फोटो: सुधीर कुमार
कुछ समय पहले तक यह माना जाता था की अचल पत्रिका में प्रकाशित गोविन्द वल्लभ पन्त की कहानी ‘एक रुपैंक चित्र’ पहली कुमाऊनी कहानी है. बाद के शोध में बता चला कि 1938 से पहले ही बाबू रामसिंह पांगती ने पहली कुमाऊनी कहानी ‘छितकू की कथा’ 1936 में लिख दी थी. इस बात को डॉ. प्रयाग जोशी ने मथुरा दत्त मठपाल द्वारा सम्पादित किताब ‘कौ सुआ, काथ कौ‘ की भूमिका में भी दर्ज किया है. यहां पढ़िये पहली कुमाऊनी कहानी ‘छितकू की कथा’
(First Kumaoni Story)
बालकन को खेल को एक कहानी लेखी जौछ. यो संसार बालकन को खेल समान छ. सबै प्राणी जन्म लीबेर दुनिया में अपना अपना खेल खेली जानी. बोजो लीबेर कोई नी ली जाना, खाली हाथ जसो आयो, उसै चली जानी. संसार को लटा पटा जौ जंज्याल सब यां धरीयु रौछ. भाई भतीजा चेला ब्वारी अड़ोस पड़ोस सबन थे खेल खतम हुना पर छाड़नो पड़नछ. झौ झकरा रीश डा दौ धक्का धक्का लगे सब खेल खतम होई भूली जाईनछ केवल भली बुरी, पाप पुण्य जो मनुष्य अपना बारीको खेल में कमाई जानी, वही सदा अमर रौंछ.
दर्गुली, जसुली, रामी, काली, चारों छ्योरिन सलेक घाम आई बेर खायाँ नाना कांसा को भाना माजी बेर खोरान मा धरी घर औना रैन. घर में इनरो आमान भात टपकिया पकाई बेर, दाल डुबका पल्यो पकौना का तय्यारी में छन. क्वे खालो झाड़न रैन, कुछ ऊन को लाड़ो उफारी बेर भला भला ऊन छांटना रैन. ग्वाला को गोर मुचौ दियो कै लग हाका हाक हैरेछ. द्वी मङखतुवा हुणिया लंबी लाल टोपी पैरियाँ माला को बोखलो, फाटीयु ल्हम, डमरू बजौने, ‘ग्वोंजों, मोंजों, माई भिच्या दे’ कौने खाना मा पूजा रैछिया कि इतुकै में गौंका ठूला नाना सबै कुकूर पूजी बेर हुनियान का स्वगत में ही हौं-खौं-खौँ भूकन लागी गया.
दुर्गली को उम्र 8 वर्ष, काली मेलटन बनात को गाती, मुन्दरो को पाकरो, खटा में पैरा, नाक काम में मुर्की, ग्यूं गोरा रंग, लंबी मूख को खूब छटपटैल लड़की छ. जसुली को उम्र 7 वर्ष, छोटी मोटी कद, गोल मुख, नीलो जीन को गाती, गीमटी को खोपी, गलामें अपना आमा को पौला पैरीयु रीशालू स्वभाव को हष्ट पुष्ट छ. रामी और काली दोनो थर मथर पाँच सवा पाँच बर्ष का झोकलो पैरीयां, सुकीटैजसी बड़ी चलती पुरजी छन.
दुर्गली को आमा ले कयो कि छ्योरी! आज एत्वार छ, तेरो कपाल धोयूं भौत दिन हैगै, जूङा परी गै हौला. रातभर कपाल ग्वाज ग्वाज कै कन्यौने रौंछे, आज तेरो कपाल धौई देंलो-भात खाना है ली लूटी उफारी ले.
दुर्गली को ध्यान छीतकू जाना को हयूं छिया, आमा को बात सुनी अनसुनी करी, ओड़ा कोड़ा पन चितैबेर छीलकू को समानो बैटयानी में लागी रेछी. सब है पैली फुङटा में निमुवा को दानो घाली फिर कुस्यैनी को पुन्दरो और खाजा छीरपी को कुटरो पांजी, ऊपर देखालों में ऊन और छिचू राखी.
फुङटा लैस बनाई, यसो कै छितकू जौंलो कै हाथ में लीबेर, एक बेर ठप ठप भोनी को डेली तक आयो, फिर पलटी बेर भीतरखन भगार और ढनडेलो को बीच कोना में फुङटा लुगाई छाला ले ढकी दियो. भात खायुं नी छियो, आज को भात ले दुर्गली को काम में बड़ो खलल पारी दियो. इस्कूल जाना में तथा आमा आपा को करचा करचा में ढोल व हर्ज है जानेर भै. लेकिन छितकू जाना व बर्यात चैना में कभै हर्ज व फर्क हनेरो नी भयो. दुर्गली घड़ी घड़ी रसोई कमरा को तरफ जानो रेछ, आमा थें भात जल्दी मांगन छी त आमा कपाल धोई दीनेर छ, ये वास्ता दुर्गुली आमा को नजीक नी गै.
