परम्परा

पकवानों की सुंगध से सराबोर रहेंगे आज पहाड़ियों के घर

अब तो पहाड़ में घर ही कम बचे हैं. बचे हुये घरों में भी बुजुर्ग दम्पति अधिक हैं या फिर ऐसे लोग जिनको आधुनिक समाज में पिछड़े और मजबूर कहा जाता है. कमजोर और मजबूर कहे जाने वाले इन कन्धों ने ही आज असल में पहाड़ की परम्पराओं को अपने मजबूत कन्धों में बचा कर रखा है.     
(Ghee Sankranti Festival Uttarakhand 2022)  

असल में अपना घर कोई नहीं छोड़ना चाहता लेकिन एक अच्छे जीवन स्तर के लिये लोगों को अपना घर छोड़ना ही पड़ता है. अच्छे जीवन स्तर की परिभाषा में अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा को हर कोई जोड़कर रखता है. अपने बच्चों और परिवार को इन्हीं मूलभूत चीजों को दिलाने के लिये ही एक पहाड़ी अपना घर छोड़ता है पर दिल के किसी कोने में सजोकर रखता है अपने पहाड़ को.

अपने पहाड़ की परम्परा को निभाने में वह सात समुन्दर पार भी संकोच नहीं करता. परम्पराओं को निभाने का काम वह किसी के कहने पर नहीं करता बल्कि अपनी जड़ों का जुड़ाव उससे इन परम्पराओं को निभवाता है. पहाड़ियों का अपनी जड़ों से जुड़ाव ही तो है जो आज के दिन दुनिया के कोने-कोने में बसे पहाड़ियों के घरों को परम्परागत पकवानों से सराबोर करेगा.       

कुमाऊं क्षेत्र में माना जाता है आज सावन के महीने का आखिरी दिन है. इसे स्थानीय बोली में मसांत कहा जाता है. मसांत का अर्थ मासांत यानी महीने का आखिरी दिन प्रतीत होता है. सावन माह के मसांत के दिन पहाड़ियों के घर पकवानों की ख़ुशबू से महक उठते हैं. पूड़ी, उड़द की दाल की पूरी व रोटी, बड़ा, पुए, मूला-लौकी-पिनालू के गाबों की सब्जी, ककड़ी का रायता आदि पकवानों को घी के साथ आज के दिन खाया जाता है.     
(Ghee Sankranti Festival Uttarakhand 2022)

पहाड़ी आज के दिन खूब पकवान खायेंगे और कल सुबह खीर में घी डालकर खायेंगे. कुमाऊँ के कुछ स्थानों में तो कल सुबह न केवल लोगों को घी पिलाया जाता है बल्कि बच्चों के नाक और सिर में भी डाला जाता है.  

पहाड़ों में कहा जाता है कि घी संक्रांति के दिन जो घी नहीं खाता वह अगले जन्म में गनेल बनता है. घोंघे को स्थानीय भाषा में गनेल कहा जाता है. गनेल अपनी अकर्मणता के चलते विश्व भर में जाना जाता है. कहते है कि गनेल एक बार में तीन साल तक के लिये सोया रह सकता है. अपने पशुधन का सेवन करने में भी आलस करने वाले के लिये गनेल से बेहतर और क्या ही उपमा हो सकती है.    

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो यह मौसम बदलने का समय है. अब बारिश कम होना शुरू होता है. स्थानीय बोली में कहा जाये तो यह चौमास के खत्म होने का समय है. अब मौसम पहले के मुकाबले बेहतर होगा. बारिश के मौसम की लतड़-फतड़ भी अब कम होगी. हो सकता है पहाड़ के पुरखों ने अगले मौसम की मेहनत के लिये कमर कसने को ही इस दिन को चुना हो.  
(Ghee Sankranti Festival Uttarakhand 2022)

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

काफल ट्री फाउंडेशन

Support Kafal Tree

.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

2 weeks ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

2 weeks ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

2 weeks ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

3 weeks ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

3 weeks ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

3 weeks ago