समाज

डोला पालकी आंदोलन

 उत्तराखण्ड का डोला पालकी आंदोलन आधुनिक भारतीय इतिहास में निम्न जाति उत्थान आंदोलनों का ही एक रूप रहा. भारतीय समाज में लम्बे समय से निम्न जातियों को कर्मकाण्डीय एवं अन्य कारणों से न केवल सामाजिक रूप से तिरस्कृत जीवन जीना पड़ता था अपितु उनके साथ छुआछूत का व्यवहार किया जाता था. भारत के सांस्कृतिक परिवेश में सामान्यतः दुल्हन के लिए डोला एवं दूल्हे के लिए पालकी का प्रयोग किया जाता था.
(Dola Palki Andolan)

उत्तराखण्ड के गढ़वाल क्षेत्र में जातीय श्रेष्ठता के परिणामस्वरूप समाज के प्रभावशाली सवर्णों ने इसे अपना विशेषाधिकार मान लिया तथा जाति प्रथा की विशेषताओं के अन्तर्गत शिल्पकारों को उनके विवाह के अवसर पर डोला-पालकी का उपयोग करने से वर्जित कर दिया. इन शिल्पकारों के साथ तिरस्कार पूर्ण व्यवहार किया जाता. जबकि सवर्णों के वर-वधु की डोला-पालकी को अपने कंधों पर ढोने का काम शिल्पकारों को ही करना होता था.

शिल्पकारों के शिल्प के आकर्षक नमूने उत्तराखण्ड के विविध भागों में देखे जा सकते हैं. आर्य समाज द्वारा शिल्पकारों में जिस चेतना का संचार किया गया, उसी के फलस्वरूप शिल्पकारों ने अपना मान-सम्मान प्राप्त करने के लिए डोला-पालकी संबंधी इस अन्याय के विरूद्ध जो सामाजिक आंदोलन चलाया, उसे ही डोला पालकी आंदोलन कहा जाता है.
(Dola Palki Andolan)

गढवाल में शिल्पकारों द्वारा चलाये गये इस आंदोलन का सवर्ण जातियों द्वारा भारी प्रतिरोध किया गया. सामाजिक वैज्ञानिक एम०एन० श्रीनवास के अनुसार संस्कृतिकरण की प्रक्रिया के अनुसार जब निम्न जातियां उच्च जातियों के अनुरूप उनकी परम्पराओं, रीति-रिवाजों को अपनाती हैं, यह प्रक्रिया संस्कृतिकरण कहलाती है एवं इस प्रक्रिया में सामाजिक संघर्ष (कभी-कभी हिंसक रूप भी) होता है उदाहरणार्थ उत्तर प्रदेश में संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में जाट-जाटवों के बीच संघर्ष होना.

इसी प्रकार के संघर्ष उत्तराखण्ड में भी दिखाई दिए, जिसके अन्तर्गत शिल्पकारों की बारातों को रोककर उन्हें लूटना, मारपीट करना, अपमानित करना आदि घटनाएं हुई. यद्यपि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस संबंध में शिल्पकारों के पक्ष में ही अपना निर्णय सुनाया था. जिसके अनुसार कोई कानून नहीं है जिसके तहत लोगों को पालकियों को बैठकर गांव के बीच गुजरने से रोका जाए, इस समय तक जयानन्द भारती, बलदेव सिह आर्य इस आंदोलन के प्रमुख नेता बन चुके थे. इसी क्रम में बापू बोथा सिह, हरिप्रसाद टमटा, गिरधारी लाल आर्य, ब्रह्मचारी बालक राम प्रज्ञाचक्षु, गंगाराम आर्य, कालीचरण आर्य, कुंदीलाल टमटा, माणिक लाल टमटा, खुशीराम आर्य जैसे सुधारकों का भी उत्कर्ष हुआ.

निम्न जाति के उत्थान संबंधी आंदोलनों में महात्मा गांधी का दृष्टिकोण व्यापक एवं सकारात्मक था उन्होंने ही निम्न जातियों को ‘हरिजन’ शब्द से संबोधित किया. वे कांग्रेस के ऐसे नेता थे जो राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक उत्थान के लिए संघर्ष कर रहे थे.
(Dola Palki Andolan)

उत्तराखण्ड के जयानन्द भारतीय एवं अन्य नेता फरवरी 1940 में गांधी जी से मिले एवं उन्हें शिल्पकारों की बारातों के साथ होने वाले अपमानजनक व्यवहार की व्यथा सुनाई, इस समय देश में व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन चल रहा था. गांधीजी ने गढ़वाल में इस आंदोलन पर तब तक के लिए रोक लगा दी, जब तक कि शिल्पकारों को डोला-पालकी संबंधी अत्याचारों से मुक्ति न मिले. परिणामस्वरूप उत्तराखण्ड के नेताओं के दृष्टिकोण में परिवर्तन आने लगा.