बेली दिन दुर्गुलि को देखीयुं दूध पीसनिया ढूढंने जसुली ले ल्ही दियो. ये पर जसुली और दुर्गलि को धूरमंडल झकरा है गयो. आपस में भौते गाली मुखौल हैगयो. ऊन कातन कातनै हाथ छटकाई, मुख मटकाई, एक दुसरो थें नौ कुनो धरना पैठी गै. आखीर में दोनों को अबोल हैगो. जसुली ले रामी थें अपनो सात लीबेर दूड. सारी अपनो छितकू अलग बनायो और डेली दुसरो तरफ निकाल्यो. ये तरह जसुली राठ झकरा ले ब्योर है गया. सब चुपचाप रीश आयुं जासो मुख करी, अपनो अपनो ऊन कातना में हारता बारता करनो लागी.
जसुली पाखो को ऊन कातन रैछी. नानो फुलका सगी बेर, छीचू ढिनौनेर छी. रामी छीऊटा को कातन रेछी. कातन कातनै तान टूटी, छिचू छुटी, भीबन ढनमनी गयो. रामी ले छीचू को तान हराई हालो. रामी देखन देखनै हैरान हैगै, तान नै पायो. हरेक तान खेचना ले छीचू ज्यादे गजबजी गयो. ठुला सब छयोरिन ले अपना अपना ले तान पौना का डाक्टरी करी, पर कैको पेश नी चलि. सबन को हाथ लागना ले धागा इतुक अलजी गयो कि तान मिलना पर लगे, धागा काम लागनेर नि छी. भात पाकि बेर माण हैगो- आब क्या है सकंछ.
(First Kumaoni Story)
सभी कन भौत शोक है गयो, रामी को सारी सम्पति लूटी गयो, सब जायजाद बगी गये. सैद आमा मरनो पर रामी कन इतनो भारी शोक नी हुन. डार मारी बेर रोनो लागो और कल्पना करनो लागी “मैं रान बड़ो अभागी भयो, मेरो खोरा फूटी गयो, मैं घर क्या लीबेर क्य मुख ले जौंलो, आमा क्य कलो”. आमा मैं थे आज क्याला वाला जीमदार औनेर छ, छीतकू झन जा कौन रेछी, मैं रान बलै बलै जिद कैबेर आयो.
सब छ्योरीन ले थोड़ा थोड़ा अपना धागा दीबेर रामी को छीचू आदा भरी दियो, फिर रामी बड़ो खबरदार ले कातनो लागी गयो. पुरपटा में आंसून को धार आजी नी सूखी, लेकिन रामी छीचू देखन रेछ और हंसि रेछ. छिट घड़ी पैली इतनी भारी बिलाप कैल करो, छितकुवा संसार में कैथे मालम नै रयो.
दुर्गुली बारीक बोखलो का जसो कातन रैछी. पोथा को गान जतुक छीचूं भरीयुं छियो. मेरो ऊन आज सगीनेर नै छ. मनी ऊन मैं गार बगाई दीनछु. दुगुली ले कयो, कोई छ्योरिन तुमी घर बतकौ झन कया.
काली को कताई अनकसै ढप को हैरेछी. थुपला को तहर कातंछु कौनछी. छीजू को तान ख्वाङो में ठीक अटक्यो त फरसी मूची जानछी, फर्सी थूपले अटकायो त तान मूची जानछी. एक हाथ ले फरसी पकड्यो, एक हाथ ले खोङो को तान चेप्यो और खाप ले धागा को तान बनायो. यसै कै काती धाली करनै रयो. एक छिचू को जतुक ऊन त काली को ढार में पूजी बेर ढीनो बन्यू होलो.
कताई कैंपन त बलाचया तुनौरो पछ्यौनो छियो, कैंपन पीतीप्राण हैरेछी. काली कोतहर कातीयु थुलपा अनमन भांत को बनलो. एक टूका में त भालू को कान जसो बाकलो होलो, दूसरो टूको कपड़ा का थान जसो पातलो होलो.
