फोटो: विनोद उप्रेती
मिट्टी-पत्थर-पेड़-घास-पानी-धारा-गूल से लिपटा पहाड़. तलाऊँ और उपराऊँ के सीढ़ीदार खेत. सेरे भी जहां साल में दो बार अन्न उगता. ऊँची पहाड़ियों से चूता-टपकता पानी, जो नीचे आने की ठौर में,कहीं धारा बन जाता कितने नौलों में जमा होता. इसी का प्रवाह कई जगह से खाल बनाता. फिर लोगों की मेहनत लगती.थोड़ी अकल का इस्तेमाल होता और गूल बनाई जाती. देखा जाता कि इसमें सिरफ चौमास में ही रहता है पानी या साल भर कल-कल, छल-छल बहने की गुंजाईश है.
(Gharat Traditional Water-Mills Uttarakhand)
साल भर पानी बह रहा हो. ज्यादा मिट्टी-रेता-कच्यार भी न हो. ऊपर से नीचे आते पानी में वेग हो.छोटे जानवर-नानतिन गिर जाएं तो ये बगा ले जाये जैसी ताकत हो तो ये गूल बड़े प्रयोग की गुंजाईश रखती है. और इसी प्रयोग से बना दिया गया घट. घट जहां पिसाई हो अनाज की. तमाम तरह के पिश्यू. चाहे ग्युं हो या जाड़ों का रामबाण मडुआ. बर्त फराल में खाया जाने वाला उगल भी. यहाँ कल पुर्जे हिल रहे, डोल रहे पत्थर का पूरा गोला घूम रहा, ऊपर से नाज-अनाज बड़ी मंथर गति से बीच के छेद में टपक रहा. तो लो, दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय. यही हुआ घट. न जाने कब से पहाड़ में पिशुआ पीस रहा.
घट को घराट भी कहा गया. अक्सर ये घराट गाँव की साझी दौलत हुए. सांझे यानी जहां हर कोई जा अपनी पुंतुरी में सहेजे नाज की पोटली लाये. अपनी बारी आने पर गुनगुना सा सौंधा भाप छोड़ता पिस्यू ले चले और वजन के हिसाब से थोड़ा आटा वहीं छोड़ दे. ये धट का हिस्सा हुआ. कोई कांटा तराजू नहीं मोलभाव नहीं. पहाड़ में तो पानी की माप भी घट से निकले पानी से होने वाली हुई. ऐसे बोल के कि, इस नदी में इत्ता धट या घराट पानी है. इसी घराट की गूलों से खेत भी सिंचते,तलाऊँ वाले सेरे की ओर वाले. जो उपरांउ वाली जगहें होती वहाँ हाथ से चलने वाली चक्की में दम लगानी पड़ती जिनके मुट्ठे बांज या चीड़ की लकड़ी के होते. अब दाल दलनी हो तो सिल -लोड़ा, घाडू या दवनी काम में लाते जिन्हें चलाते ब्वारियों के हाथों की चूड़ियाँ खूब छनकती.
बेहतर और कारगर तकनीक की बानगी हैं घराट. जहां गाड़ गधेरों से लघु सरिताओं से, सदानीरा नदियों के तट से गूल बना कर जल की लगातार बहने वाली मात्रा को लकड़ी का पनाला बना उसमें छोड़ दिया जाता है. इससे वह एकसार वेगवान रहता है. खूब तेज बहाव वाला. अब इस बहाव प्रवाह के नीचे लगा दिया जाता है ‘फितोड़ा’. फितोड़ा लकड़ी से बना ऐसा ऐसा पंखे दार चक्का है जो जल धार पड़ते घूमेगा.
अब गूल के पानी की कलकल करती तेज धार है जो पड़ेगी फितोड़े के पंखो पर. इसके ठीक ऊपर चक्की के दो पाट होंगे. नीचे का चक्का या पाट ज्यादा वजनी होगा और स्थिर भी. फितोड़े के या पंखे के ठीक बीच का ऊपर की ओर उठी ‘बीँ’ या नुकीला सा भाग ऊपर वाले चक्के में बनाए खांचे में लगी ‘क्वेलार’ या लोहे की खपच्ची में फँसाया जाता है. यह सब जोड़ -जंतर कर जब पानी की तेज धार फितोड़े पर पड़ेगी तो पंखेदार चक्र घूमेगा. इससे चक्की का ऊपरी भाग जोड़ा गया है सो वह भी घूमेगा. अब चक्की का नीचे का पाट तो जड़ है यानी स्थिर और ऊपर का तेजी से घूम रहा है. अतः दुइ पाटन के बीच में साबुत बचे न कोय की कहावत सिद्ध हो जाएगी. अन्न के दाने ऊपर के पाट के ठीक बीच के छेद में पड़ते जायेंगे और तैयारी होगी पिश्यू की पिसाई की. अन्न की स्वाभाविक खुशबू के साथ ताता-ताता पिश्यू.
