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मैं ही मैं हूँ, मैं ही सूर्य हूँ, मैं ही मनु…

कॉलेज के दिन थे. रंगीन रुमाल मे इत्र के फाहे रखने की उम्र थी. तो दूसरी तरफ परंपरा-विद्रोह की अवस्था. साइकिल खींचना, तौहीन मानने की उम्र हो चली थी. कॉलेज जाये बिना गुजर भी नहीं थी. युक्ति और व्यवहार से यात्रा करने की प्रबल कामना रहती थी. भाड़ा देकर तो कोई भी यात्रा कर ले. बात तो तब है, जब कोई युक्ति निकाल के, मात्र जुबानी जमाखर्च करके निष्कंटक आना-जाना कर सके. तो लड़के, बिना साधन के ही घर से निकल पड़ते थे. आधे रास्ते तक, किसी से भी लिफ्ट ले लेते. सभी तरह के साधनों से- दुपहिया से लेकर डंपर तक. यहाँ तक कि, बैलगाड़ी-बुग्गी भी. किसी भी तरह के साधन से, यात्रा करने में परहेज नहीं रहता था. जीवन के अनुभव बटोरने पर उन दिनों कुछ ज्यादा ही जोर रहता था. कोई विचित्र सवारी मिल जाए, तो रोमांच का भरपूर मजा लूटते थे. आधा दूरी तय करने के पश्चात, एक सेवा का सहारा था. वहाँ से एक नामी संस्थान की बस जाती थी. वह संस्थान में कार्यरत लोगों के पाल्यो के लिए एक तरह की नियमित सेवा थी. लड़के, उसी में लटक लेते थे. कभी किसी ने कोई टोका-टोकी नहीं की. अक्सर आधा रास्ता, उस सेवा का लाभ उठाते थे, शेष आधा व्यावहारिक चतुराई से. उस दिन भी वापसी में लड़के, संस्थान के बस स्टैंड पर उतरे.

स्टैंड से लड़के इधर-उधर बिखर गए. एक नौजवान था, जो मुख्य मार्ग तक पैदल-पैदल चलते हुए पहुँचा. लिफ्ट के लिए वह सवारी ताकते हुए आगे बढ़ते चला जा रहा था. शाम के पाँच बजने को थे. मुख्य मार्ग पर दो सौ मीटर आगे, एक कारखाना पड़ता था. इस पाली का काम छूटने को था. कारखाने में उस नौजवान के गाँव के कई कामगार काम करते थे. तभी एक सज्जन सड़क पार करते हुए इस ओर आए. वे मोपेड सवार थे. मोपेड का ‘काइनेटिक स्पार्क’ जैसा कुछ नाम था. कारखाने ने कोई स्कीम निकालकर, कामगारों को किस्तों पर दी थी. तो सज्जन नौजवान के ही गाँव के निकले. वे फैक्ट्री में फोरमैन जैसे कुछ थे. नौजवान वहीं पर सुस्ता रहा था. सुस्ताना, तो बस एक बहाना था. वस्तुतः वह साधन की खोज में उस ओर एकटक निहार रहा था. उनकी नजर उस पर पड़ी, तो उन्होंने उसे लिफ्ट देने की पेशकश कर डाली. नेकी और पूछ-पूछ. वह झट से पीछे की सीट पर सवार हो लिया.

आगे, काफी दूर चलकर मुख्य मार्ग से गाँव के लिए सड़क जुड़ती थी. वहाँ पहुँचते ही, फोरमैन साहब ने गर्दन तिरछी की और नौजवान से कहा, “थोड़ा आगे तक हो आते हैं. तुम्हें जल्दी तो नहीं. फलाने गाँव में मेरे साढू का घर पड़ता है. अगर तुम को देर न हो रही हो, तो उससे मिल आते हैं.”

फिर खुलासा करते हुए बोले, “है तो साला गरीब, पर बात ‘रिस्तदारी’ की है. वो दलिद्दर है तो है. ‘रिस्तदारी’ में ये सब तो निभानाई पड़ता है.” नौजवान ने झट से हामी भर दी. वैसे भी जीवन के अनुभव बटोरने का लोभ, उसके मन में निरंतर जोर मारता रहता था. तो सवारी ने गाँव के रास्ते को छोड़ दिया और सीधे रास्ते चलने लगी. फोरमैन साहब ने हिकारत से कहा, “है तो साढू, पर है साला गरीब. क्या करें, निभाना तो पड़ताई है.”