भात खैबेर सबै छ्योरीन ठीक टैम में छीतकू पूजी गयीं. आते ही छीतकू झाड़ी बेर जो दङा झरीया छिया, समाली लिया और अपना अपना फुङटा को सब सामान गारी बेर एक दूसरो थे दिखाई फिर फुङटा में डाली, ऊन कातना लागी गया. बेली दुर्गुली जसुली को धूरमंडल झकरा हुना ले अलग अलग छीतकू बनी अबोल भई, यो बात छ्योरीन थें बिलकुल याद नैछ. सैद वी जन्म में झकरा भै हुनलो पर यो जन्म में झकरा हुनो को इनुथें कुछ ज्ञान नैछ.
द्वी छितकुवा में ही मो हुना ले, छयोरीन को यो सलाह ठैरी कि आज जसुली को कुंशीया को ब्याह दुर्गुली को कुश्यैनी को साथ करी देनू. लगन ठीक ठैराई, सैत मुनरा धरी, दुर्गुली को छीतकू में एक सेमा पात को बैल बाकरो, लग्यो पाथर ले मारी गयो.
अब दुर्गुली अपनो कुश्यैनी को ब्याह को इन्तजाम में लागी गयो. सबहै पैली सफेद कमेर को माटी छीतकू में फोगी बेर छीतकू छटकाई गयो. किसम किसम को पकवान बनी गयो. कोई सफेद ढूङा पीसी दै दूध जमा करन रैन, क्वै चाकला सोलाम बाड़ा का वास्ता मास पीसन रैन, क्वे एक कोना में तैग लगै बेर बाकची घालन रैन. दाल भात बनाई, जान निखारी लैस बनाई गयो.
एक छोटा ढुङा में लाल माटी क पिठाक बना रछ. बीमे सफेद बलुवा का अछयत लग छन. छीतकू को भैर डूमन को धाई बराई हैरेछ. सबै छयोरीन हँसमुख, पीठाक लगैक, बौंला फीनै, भैर भीतर धुकरन रैन. दुर्गुली को छीतकू में पूरो चहल पहल हैरेछ.
दुर्गुली अपनो ब्योंली कुश्यैनी छ्जौनो में मस्त छ. मनराज को घागरो, सफ़ेद कमड़ा को गाती, मखमल को आङरो, गीमटी को खोपी, जाजम को मुन्दरी पेराई रैछ. हलकाण लग नाख में नथ, हाथ में चूड़ी, गला में एक पौंला और चनरहार छियो. एक द्वी हतकाण और नी हुना ले दुर्गुली को मन में कलकांसो रैगो. पटना दनकौन को बखत वीं हतकाण बनाई लेंलो कै अपनो मन पत्यायो.
खोपी मन्दरो को मली मा मकूट लग बादी गयो. डोली छजीना का वास्ता एक चाकलो लाल टालो कुश्यैनी को पुन्दरो में नी मिली. यो टालो भौत जरूरी छियो. एक लाल टालो लौना का वास्ता काली कन ड्मन को वां भेजी गयो. छिटघड़ी में छोटी काली एक लाल टालो लीबेर धौं फौं कै पूजी गै. अपनो आमा को कौना पर काली, इतूक जल्दी पानी को कसनी गोठ बट पान नी पुजाई सकनो. सबै छयोरिन ब्योली को रूप रंग देखी ब्यर दुर्गली की होशियारी को कायल छन. जब कभै हमरो कुश्यैनी को ब्याह होलो त हम थैं यसो छजौनो नी औ कैबेर अपसोच लग हैरैंछ.
जसुली को छितकू में उतूक ज्यादे घमचम नै है रयो, किलेकी ब्योंला को वां बरतिया छानो व बाड़ा बागची एक दिन पछिलो बननेर भयो.
ब्योला छजोना से जसुली ले लग कुछ कसर ने करो-हूबहू ब्योला बनाई दियो. लाल बनात को सूतन, सफेद लठा को चोला, कमर में पाकरो बादियुं और बीमें दबीया घालीयुं, ठूलो टांखो में सलाई-डाबा को मकूट क्य सुन्दर देखीनो रौछी, छाती व पीठ में धोती किनारो को शाल, मुख में रूमाल, खुटा में जूता पैराई बेर जसुली ले कमाल करी दियो.
बरयात बैटीनो को बखत होई गयो. नाङरा दमोऊ बजनो लागी. एक गोल ढुङा टूलो ढुङा में हानी बेर बन्दूक को फैर करी गयो. सफेद निशान आगा बटी लाल निशान पाछा बटी फहरौन रैछ. तूरी को टूटाट लग हैरैछ. हुड़क्यानी “बाली वे फूङा महार” को चोगर्खा गाई बेर फुर फुर नाचन रैछ.