(Gharat Traditional Water-Mills Uttarakhand)
ये जो ऊपर चक्का है जिसके बीच के छेद से अनाज भीतर जा पिसता है उसकी भी कारीगरी है. और वह ऐसी कि इस ऊपर के पाट से अंदाजन तीन चार अंगुल ऊपर मजबूत रस्सी से रिंगाल का डोका लटका दिया जाता है. अब ये किसी बोट का शंकु आकार का खोखल भी हो सकता है जिसे उल्टा लटका देते हैं. कारीगर लोग तख्तों की चीर फाड़ कर रंधे से खुरच छील तिकोना बक्सा भी बना डालते जो ऊपर से पूरा खुला होगा और नीचे छोटा छेद. जैसा भी हो, ये लटकन पात्र या डोका इसे बाबिल, रामबांस या भाँग के रेशे से बटी मजबूत रस्सी से लटका दिया जाता है. डोके का निचला भाग जो चक्की के छेद के ठीक ऊपर हो वहाँ एक ‘मानी ‘या ‘पँयाई’ लगा दी जाती है जिसका मुख आगे की तरफ नाली नुमा होगा.
मानी का मतलब ही हुआ जो कहा माने. मानी या पँयाई बांज जामुन या गेठी की लकड़ी से बनी होती है. यह चक्की के छेद में डोके के अनाज को धीरे -धीरे एक ताल में डाले. अनाज की धार एकसार बनी रहे इस उद्देश्य से उसके मुख पर कभी कभार गीले आटे का लेप भी लगा देते हैं.इस मानी का जो मुख है उसके पीछे की तरफ की नाली पचीस से तीस डिग्री के कोण दे काटी जाती है.
मानी या पँयाई के पीछे की ओर छेद करके उसमें एक तिरछी लकड़ी फंसा दी जाती है. ये लकड़ी बांज, फल्यांट या कटूँज की होती है खूब मजबूत और गांठ रहित. यही वह पच्चर है जिससे मानी और डोके का संतुलन बना रहता है. वक्ते जरुरत तिरछे डंडे पर ज्योड़ा बांध, इसके मुख को ऊपरी पाट के बीच बने छेद के ठीक ऊपर कर दिया जाता है. इससे ये फायदा होगा कि दाने यहाँ वहाँ बिखरेँगे नहीं सीधे चक्की के भीतर जा पिसेंगे. डोके और मानी पर जो ज्योड़े या रस्सी बँधी होती है उस पर गांठ पाड़ दी जाती हैं. इन गांठों के अगल-बगल लकड़ी फंसा दी जाती है जिससे डोके और मानी को जरुरत के हिसाब से आगे-पीछे कर के स्थिर रखा जा सके. अब यह जो तिरछा डंडा है उस पर एक या अधिक लकड़ी के टुकड़े इस तरीके से फिट कर दिए जाते हैं कि उनका नीचे वाला हिस्सा चक्की के ऊपरी गोल पाट को लगातार छूता रहे. ये लकड़ी के टुकड़े पक्षी के आकार के होते हैं, इसलिए इनको ‘चड़ी’ कहा जाता है. एक ओर तो ये चिड़िया जैसी दिखतीं हैं तो दूसरी ओर ये हमेशा चक्की के ऊपरी पाट पर चढ़ी रहतीं हैं.अब जब चक्की का ऊपरी पाट धूमेगा तो डोके और मानी को हिलायेगा. ऐसा होने पर मानी की धार से अनाज के दाने चक्की के छेद में एकसार गिरते रहेंगे. दुइ पाटों के बीच गया अन्न अनाज पिश्यू बन झरेगा. सौंधी सी खुशबू बिखेरेगा. गरम-गरम होगा.
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घट या घराट की इस सारी तकनीक के पीछे जो असली करेंट है, वह ‘बान’ है. बान का मतलब हुआ गूल जिसका पानी बड़े जतन से बहुत खुड़पेंच लगा ऊँची जगह से करीब पेंतालिस-पचास डिग्री के कोण से ‘पन्याव’ में छोड़ दिया जाता है. लकड़ी का नालीदार पनाला पन्याव हुआ. पन्याला खूब ठोस बांज, बैंस, सानड़, साल, जामुन या चीड़ के गिंडे को काट-खुरच बनाया जाता है.. पनाले पर जो नाली काटी जाती है उसका भीतर की ओर गोल तो बाहर की तरफ संकरा होना जरुरी है. गूल की ओर पन्याले का जो हिस्सा है वह चौड़ा रखा जाता है तो नीचे की ओर का भाग संकरा. बान से पन्याव में आते ही जल के प्रवाह में तेजी आ जाती है. अब गूल में बह रहे पानी में जो घास-पात लकड़ी तिनके हों उनकी रोकथाम के लिए पनाले के मुख पर बांस को चीर कर उसके टुकड़ों से बनी जाली लगा दी जाती है. ये पनाला ऊपर ही पत्थर की दीवार पर अटका मजबूती से टिका दिया जाता है. अगर बान में बहने वाला पानी बंद करना हो तो पनाले के समीप ही एक मजबूत लकड़ी की तख्ती या चौकोर पत्थर को फिट कर देते हैं. इस तख्ती को ‘मूँअर’ कहते हैं.पनाले औसत रूप से बीस फ़ीट तक लम्बे और दो फ़ीट तक गोल होते हैं.