एक प्रस्ताव पारित कर यहाँ के नेताओं ने यह वचन दिया कि वे हरिजनों की बारातों को रोकने वाली घटनायें नहीं होने देंगे. प्रताप सिंह नेगी, भक्तदर्शन, श्रीदेव सुमन, आदि नेताओं का प्रतिनिधिमण्डल गांधीजी से मिला एवं इस संबंध में गांधी जी को संतुष्ट कर दिया गया तथा गांधीजी ने गढ़वाल से सत्याग्रह पर प्रतिबंध हटा दिया.

अप्रैल, 1946 में जयानन्द भारतीय द्वारा दुगड्डा में आर्य समाज के सम्मेलन का आयोजन किया गया. जिसमें एक बार पुनः डोला पालकी संबंधी प्रस्ताव पारित किए गए. इसके उपरान्त समाज में शिल्पकारों की बारातों के साथ अपमानजनक घटनाओं की सामान्यतः पुनरावृत्ति नहीं हुई. किन्तु सवर्ण जातियों के मन में शिल्पकारों के प्रति अप्रत्यक्ष रूप से दूरी का भाव किसी न किसी रूप में बना रहा.

बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशकों तक इस भाव में भी भारी कमी आने लगी. सामाजिक सुधार वस्तुतः एक सतत प्रक्रिया है न कि क्रान्तिकारी प्रक्रिया और सामाजिक परम्पराओं एव रीति रिवाजों की जड़े समाज में अत्यन्त गहरी होती हैं.
(Dola Palki Andolan)

इस प्रकार बीसवीं शताब्दी में देश के अन्य भागों के समान उत्तराखण्ड में भी निम्न जाति आंदोलन हुए. इन शिल्पकार आंदोलनों की एक मुख्य विशेषता यह भी रही कि इनके अन्तर्गत सामाजिक उत्थान के साथ-साथ आर्थिक उत्थान पर भी बल दिया गया. यद्यपि अम्बेडकर एवं गांधी विवाद के अन्तर्गत अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक ‘गांधी एवं कांग्रेस ने दलितों को क्या दिया’ में यह बताया है कि गांधी जी ने निम्न जातियों के आर्थिक उत्थान के लिए कोई कार्य नहीं किया किन्तु उत्तराखण्ड में गांधीवादी नेताओं ने शिल्पकारों के भूमि संबंधी अधिकारों एवं पुनर्वास का समर्थन किया.

स्वयं गोविन्द बल्लभ पंत की भी इसमें भूमिका रही. जिन्होंने 1938 में संयुक्त प्रान्त के मुख्यमंत्री के रूप में भूमिहीन शिल्पकारों की इस मांग को स्वीकार कर लिया. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जहाँ एक ओर राजनीतिक स्वतंत्रता का आंदोलन चल रहा था वहीं दूसरी सामाजिक उत्थान का आंदोलन भी. किन्तु इस आंदोलन में भी शिल्पकार नेताओं के बीच अन्तः संघर्ष की स्थिति दिखाई देती है. जहाँ एक ओर जयानन्द भारतीय आर्य समाज से प्रेरित होने के कारण राष्ट्रवादी प्रकृति रखते थे, वहीं दूसरी ओर हरिप्रसाद टमटा, बाबूसिंह सरकारी पक्ष में रहकर शिल्पकार समाज में जागृति लाना चाहते थे. फिर भी इन दोनों ही समूहों ने उत्तराखण्ड में शिल्पकार समाज के उत्थान में ऐतिहासिक योगदान दिया.
(Dola Palki Andolan)

-डॉ. योगेश धस्माना

डॉ. योगेश धस्माना का यह लेख उनकी किताब उत्तराखंड में जन-जागरण और आंदोलनों का इतिहास किताब से साभार लिया गया है. उत्तराखंड में जन-जागरण और आंदोलनों का इतिहास को यहां से खरीदा जा सकता है: उत्तराखंड में जन-जागरण और आंदोलनों का इतिहास

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