फोटो www.iasipstnpsc.in से साभार
पिछली सदी के साठ का दशक वह दौर था, जब शिक्षा का मतलब केवल शिक्षा होता था, शिक्षित होकर ओहदा पाने का सपना हमें कम ही दिखाया जाता था. अधिकांश अनपढ़ अथवा साक्षर अभिभावकों को न करियर काउन्सिलिंग का हुनर था और न शिक्षकों का छात्रों को शिक्षित करने के पीछे किसी सरकारी नौकरी के लिए तैयार करने मात्र की कोचिंग. शिक्षा का मतलब होता था केवल सीखना और सिखाना. Education and Schooling in the 1960s
आज की तरह उस दौर में स्कूली बच्चों को बस्ते के बोझ की समस्या नहीं थी. कक्षा दो तक तो केवल पाठी व कमेट की दवात हमारी हमसफर हुआ करती थी और शिक्षक ही हमारे लिए रिंगाल की कलम का टांका काट दिया गरते थे. कक्षा तीन में प्रवेश करने पर ही कापी पर स्याही से लिखने की बारी आती थी. पहली बार कागज पर स्याही से लिखने का जो अहसास होता था, वह अवर्णनीय हुआ करता था. स्याही की टिक्की को घोलकर गाढ़ी स्याही से चमकदार हरफों में लिखने की अलग ही स्पर्धा हुआ करती. ज्यादा गाढ़ी स्याही से लिखे शब्दों में सुनहरी आभा बिखेरने का शौक सर चढ़कर बोलता था. कक्षा तीन में प्रवेश करते ही बस दो किताबें हुआ करती थी, जिसमें एक बेसिक रीडर तथा दूसरी बेसिक अंकगणित. इसी के अलग अलग भाग कक्षा 5 तक हुआ करते. बेसिक रीडर मतलब भाषा के अलावा दूसरे विषयों का सारा ज्ञान समेटे एक समग्र पुस्तक. जिसमें भाषा के साथ-साथ इतिहास, भूगोल, विज्ञान, पर्यावरण यानि कमोवेश उम्र के लिहाज से लगभग सारा आवश्यक ज्ञान समाहित होता था. मुझे याद है कि प्राईमरी कक्षाओं में बेसिक रीडर में एक पाठ हुआ करता था – “वनस्पति, जीव जन्तु और पेड़ पौधे एक दूसरे पर निर्भर हैं ’’. यह भाषा ज्ञान के साथ, पर्यावरण तथा विज्ञान का अदभुत मिश्रण था. इसी तरह जेम्स वाट द्वारा भाप के इंजन की खोज जैसे पाठ जहाॅ विज्ञान विषय से रूबरू कराते वहीं कोलम्बस और वास्कोडिगामा की समुद्री यात्राऐं हमें इतिहास व भूगोल का ज्ञान कराती. कविताऐं एक आदर्श नागरिक बनने की भावना संजोये बहुत प्रेरक हुआ करती थी. “उठो लाल अब आँखें खोलो’’ से जहाॅ सुबह उठने की सीख दी जाती वहीं “’इस पार हमारा भारतवर्ष, उस पार चीन, जापान देश’’ तथा “वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो’ ’जैसे प्रयाण गीतों के माध्यम से बालमन में राष्ट्रप्रेम के भाव जगाने का काम करती थी. कुल मिलाकर पर्यावरण विषय तो तब पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं था और विज्ञान अलग विषय के रूप में कक्षा-6 से पढने का मिलता, लेकिन प्राईमरी के एक बेसिक रीडर पुस्तक में ही पाठ्यक्रम का गठन कुछ इस प्रकार होता कि भाषा,साहित्य के साथ इतिहास, भूगोल, विज्ञान, पर्यावरण तथा लगभग सभी विषयों का समावेश रहता. Education and Schooling in the 1960s
