[पिछली क़िस्त: हल्द्वानी में नहरों का जाल बिछाया था हैनरी रामजे ने]
कहा गया था कि जमरानी बाँध बनाने से तराई-भाबर ही नहीं पीलीभीत, रामपुर और बरेली तक के खेतों में हरियाली आएगी. वर्षा के अनियंत्रित जल को नियंत्रित किया जाएगा और बाढ़-भूस्खलन जैसी आपदाएं रोकी जाएंगी. विद्युत् उत्पादन तो किया ही जाएगा. परियोजना के गिनाये गए लाभों के अलावा जो अन्य लाभ थे जैसे रोजगार और पर्यटन की संभावनाएं , उन से आकर्षित हुए बिना नहीं रहा जा सकता था. ((Forgotten Pages from the History of Haldwani- 11)
यह जून 1968 की गर्मी का मौसम था. तराई-भाबर की सिरफोड़ गर्मी में तत्कालीन विद्युत् मंत्री के.एल. राव को के. सी. पन्त अपने साथ क्षेत्र के दौरे पर लाये थे. तब शायद न के. एल. राव को इस बात का अहसास हुआ होगा न स्वयं के. सी. पन्त को कि यह परियोजना क्षेत्र के लोगों की भावनाओं को छलते रहें का कारण बनेगी. के. एल. राव ने अमेरिकी विशेषज्ञ ब्रुक की टीम से सर्वेक्षण करवा कर इसे मंजूरी दे दी. 1974 में मात्र 61.25 करोड़ की लागत के साथ यह परियोजना भारत सरकार के सम्मुख प्रस्तुत की गई और 1975 में इसे स्वीकृत कर लिया गया. 1976 में नारायण दत्त तिवारी की अध्यक्षता में के. सी. पन्त ने इसका शिलान्यास भी कर दिया. 10 करोड़ की लागत का पहले चरण का कार्य भी पूरा हो गया. अब वह पहले चरण का कार्य पूरी तरह से नेस्तनाबूद हो चुका है. समय गुज़रता गया. इस मृतप्राय परियोजना को पहरा देने वालों पर तीन-चार लाख रुपये प्रति माह का खर्च होता रहा और यह खर्च बढ़ता ही चला गया. लाखों रुपयों की मशीनें व उपकरण जंग खाते रहे. जम्रानी बाँध कॉलोनी के नाम पर पूरी एक कॉलोनी का निर्माण किया गया जहाँ इस मृतप्राय योजना की लाश का पहरा देने वाले लोग जाड़ों में धूप सेंकते, चाय की दुकानों में गपोपें हांकते या ताश खेलते और गर्मियों में पंखों के नीचे ऊंघते रहते. अब वह कॉलोनी भी बंजर पड़ी है. ((Forgotten Pages from the History of Haldwani- 11)
पुनर्मूल्यांकन और पुनरीक्षण के बाद एक बार फिर इस योजना को 136.91 करोड़ और बाद में 144.84 करोड़ और फिर 934 करोड़ आंका गया. लागत का बढ़ते रहना तो ज़रूरी है और वह बढ़ती ही चली जा रही है. केंद्र सरकार, प्रदेश सरकार, योजना आयोग, सिंचाई विभाग, वित्त आयोग, पर्यावरण विभाग, वन विभाग और इसी तरह के सम्बद्ध- असम्बद्ध मंत्रालयों में इस जमरानी बाँध परियोजना की फाइल घूमती फिर रही है. इतने वर्षों के अनुभव के आधार पर वह इस क्षेत्र के निवासियों को यह सन्देश देने लायक हो गई है कि उनके उजड़ने के दिन आ गए हैं. वह ये कहने को भी बेताब है कि यदि उन्हें जम्रानी बाँध चाहिए तो नारा दीजिये कि यह बाँध क्षेत्र के विनाश का प्रतीक है क्योंकि सरकारें विरोध को अधिक महत्व देती हैं. टिहरी बाँध का उदाहरण सामने है. यदि कभी योजना को ज़रूरी मानकर शुरू कर दिया गया तो इंजीनियर सरकार को रिपोर्ट देंगे और बताएंगे कि यहाँ तो अब गारा बनाने के लिए भी पानी नहीं बचा है. बाँध कहाँ बनाएं? (Forgotten Pages from the History of Haldwani- 11)
