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रंग उसे बीजगणित की जटिल वीथियों में ले जाते थे

मून फ्लोरिस्ट

वो जब भी इस दुकान के आगे से गुज़रता, हल्का सा ठिठक जाता.. . और सोचने लगता कि चाँद पर उगने वाले फूल किस तरह के होते होंगे. उनका रंग क्या धरती पर उगने वाले फूलों जैसा ही होता होगा? क्या उनमें भी वैसी ही आभा होती होंगीं जैसी यहाँ के फूलों में होती हैं? चाँद की मिट्टी की तासीर वहां के फूलों में किस तरह से आती होगी?

चाँद पर फूल चटख ही होते होंगे, इतना उसे भरोसा था.

वो दुकान उसके दफ़्तर के रास्ते में थी. दुकान फूल बेचने वाले की थी और उसकी दुकान के साइन बोर्ड पर चाँद के अर्ध वृत्त में लिपटा कोई आकाशीय फूल था. ऐसा फूल उसने कभी देखा नहीं था. वैसे भी उसने ज्यादा फूल नहीं देखे थे. फूलों के बारे में उसकी जानकारी उतनी ही थी जितनी एनीमेशन देखने वाले बच्चे की कंप्यूटर ग्राफ़िक्स में. वो फूलों की किस्मों को पहचानता नहीं था. लोगों को जब वो फूलों के बारे में बात करते सुनता, वो मन ही मन हैरत करता.

वो कहीं न कहीं फूलों की बात को नफ़ासत से जोड़ता था. वो एक नफ़ीस आदमी नहीं है ऐसा फैसला वो अपने ही खिलाफ़ सुना देता. यद्यपि उसे फूल अच्छे लगते थे. वो फूलों से प्यार करता. उसे बच्चे फूल से लगते. और उसने अपनी प्रेमिका का एक सुन्दर फूल ही दिया था. गुलाब का. पर इसमें कोई दिक्कत नहीं थी. उसने प्रेमिका को फूल देने से ज़्यादा ‘गुल-ज़बान’ में उससे कुछ कहा था. ये फूल से ज्यादा कोई लिपि थी. फ्लोरी- स्क्रिप्ट.

वो फूल को बेशक कम जनता था पर उनके ज़रिये जिस भाषा में कहा जाता था उससे वो वाकिफ था. वैसे भी जब फूल खूबसूरती से ज्यादा वर्णमाला बन जाए तो उनके जाति- कुल की परवाह कौन करता है!

दुनिया भर में प्रचलित भाषाओं और उनकी लिपियों से इतर उसे इस तरह की भाषाओं और वर्णमालाओं का ठीक ठीक ज्ञान हो गया था. वो गंध की लिपि पहचानने लग गया था. बावजूद इसके वो अपने आपको अधूरा महसूस करने लगता. इस दुकान के सामने से गुज़रते उसे हर रोज़ नए तरह के फूल नज़र आने लगते. नवीन रंगों में लिपटी कोमलताएं.बस वो किसी पर भी अपनी तरफ से ‘नेम टैग’ नहीं लगा पाता. वो झुंझला जाता. क्या उसे फूलों की आज तक कायदे से पहचान नहीं हुई है या जेनेटिक सम्मिश्रण ने नित नए फूलों का अविष्कार कर उसे चिढाने का नया फोर्मुला तैयार किया है.वो बड़ी मेहनत से इनसाइक्लोपीडिया देखता और समझने की कोशिश करता पर जैसे ही कोई ताज़ा फूल उसके सामने आता उसके सामने अपरिचय का गाढ़ा वीराना पसर जाता. बचपन में देखे फीके रंगों वाले पांच फूल ही उसकी स्मृति का स्थाई हिस्सा बने रहते.

उसे लगता ये ‘मून फ्लोरिस्ट’ रात को कीमियागरी से नई नई किस्मों के फूल खिला देता है और सुबह अपनी दुकान में सजा देता है. ये रंग ही थे जो उसे परेशान करते थे. वो फीके धूसर रंगों से वाकिफ था पर चटख रंग उसके ज्ञान को चुनौती देते. वो रंगों के शेड्स से परेशान हो जाता. रंगों के शेड्स उसे गणित की टेबल्स से लगते जिन्हें याद करना मुश्किल था. कई सारे रंग उसे बीजगणित की जटिल वीथियों में ले जाते.

आखिर उसने हार कर सोचा वो भाषा का आदमी है. गणित उसके बस की नहीं. पर ‘मून फ्लोरिस्ट’ के सामने से गुज़रने पर कई दिनों तक वो ठिठक ज़रूर जाता था.

संजय व्यास
उदयपुर में रहने वाले संजय व्यास आकाशवाणी में कार्यरत हैं. अपने संवेदनशील गद्य और अनूठी विषयवस्तु के लिए जाने जाते हैं.

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