कथा

लोककथा : मुर्दे के साथ ब्याह

नियति जैसे अभागी रुकमा से रूठी थी. रुकमा के नामकरण के बाद ही उसके पिता चल बसे. लेकिन इजा ने रुकमा को कभी पिता की कमी महसूस नहीं होने दी. जितना भी बस में था वह रुकमा के लिए करती. पिता के भी हिस्से का प्यार रुकमा को मां से ही मिला. वक़्त का पहिया घूमा और रुकमा बड़ी हो गयी. जवान बेटी को देख मां को उसके ब्याह की चिंता सताने लगी. जवान बेटी को अकेले कैसे संभाले, किसी अच्छे से घर में इसका ब्याह मेरे जीवित रहते हो जाये तो मुझ सा भाग्यवान भला और कौन होगा — रुकमा की मां सोचती. (Folklore Murde ke Sath Byah)

मां ने पंडित को बुलाकर रुकमा का चिन्ह दिखाने का फैसला लिया. बूढ़े पंडित के माथे पर लकीरें खिंची देख मां परेशान हुई. अब घर में कोई और तो था नहीं जिसे इस दुर्योग के बारे में बताया जाता. सो पंडित ने रुकमा की इजा को ही बता देना उचित समझा —

“अब से ठीक एक पखवाड़े बाद जब चंद्रमा कृष्ण पक्ष में होगा तो रुकमा की मां की मृत्यु हो जाएगी, कुंडली का यही योग है.” “लेकिन इसके छह माह बाद रुकमा की मुलाकात एक मुर्दे से होगी, उसी से रुकमा का ब्याह होगा.”

अब मां अपने और रुकमा के भाग को कोसने के अलावा और कर भी क्या सकती थी. पहाड़ सी बात का बोझ लिए रुकमा की मां चल बसी. मरने से पहले बेटी को उसका भविष्य बताया और उससे निपटने के लिए जरूरी सलाहें भी दीं. वक़्त के इम्तहानों से गुजरकर आगे बढ़ना तो रुकमा के भाग में जनम से ही थी. उसका जीवन धीरे-धीरे पटरी पर आने लगा. वह खेती-बाड़ी, जानवरों का साना-पानी, चूल्हा-चौका वह अकेले ही निपटती. और भला कर भी क्या सकती थी.

जीवन की इसी भाग-दौड़ में रुकमा को एक दिन एक व्यक्ति बीच रास्ते पर पड़ा दिखाई दिया. साँसे टटोली तो मालूम पड़ा कि यह मारा हुआ है. पंडित की भविष्यवाणी याद कर रुकमा उसे घर ले आई. घर आकर उसने मुर्दे को जमीन पर लिटा दिया और महादेव का नाम जपने लगी.

देर रात दरवाजे की खटखट ने रुकमा को चौंका दिया. इतनी रात गए भला कौन होगा. दरांती हाथ में पकड़ कर दरवाजे की झिर्रियों से झाँका तो सामने पाया बाहर एक औरत है. अपनी जैसे हतभागी सोच रुकमा ने किवाड़ खोले. उस औरत ने अपनी कहानी सुनाकर एक रात का आसरा मांगा. इतनी रात गए एक अकेली औरत को आसरा न देना बहुत बड़ा पाप होता. रुकमा ने जो भी भोजन बचा उसे खाने को दिया. उसके बाद वह दोबारा उस आदमी का सर गोद में रखकर महादेव की साधना में लग गयी.

सच्चे मन से किये गए महादेव-महादेव की गूँज देवलोक में सुनाई देने लगी. महादेव और पार्वती के कानों में जब यह आवाज पड़ी तो वे अपनी इस भक्तिन को तारने के लिए मृत्युलोक पहुंच गए. उन्होंने जोगियों का वेश धारण किया और रुकमा की धेली पर भिक्षा की गुहार लगायी. रुकमा ने आश्रित औरत से मदद मांगी कि कुछ देर के लिए इस व्यक्ति का सर अपनी गोद में रख ले. रुकमा ने थोड़ा चावल निकाला और जोगियों को देने चल दी.     

