कि हम खुद में संस्कारों के ऐसे बीज रोपते रहें, ताकि हमारी बाहरी व आंतरिक, दोनों प्रकृति की धरा हरी-भरी हो जाए और हम प्राकृतिक जीवन की लहलहाती बगिया में रमण कर उम्मीदों के पंख फैला सकें. Harela Message by Ganesh Joshi

–गणेश जोशी

यह भी पढ़ें: मेरी अबू, तू कहां गई मुझे उदास छोड़ कर

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गणेश जोशी
हल्द्वानी निवासी गणेश जोशी एक समाचारपत्र में वरिष्ठ संवाददाता हैं. गणेश सोशल मीडिया पर अपनी ‘सीधा सवाल’ सीरीज में अनेक समसामयिक मुद्दों पर ज़िम्मेदार अफसरों, नेताओं आदि को कटघरे में खड़ा करते हैं. काफल ट्री के लिए लगातार लिखते रहे हैं.

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  • गणेश जोशी जी का लेख हमैं हमारी संस्कृति रीति रिवाज हमारे बडो का हमारे प्रति स्नेह बच्चों को प्रकृति की ओर ध्यान आकर्षित कराने, उत्साह और उमंग का संचार (जो शहरी जीवन में दुर्लभ है)के साथ आत्मीयता का भाव (ये भाव भी जैसे खो गया है) का एहसास कराता है।
    हम जोशी जी के प्रति आभार और आपका धन्यवाद करते हैं ।

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