मेलोडेलिशियस-4
(पोस्ट को रुचिता तिवारी की आवाज़ में सुनें)
ये ऑल इंडिया रेडियो नहीं है. ये ज़ेहन की आवाज़ है. काउंट डाउन नहीं है ये कोई. हारमोनियम की ‘कीज़’ की तरह कुछ गाने काले-सफेद से मेरे अंदर बैठ गए हैं. यूं लगता है कि साँसों की आवाजाही पर ये तरंगित हो उठते हैं. कभी काली पट्टी दब जाती है कभी सफेद. इन गानों को याद करना नहीं पड़ता बस उन पट्टियों को छेड़ना भर पड़ता है.
आज अभी जब ये रात अपनी विदा के वक्त उदासी के उरूज़ पर है, सबसे गहन काली पट्टी बज उठी है. मेरे दिल के करीब सबसे उदास गाने को आवाज़ देती सी. पी बी शेली के कहे के विपरीत, ज़रूरी नहीं है कि वो गाने जो हमारे सबसे उदास विचारों को अभिव्यक्त करें, वो हमेशा मीठे ही हों. ऐसे भी गाने हो सकते हैं जो निपट उदास कर देने वाले हों. जो आपको उदासी के गहरे समंदर में उतरने और डूबने पर मजबूर कर दें.
एक ऐसा ही बेहद उदास कर देने वाला गाना ‘देख लो आज हमको जी भर के’ सागर सरहदी द्वारा निर्देशित और नसीर, फारुख शेख़, स्मिता पाटिल और सुप्रिया पाठक द्वारा अभिनीत फ़िल्म बाज़ार (1982) का है जिसमें बाज़ार किसी चीज़ का नहीं बल्कि शादी के लिए लड़की की खरीद-फरोख्त का है.
इस फ़िल्म का संगीत अपनी तरह के अनूठे और सार्वकालिक महान संगीतकार मो. ज़हूर ख़य्याम का दिया हुआ है. ‘दिखाई दिए यूं कि बेखुद किया’ या ‘फिर छिड़ी रात बात फूलों की’ जैसे इसी फिल्म के अन्य गानों को भी अगर आप सुनें तो आप इसी निष्कर्ष पर पहुचेंगे कि इस फ़िल्म का संगीत ख़य्याम के दिए सबसे अच्छे फ़िल्म संगीत में से है.
बक़ौल ख़य्याम साहब इस फ़िल्म की सफलता में इसके संगीत का बहुत बड़ा हाथ है. किसी इंटरव्यू में अपने इस बहुत पसंदीदा गाने ‘देख लो आज हमको जी भरके’ के बारे में बताते हुए कहते हैं कि इसके बोल मिर्ज़ा तसादुक़ हुसैन शौक़ लखनवी जिन्हें प्यार से ‘मिर्ज़ा शौक़’ कहते थे की क़िताब ‘ज़हर-ए-इश्क़’ से लिये गए हैं. मिर्ज़ा शौक़ पेशे से हक़ीम होते हुए भी अपनी गज़लों की वजह से नवाब वाजिद अली शाह के दरबार से जुड़े हुए थे. इस गाने में मसनवी शैली की इस किताब के कुछ अश’आर लिए गए हैं जो किताब में इसी तरतीब से नहीं आते हैं. इश्क़ की बहुत शानदार डीटेलिंग है इसमें. मिलन और जुदाई की पूरी कहानी से सजी इस मसनवी में
चैन दिल को ना आएगा तुझ बिन
अब के बिछड़े मिलेंगे हश्र के दिन
हश्र तक होगी फिर ये बात कहाँ
हम कहाँ तुम कहाँ ये रात कहाँ
जैसे अश’आर भी हैं. इस क़िताब में माशूका की शादी किसी और से होती देख उसका प्रेमी गहरे दुःख में रोता है और अंततः माशूक़ा ज़हर खा लेती है. इस वजह से भी क़िताब का नाम ज़हर-ए-इश्क़ रखा गया होगा. बाज़ार फ़िल्म के इस गाने के फिल्मांकन में भी सुप्रिया पाठक फ़ारुख से विदा लेती हैं… शायद आख़िरी विदा!
ख़य्याम ये भी बताते हैं कि उनकी पत्नी जगजीत कौर ने इस गाने को इतना दर्द के साथ गाया था कि थियेटर में फ़िल्म में जब ये गाना आता था तो स्त्रियां तो स्त्रियां, पुरुष भी अपने आंसू रोक नहीं पाते थे.
जगजीत कौर उस ख़ेमे से हैं जिन्होंने ने फिल्मों में बहुत कम गाने गाए लेकिन जिनकी गिनती लता और आशा जैसी दिग्गज आवाज़ों के बीच अपने समय की सर्वश्रेष्ठ आवाज़ों में होती है. उसका कारण उनकी अत्यंत मार्मिक और मधुरता से भरी गायकी ही तो है.