मार्ग भर, वह उसकी आर्थिक दुरावस्था का रोना रोता रहा. लगभग उसकी गरीबी का ढिंढोरा पीटता रहा. ऊपर से बड़प्पन जैसा जताया, कि इसके बावजूद वह उससे रिश्ता निभाना नहीं भूला था, और उसके घर पहुँचने को लगभग उतावला सा हो रहा था. आधे घंटे की यात्रा के बाद, सवारी गंतव्य तक जा पहुँची. मोपेड बाहर ही खड़ी की- सामने ही साढू साहब की पर्णकुटी दिखाई दी. फोरमैन साहब ने उचकते हुए इधर-उधर झाँका. फिर वे नौजवान को बाहर रूकने को कहकर, पर्णकुटी के अंदर जा धँसे. शायद साढू अंदर ही था. काफी देर तक, अंदर दोनों में इशारों-ही- इशारों में बातचीत होती रही. साढू, शायद नौजवान से थोड़ा परदा सा रखना चाहता था. इसलिए अंदर काफी देर हो गई. जब वे बाहर निकले, तो गजब का नजारा था. दोनों गलबहियाँ डाले हुए थे. ऐसा लगा मानों, सारा-का-सारा मनोमालिन्य मिट चुका हो. अमीरी-गरीबी सब खत्म- टोटल सोशलिज्म. बाहर अहाते में निवार की चारपाई पड़ी हुई थी. नौजवान उस पर बैठा हुआ मिला. तो साढू, आज मेजबान की भूमिका में था. इसलिए कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो चला था. वह जबरदस्त दौड़-धूप मचाए हुए था. सहसा, वह अंतर्धान हो गया. शायद आवभगत की चेष्टा में सक्रिय हो चला था. इधर फोरमैन साहब प्रसन्न चित्त थे. फूले नहीं समा रहे थे. मुँह के अंदर-ही-अंदर, कोई गीत गुनगुना रहे थे. अब साढू के प्रति उनके मन में, न कोई नाराजगी थी, न किसी तरह का कोई रोष और न कोई द्वेष- भावना. मानो अकस्मात् समरसता छा चुकी हो.

लगभग आधा घंटा बीत चुका था कि, दिव्य मुस्कान बिखेरते हुए यकायक साढू साहब प्रकट हुए. वह एक हाथ में अल्मुनियम का लोटा थामे हुए था, तो दूसरे हाथ से कुर्ते का पल्लू. लोटा, उसने नौजवान को थमा दिया. शायद मेहमान का मान रखने के लिए थमाया था. शिष्टाचार के नाते, इतना तो बनता ही था. कुर्ते के पल्लू से उसने चमत्कारी ढंग से तरकारियों की बौछार शुरू कर दी- प्याज, हरी मिर्च, मूली जैसे अनेकानेक पदार्थ. साढू एक-एक करके तरकारी कैच करता चला गया. नौजवान को यह कारोबार देखकर बहुत आश्चर्य हुआ.

संकोच में तो वो पहले से ही था. फिर भी उसने शरमाते हुए लोटे के अंदर झाँका. लोटे में आपादमस्तक द्रव्य भरा हुआ था, ठहरा हुआ गंदला सा पानी, कई दिनों तक सुराही में पड़े-पड़े पानी के रंग जैसा. आम हिंदुस्तानी की तरह उसने भी ‘आओ करके सीखें’ किस्म का प्रयोग करने की ठानी. वह अपना चेहरा लोटे के मुहाने तक ले गया और उसे सूँघकर देखा. गंध बहुत तीक्ष्ण निकली, एकदम मर्मांतक. लैबोरेट्री में उठने वाली गंध जैसी. लगभग ‘अमोनिया की खुशबू’ जैसी. लोटा उसने फौरन फोरमैन साहब की ओर बढ़ा दिया. उसे आगे बढ़ाने में जरा भी देरी नहीं की. मानो, ज्यादा देर तक उसे अपने पास रखा और उसको आगे ‘पास’ नहीं किया, तो उसकी साँस अवरुद्ध हो जाएगी. उसकी इस हरकत पर फोरमैन साहब मुस्काए. उन्होंने पुचकार कर कहा, “ले लो, शरमाओ मत. वैसे, तो मैं तुम्हारे अंकल जैसा हुआ. लेकिन ऐसी बातों में मैं बिल्कुल भी विश्वास नहीं करता. इंज्वॉय करते हो, तो खुलके करो. छुपके तो करते ही होगे. हमसे कैसा परदा. ऐसी बातों में शरम कैसी. मेरे लिए तो तू दोस्त जैसा हुआ. शर्मा मत. लगा! दो घूँट.”