ठीक टैम में बरात पूजी गयो. दुर्गली ले ब्योंला को खोरा में मास ज्युनाल पौड़ी बेर चारों दिशाओं में फोगी दियो और ब्योंला कन भितर ब्योंली को काख थै, दैनो तरफ बैठाली दियो. चार चे आयो, द्वी चेचूं ब्योंला ले द्वी ब्योंली ले छेत छेत कैबेर ढलायो.
अब बरत्यान थैं खवानो को लंबर लगानो चैंछ. ब्योंला ब्योंली को वली तरफ पली तरफ लमलेत कैबेर टालो बिछाई सब कुशीया बरत्यान कन बैठाई गयो. सबन को चानो में पीठाक लगाई, पैली तील गूर बानी, फिर बाड़ा बाकची केला नारीङ बांटी. कोई कोई बरतिया कुछ कुछ मांती गया “भालारे भाला सागूना’’ लग होई गयो. द्वी चारन को झकरा लग हैगै. आखीर में सबन को सामने एक एक पत्तल राखी, दाल भात पसकी दियो. पत्तल को च्यूनि में लगाई “खैहल खैहल’’ कई गयो.
(First Kumaoni Story)
खाई बेर कुछ-कुछ ज्वानन को नाच लग भयो. ‘हरीला कुंजा’ को गीत लागी रैछियो. बरतियान को रंगत देखना, छितकू संसार के सब छ्योरिन आया, परन्तु जसुली अपनो छीतकू है भैर नी आयो. वी को कुशीया को ब्याह हैरैछियो, वी बारात देखना क्या कैदा ले समद्यानी को वां आई सकंछी.
अब सिर्फ आंचल करनो बांकी छ फिर बरात के रंगोल धंगोल फीटी जालो. सल को एक हांङ रोपी गयो. एक चाकलो ढूड. में फल फूल धरीयुं छी. द्वी छोटा ढुंगा पीसीयुंदै राख्यूँ छी. दुर्गुली को काख थें ब्योंली और रामी को काख थे ब्योला बैठायं छी. बर कन्य तीन बखत सल को हांङ को चारों तरफ रीङई गयो. जूठा जूठ करनो बखत दुर्गुली बड़ो चिताङो रई. झटपट ब्योली को जूठो लगैयं दै बेला ब्योंली को मुख में लगाई दियो. “ब्योंली ले जीत्यो, ब्योंली ले जीत्यो” के आम खबर हैगै. ब्योली को जितीयु चेला ही चेला हुनै.
घर में आमान थे फिकर है रैछ कि आज घाम बुरी गौ, ज्या खाना को बखत तक छ्योरीन घर नै आया-काँ गैन. अब चेलिन को सुद्याल कैथें लगानू हैरछियो, इतके में सबै चेलियाँ फुङटा हाथ में लीई, हाथ मुख में माटी लगै, झोकलो गाती में धुल लट पटै सरासर भीतर पूजी गै. आज एल तलक का छिया? तुमी थै ज्या खानो को लग याद नी भै, कई गयो, पर कैले लग कुछ जबाब नी दियो.
आमान थें बिलकलै मालूम नी भै कि हमरा चेली, हम है ठूली महातारी बनी गैन. आज इनूले बड़ो भारी ब्याह काज करी हालीन. आमा ले एक केला दियो, चेली ले द्वी केला माँगनो के जिद्द करो, नी देना पर ही ही कै रोई गयो और भीपन ढनमनी गयो. छीतकू में इतनो भारी ब्याह को प्रबन्ध करनेर, महतारी के सामने अबोध बालिका छन. ईश्वर के महिमा अपरम्पार छ. मायाजाल को संसार छ.
यूं छोटी दूध पीनीया बच्ची इतुकै खेल नी करना बल्कि ये है ज्यादे भयंकर खेल खेली देनी. कुयानी को बच्चा पैदा करी बेर, क्वारो बैटाली, तेरछो डोको होल्याई देनी . यस खेलन ले यूं बच्चीन के कसे संस्कार होलो, अघिलो जीवन संग्राम में यूं कसा महतारी व घर का पुरख्यानी बनला.
चिट सफेद कपड़ा में जसो रंग लगाई दियो, उसो रंग चढ़ी जांछ. छोटा बालकन का कोमल हृदय व शुद्ध मन में जसो आचार विचार को छाप लागी गयो, वी सस्कार व भाव जन्म भर रौंछ.
अगर समाज सुधारी बेर बालक बालिकान थे सुन्दर, स्वस्थ, धार्मिक, सुधारक नर नारी बनौनी छ त इन बालकन को शिक्षा, संगत, खेल कूद वी लीक व सां पो में धरनो की बड़ी जरूरत छ.
(First Kumaoni Story)
बाबू रामसिंह पांगती
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