जलस्तर के गिरने और नदियों में पानी की कमी के साथ बाढ़ की विभीषिका को भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता है. जमरानी बाँध परियोजना भी एक दूरदृष्टि की परियोजना थी लेकिन वर्तमान में यह राजनैतिक चक्र में फंस कर दम तो तोड़ ही चुकी है, आने वाला भविष्य भी क्षेत्र के निवासियों के लिए शुभ नहीं होने वाला. पहले-पहले इस परियोजना में रुकावट के लिए नारायण दत्त तिवारी और के. सी. पन्त के बीच की खींचतान को ज़िम्मेदार ठहराया जाता था. कहा जाने लगा कि पन्त जी ने इसका शिलान्यास किया है इसलिए तिवारी जी इसमें अड़ंगा डाल रहे हैं. लेकिन अब जब इस क्षेत्र से इन दोनों नेताओं का कोई सम्बन्ध नहीं रह गया है, समझ में नहीं आता अड़ंगा डालने वाला है कौन. यह कोई नहीं बता सकता. सभी कहते हैं कि जमरानी बाँध ज़रूरी है. इसके विरोध में खडा कोई नज़र नहीं आता. चुनाव आते हैं तो जमरानी बाँध हमेशा शीर्ष पर होता है. चुनाव ख़त्म होते ही वह हाशिये में चला जाता है.
इस बाँध को लेकर किसान आन्दोलन करते हैं, सामाजिक संगठन आन्दोलन करते हैं, राजनैतिक दल धरना देते हैं. नेता आते हैं और इस बहुउद्देश्यीय परियोजना को क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण बतलाते हैं. ईंट से ईंट बजा देने का नारा देते हैं. चुनावबाजों के लिए यह एक अच्छी वैतरिणी है.
प्रचंड गर्मी की तपिश में पेयजल के लिए सड़क पर उतरने वाले लोगों की और से सरकार का ध्यान हर साल जमरानी बाँध की कोरी घोषणाओं की तरफ आकर्षित किया जाता है, नेताओं की घोषणाओं को याद दिलाया जाता है और चेतावनी दी जाती है कि अविलम्ब इस तरफ ध्यान न दिए जाने की सूरत में जन आन्दोलन छेड़ा जाएगा. लेकिन लगता है ऐसे आन्दोलन भी प्रायोजित ही होते हैं!
क्षेत्र के पुराने बाशिंदों का कहना है कि इस क्षेत्र के बारे में हमारी वर्तमान सरकारों से अधिक संजीदा तो अंग्रेज हुकूमत थी – चाहे वह जल समस्या के लिए हो चाहे जंगल को सुरक्षित रखने के लिए. ब्रिटिश हुकूमत के दौरान भाबर क्षेत्र की जिस नाहर व्यवस्था के कारण गाँवों को बसना आसान हुआ आज उन नहरों का रखरखाव तक अव्यवस्थित हो चुका है. अँगरेज़ शासकों ने भीमताल क्षेत्र की झीलों का जल भाबर क्षेत्र के लिए आरक्षित किया हुआ था. सन 1895 में लोक निर्माण विभाग की सिंचाई शाखा को एक अधिसूचना जारी की गई थी जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि नैनीताल, सातताल, भीमताल और नौकुचियाताल झीलों का पानी भाबर क्षेत्र के पेयजल के लिए दिया जाएगा. इसी अधिसूचना के तहत ही गौला नदी का जलस्तर घटने पर हर वर्ष 15 मई को भीमताल झील का पानी गौला में छोड़ दिया जाता है. लेकिन बढ़ती आबादी और घटते जलस्तर के चलते अब यह व्यवस्था नाकाफी होती जा रही है. क्षेत्र के जल संकट का इकलौता समाधान अब तक लटके हुए जमरानी बाँध में ही रह गया है. (Forgotten Pages from the History of Haldwani- 11)
(जारी है)
स्व. आनंद बल्लभ उप्रेती की पुस्तक हल्द्वानी- स्मृतियों के झरोखे से के आधार पर
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