नौजवान को अब समझ में आया कि, लोटे में आखिर था क्या. वह शुद्ध आसव था- देसी आसव, कच्ची दारू.

मन-ही-मन फोरमैन साब बहुत खुश हुए. लड़के की सादगी पर नहीं, उसके ‘टीटोटलर’ होने से उन्हें कोई खास मतलब नहीं था.उनकी तो पौ-बारह हो आई थी. अगर नौजवान हाँ कर देता, तो हिस्सा बँट जाता और उनके लिए खुद कम पड़ जाती. शायद दिखावे के लिए अथवा परीक्षा लेने के इरादे से उन्होंने नौजवान को ‘ऑफर’ की थी, ‘देखें आखिर, कहता क्या है.’ शायद उनकी किस्मत जोरदार थी कि, नौजवान ने फौरन हाथ खड़े कर दिए. बकौल भुक्तभोगी, उस समय तक वह ‘सादा पान भी नहीं खाता था.’ इस सूचना से फोरमैन साब का मन बल्लियों उछलने लगा. इस खुशी में उन्होंने प्याज के बल्ब, लड़के को थमाने शुरू कर दिए. नौजवान काफी हद तक समझ चुका था कि, उसे बैठे-ठाले रोजगार थमा दिया गया है. तो वह बिना कहे, प्याज छीलने लगा और छिल-छिलकर फोरमैन साहब को देने लगा. उन्होंने छिले हुए प्याज को खटिया के पाये पर रखा और उस पर जोरदार घूँसा मारा. नतीजन- रेडीमेड स्नैक्स तैयार होता गया. थोड़ी ही देर में, आदिम-मानव- परंपरा में, ढेर सारा स्नैक्स तैयार था.

तत्पश्चात् वे लोटे को मुँह से तकरीबन एक फीट ऊपर ले गए. वहाँ से एक स्थिर बिंदु से उन्होंने मुँह में धार गिरानी चालू की और घूँट-पर-घूँट भरते चले गये. मिर्च-मूली से किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की गई थी, वे उन्हें मजे से मुँह मार-मारकर, समूचा-का-समूचा चबाने लगे. फिर मजे से दो-चार घूँट. उनकी तेजी देखकर ऐसा लगा, मानो वे किसी को कोई मौका नहीं देना चाहते थे, जल्दी-जल्दी इस खेल को खत्म कर देना चाहते हों. खुदा-ना-खास्ता, कोई बीच में टपक पड़ा, तो शिष्टाचारवश पूछना ही पड़ेगा. मुश्किल से पंद्रह-बीस मिनट लगे होंगे कि, उन्होंने समूचा आहार-द्रव्य, अकेले ही निगल डाला. खेल, खत्म हो चुका था.

नौजवान की साँस-में-साँस आई. उसने समझा कि, अब चलने का समय हो गया है, उसे घर पहुँचने की उतावली होने लगी. लेकिन उसका अनुमान गलत निकला. फोरमैन साहब, फौरन खटिया पर लेट गए. बिलकुल चित्त होकर लेटे थे. इधर मेजबान ने सोचा कि, अलसा रहे होंगे. बेचारे दिन भर के थके-हारे हैं, इसीलिए न बात, न चीत. फौरन लमलेट.