गणित का स्वरूप भी आज से कुछ भिन्न था. हम उस संक्रमण काल के छात्र रहे, जब पव्वा, आधा, पौना, डेढ़, ढाम भी था और दशमलव प्रणाली की शुरूआत भी पाठ्यक्रम में हो चुकी थी. इसलिए हमें दोनों को ही सीखने का सौभाग्य मिला. माप ,मुद्रा व तौल की पुरानी ईकाई क्रमशः इंच, फीट व गज/ रूपया, आना, पाई / छटांग , सेर व मन की जगह सेमी, मीटर, किमी/ नया पैसा, रूपया /ग्राम, किलोग्राम, कुन्तल आ चुके थे, तो हमने पुरानी इकाइयो के जोड़-घटाने के साथ नयी इकाइयों को भी सीखना शुरू किया था. सबसे ऊपर बायें से दायें रूपया,आना पाई अथवा दूसरी इकाइयों के मानक लिखे जाते, उसके ठीक नीचे जोड़ अथवा घटाने के अंक. पहाड़े सीखने की कला भी इतनी सरल व संगीतमय थी, कि उनको याद करना कभी बोझ प्रतीत नहीं हुआ. पूरी कक्षा समवेत स्वरों में जब पहाड़ों का वाचन करती तो एक संगीतमय वातावरण तैयार हो जाता, जिसकी गूँज विद्यालय के पास के घरों तक भी सुनाई देती. पहाड़े सीखने की इस विधा में कर्णप्रिय संगीत व बच्चों का एक साथ पूरे धड़ सहित सर झुकाना व सर उठाना हमें व्यायाम भी साथ-साथ करा देता.
हिन्दी, गणित व सामाजिक विषय (जो शायद दजा चार या पांचं में होता) के अलावा डिजाइन व आर्ट ही विषय हुआ करते. डिजाइन की चारखाने वाली अलग कापी हुआ करती थी जिसमें वाटर कलर से रंग भरने का विशेष कौतुहल रहता. कभी कभार लाल-नीली पैंसिल से भी डिजाइन व आर्ट का काम किया जाता था. पैंसिल का आधा हिस्सा लाल रग पैंसिल का जब कि शेष आधा हिस्स नीले रंग की पैंसिल का होता था. दोनों ओर से छिलकर दोनों रंग का प्रयोग एक ही पैंसिल से किया जाता. काॅपिंग पैंसिल भी हुआ करती, जिसमें थूक लगाकर बैंगनी रंग हो जाता. जिसे आज एसयूपीडब्लू बोलते हैं, तब दस्तकारी में मिट्टी का कार्य अथवा टोकरी आदि बुनना सिखाया जाता. Education and Schooling in the 1960s
गांव से दूर जब कक्षा छः में प्रवेश लेते तो गांव-देहात के बच्चे तभी हिन्दी में बात करना सीखते. वरना प्राईमरी तक तो लोकभाषा कुमाउनी में ही शिक्षक व छात्रों के बीच संवाद हुआ करते. यही वह कक्षा होती जहाँ छात्रों को एक नया माहौल मिलता. प्राइमरी कक्षाओं के बाद आगे की पढ़ाई के लिए प्रायः नजदीक के कस्बों में कई कई किलोमीटर पैदल जाना होता. सुबह स्कूल जाते समय जो खाना खाया शाम को घर लौटने पर ही खाना नसीब होता था. आज की तरह लंच पैक की व्यवस्था तब संरक्षक नहीं करते थे. ऊपर से सुबह शाम घर के कामों में माॅ-बाप का हाथ बंटाना होता था. पास के कस्बे अथवा शहर में जाकर एक ओर गंवई छात्रों को शहरी छात्रों के साथ घुलने-मिलने की चुनौती और दूसरी ओर एकदम नये अंग्रेजी विषय का ककहरा सीखने का कठिन काम. कक्षा छः में पहुंचते ही हमारा रिंगाल की कलम से नाता छूटता और होल्डर पकड़ा दी जाती. होल्डर में भी दो तरह की निबों का प्रयोग होता. हिन्दी के लिए अलग निब होती, जब कि अग्रेजी लिखने के लिए जी निब से लिखने की अनिवार्यता थी. निब की नोक अंग्रेजी के जी वर्ण की आकार में मुड़ी होने के कारण इसे ‘जी’ निब कहा जाता. छोटी कक्षाओं में पैन से लिखना दण्डनीय था, कक्षा 9 में पहुंचने पर पैन से लिखने की अनुमति होती. स्याही में कलम या होल्डर से लिखने पर स्याही ज्यादा आने से धब्बा लगना स्वाभाविक था? इसके लिए ब्लाॅटिंग पेपर (सोख्ता कागज) हुआ करता. उस समय डाॅट पैन जैसी चीजें चलन में नहीं थी. कक्षा की डेस्कों में स्याही के लिए धातु की एक अलग दवात बनी होती, जिसमें स्कूल का कर्मचारी नियमित रूप से स्याही डालता. तब स्याही शुल्क अलग से लिया जाता था , जो बदस्तूर स्कूल द्वारा स्याही न दिये जाने के बावजूद पिछले दशकों तक लिया जाता रहा और इसका विरोध भी किसी ने नहीं किया.