उनका गाया आख़िरी गाना ही ले लीजिए. ख़य्याम के संग्रह का ही एक नायाब नगीना, साहिर लुधियानवी का लिखा फ़िल्म शगुन का गीत ‘तुम अपना रंजो ग़म अपनी परेशानी मुझे दे दो’
जगजीत कौर का गाया आख़िरी गाना था जिसे गवाते समय ख़य्याम साहब का ये कहना था, कि चाहे इसके बाद वो कोई और गाना न भी गाएं, ये अकेला गाना ही उन्हें अमर कर देगा. इसे सुनिए और देखिये ये कमाल कि ये बात सौ प्रतिशत सही निकली.
जगजीत कौर के गायन का और जादू देखना हो तो हीर राँझा, बाज़ार या उमराव जान फिल्मों के गानों को सुनिए.
आज मैं जिस अकूत दर्द से भरे गाने का ज़िक्र कर रही हूँ उसे सुनते हुए शब्द अनेक मायनों से भर जाते हैं, संगीत की लय टूटती है, बिखरती है, फिर जुड़ जाती है और चलते-चलते ये दुनिया रुक सी जाती है. दरअसल असल दुःख से भरे गाने महज़ कोरे भावनात्मक नहीं होते बल्कि यथार्थ के किसी बहुत ठोस सन्दर्भ को वाणी दे सकते हैं, माज़ी की कोई दुःखती रग दबा सकते हैं, जीवन की किसी प्रिय-अप्रिय घटना को नया मौलिक अर्थ प्रदान कर सकते हैं.
इसलिए जब जगजीत ‘देख लो आज हमको जी भर के’ गाती हैं, जिसके संगीत में शहनाई से शुरू करके ख़य्याम रुक-रुक कर तबले की हल्की थाप पर बस कुछ तार छेड़ते हैं, आप बंध जाते हैं, ठहर जाते हैं. कहीं नहीं जा पाते क्योंकि ये गाना आपको न सिर्फ उस नायिका के जीवन में एकदम से ले जाता है, जो इसे पर्दे पर गा रही है, बल्कि आपके अपने जीवन, अपनों के जीवन में भी प्रवेश करने को बाध्य कर देता है. ये किन्ही दो प्रेमियों की जुदाई से कहीं आगे बढ़कर आतताई शक्तियों द्वारा हमेशा प्रेम पर की गई ज़्यादतियों का आख्यान बन जाता है, उन बंदिशों को दिखाता जो प्यार की समस्त सम्भावनाओं को बिखरा देने के लिए इस दुनियावी क्रूर सत्ताओं ने लगाई हैं.
हो गए तुम, अग़रचे सौदाई
दूर पहुँचेगी मेरी रुस्वाई
जब कौर गाती हैं तो आप हीर को, जूलियट को, शीरीं को, मीरां को, अमृता प्रीतम को, हर उस स्त्री को उनके साथ किसी साये की आड़ से गुनगुनाते महसूस कर सकते हैं.
‘कोई आता नहीं है फिर मर के’ कौर की जब ऐसी हूक आती है, आप महसूस करते हैं ख़ामोश विलाप सा करती हुई स्त्रियों का एक प्रोसेशन जिनके लिए कहीं लौट आने का रास्ता नहीं बचा, जिनके दर्द की कोई दवा नहीं, जिनके घाव भरने के कोई आसार नहीं!
यही वो समय है जब वक्त भी माज़ी की आवाज़ सुनने को ठहर जाता है. वक्त के उस ठहराव को महसूसना हो तो यूट्यूब के इस लिंक को खोलिए और दर्द के औदार्य तक पहुंचाते इस गाने में डूब जाइये!
देख लो आज हम को जी भर के
कोई आता नहीं है फिर मरके
हो गए तुम, अग़रचे सौदाई
दूर पहुँचेगी मेरी रुस्वाई
देख लो आज …
आओ अच्ची तरह से करलो प्यार
के निकल जाए कुछ दिल का बुख़ार
देख लो आज…
फिर हम उठने लगे बिठालो तुम
फिर बिगड़ जाएं हम मना लो तुम
देख लो आज …
याद इतनी तुम्हें दिलाते जाएं
पान कलके लिए लगाते लाएं
देख लो आज…
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रुचिता तिवारी/ अमित श्रीवास्तव
यह कॉलम अमित श्रीवास्तव और रुचिता तिवारी की संगीतमय जुगलबंदी है. मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा यह लेख रुचिता तिवारी द्वारा लिखा गया है. इस लेख का अनुवाद अमित श्रीवास्तव द्वारा काफल ट्री के पाठकों के लिये विशेष रूप से किया गया है. संगीत और पेंटिंग में रुचि रखने वाली रुचिता तिवारी उत्तराखंड सरकार के वित्त सेवा विभाग में कार्यरत हैं.
उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं. 6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता). काफल ट्री के अन्तरंग सहयोगी.
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