आधे घंटे से ऊपर होने को आया, लेकिन वे ज्यों-के- त्यों पड़े रहे, उठे नहीं. बाहर अंधेरा घिर आया था. उन्हें जगाने के सक्रिय प्रयास जारी हो गए, उन्हें आवाज दी, पुकार लगाई गई. फिर उन्हें उलट-पुलटकर देखा गया. सारे- के-सारे प्रयास व्यर्थ गए. किसी की एक न चली. इधर से उठाएँ, तो वे दूसरी दिशा में लुढ़के जा रहे थे. कुल मिलाकर, हर उपाय खाली गया. उनका भौतिक शरीर निश्चेष्ट पड़ा हुआ था, मानो बेचारे ने जीवन उत्सर्ग कर दिया हो. इधर बेचारे साढू ने कोशिशें जारी रखीं, उसने मेहमान को झिंझोड़कर उठाया, तो सज्जन पत्ते की तरह दूसरी ओर को ढ़ुलक गए. थक-हारकर साढू ने सहज भाव से आप्त वचन कहे, “शायद पहली धार की थी. सौद्दा, महंगा पड़ गया.” लेन-देन, खाना-खिलाना, पूछना और गोपनीय बातें प्रकट करना, प्रेम के छह लक्षण गिनाए जाते हैं. तो इस समय फोरमैन साब प्रेम से सराबोर थे. मद में चूर. मेहमान नवाजी का भरपूर लुत्फ उठाते हुए. उनके चेहरे पर अजीब सी भंगिमा छाई हुई थी. काफी देर तक, वे औंधे मुँह पड़े रहे.

क्रमशः साढे नौ बज गए. लड़का हैरान-परेशान था. अबतक उनकी चेतना नहीं लौटी थी. कार्यक्रम छोटा सा था, लेकिन तत्काल फल देने वाला निकला. नौजवान को अब चिंता सताने लगी, ‘घर वाले सवालों की बौछार कर देंगे. वाकया बताने लायक नहीं था. बताया, तो घरवाले संगति-दोष का लांछन लगाने लगेंगे. कोई-न-कोई बहाना गढ़ना होगा. दलीलें देनी पड़ेंगी, लेकिन वे यकीन करने से रहे.’ अब नौजवान को कोफ्त सी होने लगी. वह उस घड़ी को कोसने लगा, जब उसने उनसे लिफ्ट लेने की सोची. उस समय कितना सुकून मिला था. नाहक, लोभ में आकर कहाँ फँस गया. सोचा था- ‘तनिक भी विलंब नहीं होगा, समय बचेगा. थकावट नहीं होगी.’ कहाँ मदद लेने के फेर में, खुद के लिए मुसीबत खड़ी कर दी. बड़ी फजीहत हुई. सामयिक लोभ के चक्कर में, गलत आदमी के साथ फँस गया. छोटे से लालच में नासमझी कर बैठा. गाँव का मोड़ आते ही, उसे उतर जाना था. रास्ता नापते हुए, ज्यादा-से- ज्यादा, आधे घंटे में घर पहुँच जाता. अनुभव बटोरने की लालसा में, इतनी दूर आकर फँस गया.’ फिर उसने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए सोचा, ‘यह सब तो होना ही था. इश्तेहार देकर तो किसी ने बुलाया नहीं था, तो अब भुगतो.’ तो उन्हें जगाने की, फिर से दोनों ने अनगिनत चेष्टाएँ की. जैसे ही उठाते तो, वे हर बार लुढ़क जाते. इस तरह से हर वार खाली गया. जितनी भी तरकीबें सोची, कोई तरकीब हाथ न लगी. कितने विचार आते चले गए. कोई राह नहीं दिखाई दी.

कोई-न-कोई हल, तो ढूँढना ही था. कुछ-न-कुछ, जुगाड़ तो करना ही था. आखिर में साढू को एक विचार कौंधा. उसने नौजवान से कहा, “तुम गड्डी क्यों नहीं चलाते. जवान आदमी हो. थोड़ी हिम्मत करो. ढोकर ले जाओ इसे, हौले-हौले.” नौजवान हतप्रभ होकर रह गया. इस विकल्प पर इसलिए ध्यान नहीं गया क्योंकि उसने अब तक, मात्र साइकिल चलाई थी, मोपेड को हाथ तक नहीं लगाया था. साढू से प्रोत्साहन पाकर, वह थोड़ा-थोड़ा सा राजी दिखने लगा. अब जो कुछ करना था, उसे ही करना था. फिर था भी एक ही तरीका शेष. आत्मविश्वास बटोरकर उसने सोचा, ‘सही तो कह रहा है. ज्यादा मुश्किल नहीं है. मोपेड पर साइकिल चलाने के ही नियम तो लागू होते हैं. इस पर भी गियर कहाँ होते हैं.’ लेकिन इसमें भी एक अड़चन पड़ रही थी. वह इन बातों से बिल्कुल बेखबर था कि ‘इसके ब्रेक कहाँ हैं, और हॉर्न कहाँ. हेडलाइट का बटन कौन सा है.’ तो उसने हिम्मत बाँधकर, स्टैंड पर खड़ी मोपेड स्टार्ट की और टोहकर बत्ती-हॉरन का अनुमान लगाया. एक तरह से उसने बागडोर संभाल ही ली.