नयी कक्षा की शुरूआत में नये कापी किताबों का आना किसी उत्सव से कम नही होता था. पहला काम उनमें जिल्द चढ़ाना होता था. जिल्द के लिए पतला बांस पेपर (आज की तरह लेमिनेटेड नहीं) मिलता था , जिससे जिल्द चढ़ाने में छात्र अपने किसम किसम के हुनर अपनाते. आज की तरह बने बनाये नेम चिट नहीं होते थे. सफेद कागज को काटकर ही नेम चिट बनायी जाती ,उसे सुन्दर आकार देने के लिए कई छात्र कोने क्राॅस में काट लिया करते. Education and Schooling in the 1960s
कक्षा नौ में जाते जाते छात्रों के नक्शे कुछ बदल जाते. कन्धे पर बस्ता लटकाना वे अपनी तौहीन सी समझते. हाथ पर कापी-किताब ले जाने का शौक उभर आया. हाथ में पसीने से कापी किताब खराब होने से बचाने के लिए पुरानी मोटी कापी के गत्ते के अन्दर कापी किताब हाथ में ले जाने का फैशन चला. छात्रों के इस फैशन को देखते हुए बाजार में कापी-किताब ले जाने के लिए अलग से फोल्डर आने लगे. जो जितना पैसा वाला, उसके हाथ में उतना अच्छा फोल्डर. ये फैशन भी कुछ साल चला बाद में तो फैशनेबल लड़के केवल एक रफ कापी अथवा कुछ जरूरी कापी-किताब कमीज के अन्दर बेल्ट में दबाकर लाने लगे.
यह बात दीगर है कि उस दौर में पैसे का अभाव था , लेकिन फैशनपरस्ती तब भी थी. तब नैरोकट पेंट और जूतों में खट-खट आवाज करने वाली कील ठुकाने और लड़कियों द्वारा टाइट कमीज के साथ चूड़दार पैजामा व ऊंची हील की चप्पल पहनने का जमाना था. लड़कियों की कमीज इतनी टाइट रहती कि जिसमें सीढ़िया चढ़ना उतरना उनके लिए मुश्किल भरा काम होता.
हाईस्कूल तथा इन्टर का बोर्ड परीक्षाफल जब आता तो कुछ जुगाड़ू लड़के परीक्षाफल का अखबार खरीदते तथा हर परीक्षार्थी से रिजल्ट सुनाने का पैसा वसूला जाता. परीक्षाफल सुनाने वाला लड़का किसी ऊंचे स्थान पर जाकर पैसा वसूलते हुए बारी बारी से परीक्षाफल सुनाता. आज की तरह इन्टरनेट का जमाना नहीं था. जब अखबार आता, तभी परीक्षाफल की जानकारी मिलती. Education and Schooling in the 1960s
आशा करता हॅू कि इस लेख से मेरे हम उम्र लोगों को एक बार अतीत में गोता लगाने का मौका मिलेगा तथा वर्तमान पीढ़ी उस पीढ़ी की शिक्षा व्यवस्था से वाकिफ व रूबरू होगी.
-भुवन चन्द्र पन्त
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भवाली में रहने वाले भुवन चन्द्र पन्त ने वर्ष 2014 तक नैनीताल के भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय में 34 वर्षों तक सेवा दी है. आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से उनकी कवितायें प्रसारित हो चुकी हैं.
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चित्रात्मक वर्णन।
बहुत सुंदर। पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं
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