Featured

क्या एक गमले की मिट्टी काफ़ी है इस वैभव को सींचने में

फ़ीके रंग वाला फूल

कितने आक्रामक लगते है ये चटख रंग.

कांच के टुकड़ों की तरह आँखों में घुसे जाते हैं. गमलों में उगे कोमल और कृशकाय पौधों पर किसने इतने गहरे रंग के फूल उगा दिए? क्या जंगल में भी ऐसे ही तीखे रंगों का सैलाब उमड़ता है? या ये प्रयोगशालाओं के रसायनों से पनपे है ?

झील के किनारे फूलों की प्रदर्शनी लगी है. किनारे पर माहौल में रूमान है. हल्का संगीत पानी की सुस्त लहरों से संगत करता है. लम्बे प्रोमेनाड पर लोगों की चाल में शांति है. पता नहीं चलता कि इस बारिश में छलक उठी झील का टनों गैलन पानी अपनी डूब में आई धरती को कितना ज़ोर से भींचे हुए है. दिगंत में कोई पक्षी सांवली रेखा उकेरता उड़ता चला जाता है.

यहाँ कतारों में लगे हैं बेशुमार गमले. गमलों की मिट्टी में उगे बौने पौधे और उस पर उसके आकार और कद से कहीं ज़्यादा लगे फूल. इनका रंग हैरान करता है. चमकदार बैंगनी, लाल, रानी और गाढ़ा आसमानी.

बेरंग मिट्टी में पस्त से हरे पत्तों के बीच रक्ताभ फूल.जैसे ठंडी आग बैठी है इस गमले में.

रंगों की इस चकाचौंध का पोषण कैसे होता है? क्या एक गमले की मिट्टी काफ़ी है इस वैभव को सींचने में ?

कोई फ़ीके रंग का फूल चाहिए मुझे, भले ही वो मेरी हथेली के आकार से बहुत छोटा हो. इस लम्बी कतार में देखता हूँ शायद कही छुपा बैठा हो. वैभव के बीच उपेक्षित सा कोई हल्के रंग का फूल.

संजय व्यास
उदयपुर में रहने वाले संजय व्यास आकाशवाणी में कार्यरत हैं. अपने संवेदनशील गद्य और अनूठी विषयवस्तु के लिए जाने जाते हैं.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

2 weeks ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

2 weeks ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

2 weeks ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

2 weeks ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

3 weeks ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

3 weeks ago