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ऐतिहासिक महत्व का है कुमाऊं का गणानाथ मंदिर

अल्मोड़ा नगर से 47 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गणानाथ मंदिर जाने के लिए अल्मोड़ा-सोमेश्वर मार्ग पर स्थिर रनमन नामक जगह से ग्नानाथ तक का 7 किलोमीटर की सीधी चढ़ाई वाला कच्चा मार्ग है. इसके अलावा अल्मोड़ा-बागेश्वर मार्ग पर ताकुला से भी एक और सीधी चढ़ाई वाला रास्ता पकड़ कर भी वहां पहुंचा जा सकता है. (Gananath Temple Almora Historical Importance)

इस मार्ग पर छोटी गाड़ियों का जा सकना मुश्किल होता है. बड़ी गाड़ियां भी मुश्किल से ही पहुँच पाती हैं. रास्ता बेहद ऊबड़खाबड़ और पथरीला है. कई जगहों पर ऐसा भी लगता है जैसे गाड़ी सीढ़ियों पर चलकर जा रही हो. एक तीसरा रास्ता सोमेश्वर के नजदीक स्थित लोद नाम की जगह से भी जाता है. यह करीब दस किलोमीटर का रास्ता है और उतना ही मुश्किल और पथरीला है. परम्परानुसार श्रद्धालु यहाँ पैदल आते रहे हैं. (Gananath Temple Almora Historical Importance)

गणानाथ के शिव. फोटो: अशोक पाण्डे
गणानाथ के शिव. फोटो: अशोक पाण्डे

समुद्रतल से 2116 मीटर की ऊंचाई पर बने गणानाथ के मंदिर को हिन्दी साहित्य में अल्मोड़ा से सम्बन्ध रखने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार मनोहर श्याम जोशी ने अपने उपन्यास ‘कसप’ में कई बार वर्णित किया है. शिव को समर्पित इस मंदिर के बारे में इसके नाम से ही जाना जा सकता है कि यहं पर स्थापित भगवान शिव अपने चंड-मुंड गणों के स्वामी हैं.

सघन वनों के बीच यहाँ एक प्राचीन गुफा में भगवान शिव का लिंग स्थापित है. गुफा के ठीक ऊपर से बहकर आती जलधारा एक वटवृक्ष के ऊपर गिरती है जिसकी जटाओं को शिव की जटाएं कहा जाता है. इन्हीं से होकर गुजरने वाली बूँदें शिवलिंग पर टपकती रहती हैं.

फोटो: अशोक पाण्डे

जलधारा का पानी लगातार गिरता रहता है और नीचे बने एक छोटे से कुंड में एकत्र होने के बाद आगे बह जाता है. इस जल को बहुत पवित्र माना जाता है. गणानाथ में विष्णु भगवान की एक भव्य प्रतिमा भी स्थापित है जिसके बारे में जनश्रुति है कि वह पहले बैजनाथ में थी. मंदिर में भैरव, देवी और योगधारी की पुरानी प्रतिमाएं भी स्थापित हैं.

विष्णु प्रतिमा. फोटो: अशोक पाण्डे

कुमाऊँ के इतिहास में गणानाथ के मंदिर का ऐतिहासिक महत्त्व भी दर्ज है. गोरखा शासनकाल में अर्थात 1790 से 1815 के बीच यहाँ पर उनकी छावनी हुआ करती थी. 23 अप्रैल 1815 को अंग्रेज सेना का सामना करता हुआ गोरखा सेनापति हस्तिदल चौतरिया यहीं मारा गया था. इसके बाद गोरखों ने आत्मसमर्पण किया था.

इसी साल कुमाऊं के चाणक्य कहे जाने वाले हर्षदेव जोशी की मृत्यु भी गणानाथ में हुई थी जहां उन्होंने अपना वसीयतनामा लिखा था.

फोटो: अशोक पाण्डे

गणानाथ के मंदिर में कार्तिक पूर्णिमा तथा होली के अवसरों पर मेले आयोजीय होते हैं जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी रहती है. कुछ दशक पूर्व तक कार्तिक पूर्णिमा का मेला यहाँ के जुआरियों का अपील कोर्ट भी हुआ करता था. कार्तिक पूर्णिमा यानी दीवाली से 15 दिन बाद बड़ी दीवाली के अवसर पर हारे हुए जुआरी अपील के रूप में अपना भाग्य आजमाने यहाँ आया करते थे. फिलहाल जुए पर सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया है और यहाँ जुआरियों का आना बंद हो चुका है.

फोटो: अशोक पाण्डे

कमलेश्वर और जागेश्वर मंदिर के समान ही यहाँ पर भी वैकुण्ठ चतुर्दशी (कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी) के अवसर पर निसंतान व पुत्र संतति की कामना करने वाली महिलाएं संतानप्राप्ति के लिए हाथों में दिया लेकर यहाँ रात भर जागरण करती हैं.

आत्मिक शान्ति प्राप्त करने के इच्छुक लोगों के लिए गणानाथ आज भी एक अतुलनीय स्थान है. यहाँ रहने के लिए मंदिर समिति द्वारा कुछेक कमरों का निर्माण कर दिया गया है. मंदिर से थोड़ा सा नीचे वन विभाग का पुराना गेस्टहाउस भी है.

गणानाथ मंदिर परिसर की कुछ और छवियाँ देखिये:

फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे
फोटो: अशोक पाण्डे

(इस आलेख को लिखने में प्रो. डी. डी. शर्मा की पुस्तक ‘उत्तराखंड ज्ञानकोष’ की मदद ली गयी है.)

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