इधर भिक्षा पात्र में चावल के दाने झरते और उधर मृत युवक की साँसे चल निकलती. महादेव ने मृत युवक को जीवन दान जो दे दिया था. उमा-महादेव के आशीष से मृत युवक का बेजान शरीर जीवित हो उठा. युवक चौककर उठा और अपना सर गोद में लिए बैठी अजनबी आश्रिता से अपने यहां पहुँचने का कारण जानने लगा. उसने बताया कि वह एक राजकुमार है जिसे उसके ही मित्रों ने षड्यंत्र रचकर जान से मार दिया था. अजनबी ने उसे बताया कि उसका शव राह में पड़ा था जिसे वह उठाकर यहां तक लायी है.

इसी बीच रुकमा लौट आई. युवक-युवती के संवाद से उसे बहुत हैरानी हुई. उसने राजकुमार से कहा कि मैं तुम्हें यहां ले आई हूं यह मेरा घर है और युवती खुद यहां मेहमान है.

राजकुमार को रुकमा की बातों में सच्चाई नहीं दिखी. वह तो उस युवती की ही गोद में लेता था जिसे रुकमा अजनबी मेहमान बता रही है. वह युवती को राजमहल ले आया और अपने माता-पिता को सारा हाल बताया. राजा-रानी ने अपने पुत्र के प्राणों की राष करने वाली उस युवती से राजकुमार का ब्याह रचा दिया.

उधर श्यामा ने अपने घर पर महादेव का जाप जारी रखा. ब्याह की रात ही राजकुमार के सपने में उमा-महादेव आये और उसे सच्चाई बतायी. कि वह युवती, जिससे तुमने ब्याह रचाया, तुम्हें रास्ते से उठाकर नहीं लायी बल्कि ऐसा करने वाली रुकमा थी. कि उसी ने जीवनदान देने के लिए सच्चे मन से महादेव को पुकार लगाईं. अब सपना तो सपना ही है, उस पर कितना भरोसा.

लोककथा : ह्यूंद की खातिर

सुबह जब राजकुमार ने अपनी पत्नी को रात के सपने के बारे में बताया तू वह विचलित हो गयी. वह रोने लगी और उसने राजकुमार को उलाहना दिया कि उसे अपनी पत्नी से ज्यादा विश्वास सपनों पर है. राजकुमार को भी उसकी बात में सच्चाई लगी और वह उस पर फिर भरोसा कर बैठा.

महादेव और पार्वती पुनः उसके सपनों में आकर उसे अपनी बात समझाते रहे. उसने उनसे कहा कि वह सपने पर कैसा विश्वास कर सकता है जबकि उसकी पत्नी कुछ और ही कहती है. आखिर उमा-महादेव ने उसे वचन दिया कि वे कल राजदरबार में आकर सपने को सच साबित करेंगे. राजकुमार ने इस बारे में किसी को नहीं बताया. आखिर सपना सच होगा तो कल महादेव दरबार में आएंगे ही.

महादेव और पार्वती वही जोगी वेश धारण कर राजदरबार पहुंचे जैसे वह रुकमा के घर भिक्षा मांगने पहुंचे थे. उन्हें देखकर राजकुमार की दुल्हन वहां से जाकर छिप गयी. आखिर राजकुमार को सपने का सच पता चल ही गया. वह रुकमा के पास पहुंचा उससे क्षमा मांगी और उसे राजमहल लेता आया. राजकुमार का रुकमा से विवाह संपन्न हुआ. रुकमा का जीवन अब खुशहाली से भर गया. षड्यंत्र कर राजकुमार की हत्या कर देने वाले दरबारियों और धोखेबाज लड़की को दंड मिला.    

लोककथा : दुबली का भूत

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Sudhir Kumar

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