पनाले से आता पानी ही फितोड़े पर वेग से पड़ इसकी चकरी को घुमाता है. फितोड़ा गोल होता है. यह लकड़ी का बीच में उभरा हुआ ठोस टुकड़ा है जिसके किनारे दोनों सिरों की ओर कम चौड़े होते हैं. इसके नीचे का सिरा ज्यादा नुकीला बनाया जाता है जिस पर लोहे की कील जिसे ‘कान’ कहते हैं लगी होती है. इस कान या कील को आधार पटरे के बीच में रखे हुए एक लोहे के गुटके पर टिका होता है. इसके बदले चकमक पत्थर का बना तव या ताल भी प्रयोग किया जाता है. यह दोनों चीजें ‘तवकान’ या तालकांटा कही जातीं हैं. कई जगह इसे ‘मैण पाणी’ भी कहते हैं.
अब जो फितोड़ा है,उसके ठीक बीच में लकड़ी के पंखे लगे होते हैं. इन पंखो को ‘फिरंग’ कहते हैं जो साल या चीड़ की लकड़ी के बने होते हैं. ये फिरंग या पंखे पांच से ग्यारह तक होते हैं. इन पंखो की लम्बाई-चौड़ाई चक्की के ऊपरी पाट के भार को देखते हुए तय की जाती है. अमूमन इनकी लम्बाई एक से सवा फिट और चौड़ाई तीन चौथाई फिट तक रहती है.
फितोड़े के ऊपरी सिरे पर लोहे की एक छड़ फँसा दी जाती है. लोहे की इस छड़ को ‘बीं’ कहते हैं. यह छड़ निचले पाट या चक्के के छेद से होती हुई ऊपरी चक्के के खांचे में फिट लोहे की ‘क्लेवार’ या खपच्ची में अटका फँसा दी जाती है. लोहे की छड़ को ‘बीं’ कहते हैं.
निचले चक्के में जो छिद्र होता है उसे काष्ट के गोल टुकड़े से भली भांति पाट देते हैं जिससे अनाज छेदों में फंसे नहीं. अनाज की पिसाई को मोटा, दरदरा और बारीक पीसने की कल ‘औक्यूड़’ कहलाती है, जिसका मतलब है ऊपर उठाने वाली कल. आधार पटरे के एक कोने वाले सिरे को दीवार में मजबूती से टिका दिया जाता है. दूसरे सिरे पर मजबूत लकड़ी फंसा कर दूसरी मंजिल तक पहुंचा कर उस पर हत्थे को फिट कर देते हैं. यही ओक्यूड़ जब ऊपर की ओर करते हैं तो धट का ऊपर का चक्का निचले चक्के से ऊपर उठ जाता है और मोटा पिश्यू निकलता है. जैसे-जैसे हत्थे को नीचे की ओर करेंगे यानी ओक्यूड़ को बैठाते जायेंगे पिश्यू या आटा बारीक होता जाएगा.
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घट या घराट ज्यादातर दुमंजिले होते हैं. नीचे पन्याव या पनेला, फितोड़ा, कान या कांटा, ओक्यूड़, बीं, तव व तलपाटी के साथ इसे दबाने वाला पत्थर लगाये जाते हैं. दुमंजिले में बीं को बीच में रख नीचे के चक्के को रख दिया जाता है. इस नीचे के चक्के को ‘तवोटी पाटि’ कहते हैं जिसे स्थिर कर देते हैं. अब निचले चक्के के ठीक ऊपर ऊपरी चक्का रख देते हैं. ऊपर के चक्के के खांचे में फंसी लोहे की खपच्ची को फितोड़े से ऊपर निकली लोहे की छड़ की नोक पर टिका दिया जाता है. ये ऊपर का चक्का ‘मथरौटि पाटि’ कहा जाता है. अब सारे जोड़ जंतर में ऊपर की मंजिल में मथरौटि पाटि, तवोटि पाटि, चड़ी, क्वेलार, पनयाड़ और छत से लटकाये ज्योड़ों से जुड़ा डवक होता है.
धूप बारिश से बचाव हेतु धट में छत डाल इसे पक्का कर देते हैं. खिड़की दरवाजे सब लगते हैं. इतनी जगह की गुंजाइश होती ही है की चार पांच लोग भीतर आराम से पंसी जाएं.रात बेरात टिक जाएं. बाहर दरवाजे में कुण्डी सांकल भी चढ़ी होती है ताकि भीतर रखा माल-असबाब सुरक्षित रहे और कोई जंगली जानवर यहाँ घुस अपनी ठौर ना बना ले.
धट घराट गाँव की सांझी संपत्ति हुए. यहाँ आ अपनी अपनी थैलियों पुंतुरी के अनाज की पिसाई के साथ आपस में गपशप भी होते. पकास भी चलते. शाम होते ही घट में लंफू भी जला दिया जाता. कोने में रखे ठाकुर जी के आगे दिया भी जलता. धूप की खुशबू बिखर जाती.
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जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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