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100 साल पुराना है धनाई मिष्ठान भण्डार का इतिहास

अल्मोड़ा में खीम सिंह-मोहन सिंह की बालमिठाई, तो श्रीनगर में धनाईजी के पेड़ों का जबा़ब नहीं है. दशकों पहले हनुमान मंदिर में बूंदी का प्रसाद चढ़ाने वाले भक्तों की भीड़ यहां हर शाम दिखती थी. एक शताब्दी का फैलाव लिए यह प्रतिष्ठान श्रीनगर के विगत 100 सालों की कही-अनकही बातों और घटनाओं का अहसास दिलाता है. वर्तमान में इसके संचालक कोठड निवासी दिगम्बर सिंह धनाई (65 वर्ष) बताते हैं – “मेरे दादा फतेसिंह धनाई जी ने सन् 1919 में इस दुकान की शुरुवात पेड़ा, सिंगोरी, कलाकंद, जलेबी, सेल और चाय-पकौड़ी बेचने से की थी. सन् 1964 में दादाजी की मृत्यु के बाद पिताजी (गोपालसिंह धनाई) ने दुकान संभाली और सन् 1991 में उनके स्वर्गवास होने पर मैं इस पैतृक व्यवसाय को संचालित कर रहा हूं. बड़े परिवार (5 भाई एवं 3 बहिन) में बड़ा होने का दायित्व निभाते हुए बचपन से ही पिता के साथ उनके इस काम में बराबर सहयोगी रहा हूं. सन् 1975 में राइका श्रीनगर से इंटर पास करने के बाद जीवकोपार्जन के लिए यही पैतृक कार्य को करने का मैंने मन बनाया था.” (Dhanai Mishthann Bhandar 100 Years Old)

देश-दुनिया में श्रीनगर (गढ़वाल) से ताल्लुक रखने वाले लोगों के लिए ‘धनाई मिष्ठान भण्डार’ के पेड़े और सिंगोरी आज भी पहली पंसद हैं. मावा, बूरा, चीनी और बड़ी ईलाईची के निर्धारित मिश्रण को घोटने की कलात्मक कला का ही यह कमाल है. पहले मिट्टी की कटोरियों में पेडे़ और मालू के पत्तों में लिपटाकर सिंगोरियां बनाई जाती थी. लिहाजा पेड़ों में मिट्टी और सिंगोरियों में मालू के पत्तों की सुंगध उसके स्वाद को और स्वादिष्ट बना देता था. मिट्टी की वे कटोरियां अब बनती नहीं है, इसलिए पेड़ों की वो रंगत कम होना लाजिमी है. उसी तरह सिंगोरियों का प्रचलन अब बहुत कम हो गया है, क्योंकि मालू के पत्ते अब मिल नहीं पाते हैं. (Dhanai Mishthann Bhandar 100 Years Old)

सन् 1919 में श्रीनगर मोटर सड़क की सुविधा से वर्षों दूर था. उच्च पर्वतीय और मैदानी इलाकों को पैदल आने-जाने वाले लोगों के लिए श्रीनगर प्रमुख विश्राम स्थल था. उस चहल-पहल वाले दौर में अपर बाजार, श्रीनगर में स्थित धनाईजी की दुकान के पेड़े और सिंगोरियां मशहूर होने लगी थी. श्रीनगर के आस-पास के गांवों यथा- भिऊंपाणी, पनसौड़, मरगांव, उपणधारी, लक्षमोली, सुपांणा, बगवान, मलेथा, तल्लाकोट आदि गांवों से मावा, दूध, दही, मालू के पत्ते, जलाऊ लकड़ी रोजाना भरपूर मात्रा में आती थी. तब अलकनंदा नदी पर कई जगह नाव चला करती थी. लोगों और सामान का आदान-प्रदान का यही प्रमुख साधन था. समय के साथ गांवों की जीविका के तौर-तरीके जैसे-जैसे बदलते गए उसी के अनुरूप नगरीय व्यवसायों में भी तब्दीली आती गई. (Dhanai Mishthann Bhandar 100 Years Old)

दिगम्बरसिंह धनाई बताते हैं कि पहले के मुकाबले अब गांवों से मावा और दूध 10 प्रतिशत भी नहीं आ पाता है. जाहिर है कि मैदानी शहरों से आने वाले कच्चे माल से पेड़े और अन्य मिठाईयां बनती हैं. लेकिन यह बात भी है कि अपनी युवाकाल में फुटबाल और हाकी के लोकप्रिय खिलाड़ी रहे दिगम्बरसिंह धनाई मानते हैं कि निजी जीवन के खान-पान में सात्विकता और शुद्धता को अपनाते हुए वे अपनी व्यावसायिक साख को बरकरार रखे हुए हैं. साथ ही पेड़े बनाने में जो विशिष्ट महारथ उन्होने हासिल है, उससे श्रीनगरी पेड़ों की लोकप्रियता कम नहीं हुई है. तभी तो इस बातचीत में मित्र अनिल स्वामी धनाई मिष्ठान भंण्डार को श्रीनगर के गौरव से विभूषित करते हैं.

-डॉ. अरुण कुकसाल

लेखक

अरुण कुकसाल

(वरिष्ठ पत्रकार व संस्कृतिकर्मी अरुण कुकसाल का यह लेख उनकी अनुमति से उनकी फेसबुक वॉल से लिया गया है)

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  • Dhanai जी की सिंगोरी, पेड़े अर हनुमान जी का प्रसाद की बात ही अलग है ।

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