अगले चरण में दोनों ने उसे संयुक्त रूप से खटिया से उठाया. फोरमैन साहब के पाँव जमीन पर नहीं टिक रहे थे. अब क्या करें, कुछ समझ में नहीं आ रहा था. नौजवान ने सोचा, ‘किस घड़ी में इससे लिफ्ट ली, जो खुद एयरलिफ्ट करने के काबिल हो गया है.’ फोरमैन साब, एकदम अटल, अविचल और अडिग थे, लेशमात्र भी सहयोग नहीं कर रहे थे, ‘जमी पर नहीं है, मेरे कदम..’ तो दोनों ने उन्हें लादकर, पीछे की सीट पर बिठाया. नौजवान ने स्टेरिंग थामा ही था, कि वे दूसरी तरफ से नीचे लुढ़क पड़े. हिला-डुलाकर उन्हें फिर से आसन पर बिठाया गया. नौजवान आगे की सीट पर बैठा ही था कि, उनका पार्थिव शरीर, अपने तत्त्वज्ञान समेत फिर से धराधाम पर आ गिरा. भूमिशैय्या से ही वे दोनों को घुड़की सी देने लगे. दोनों को इस बात की बहुत खुशी हुई कि, उनकी चेतना जैसे-तैसे लौटी, आखिर लौटी तो सही. हालांकि वे अस्पष्ट सी, अटपटी सी भाषा बोल रहे थे, विशुद्ध रूप से निजरचित भाषा, जिसे समझना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन सा लग रहा था. उन्हें पुनः समेटा गया, तो वे निर्लिप्त होकर झूलने लगे.

इस बार, उन्हें संभालकर सीट पर स्थापित किया गया. खतरा बरकरार था, सीट संकरी सी थी और पृथ्वी बहुत विशाल. इसलिए उन्हें भलीभाँति सीट पर स्थापित किया गया. उनके दोनों हाथ, नौजवान के कंधों के पार ले जाकर, उसके वक्षस्थल पर टिका दिए गए. वहाँ पर स्थापित करके दोनों हाथ, नौजवान के मफलर से बाँध दिये गये. ‘कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी, यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता.’ चूंकि वे हर बार, फिसल-फिसलकर, लुढ़कते जा रहे थे. गुरुत्व, उन्हें सीधे नीचे की ओर खींचे जा रहा था. वे खुद धराधाम पर उतरने को लालायित से दिख रहे थे, इसीलिए उन्हें अच्छे से, सोच-विचारकर अर्थात् कसकर जैसे-तैसे अटकाया गया .

इस कोशिश ने नौजवान की उम्मीदें जिंदा कर दीं. उसने राहत की साँस ली और फौरन सारथी का पद संभाल लिया. एक तरह से उन्हें ढ़ोने की नैतिक जिम्मेदारी ली और सीधी राह चलने लगा. स्पीड बहुत धीमी रखी. फोरमैन साहब, घड़ी-घड़ी, टेढ़े-मेढ़े हिचकोले खाते रहे. इस करतब से उनकी गरदन दाँये-बाँये झूलती रही. काफी दूरी तय करने के बाद, उन्होंने अपनी नशीली आवाज में कहा, “काँ.. लेज्जा.. रे हो.. बे.”

“बाद में बताऊँगा.” कहकर नौजवान ने एकदम चुप्पी साध ली. वो जानता था कि, इस नीरव रात्रि में, अगर एक बार ये पटरी से उतर गए, तो फिर ऊपर चढ़ाने वाला कोई मिलेगा नहीं. इसलिए वह चुपचाप चलता रहा. फोरमैन साब बोले, “हम्म.. काँ हैं… हद्द है.. कम्से-कम् इत्ता.. तो.. बता.. हम्म.. काँ.. हैं. इत्ता..तो..बतादे..यार…” बोलते-बोलते वे रुआँसे हो आए.

संकट अभी टला नहीं था.पग-पग पर यह आशंका बनी रही कि, ‘धरोहर’ कहीं टपक ना पड़ें. वो ‘धरती पर पिकनिक मनाने के’ बहुत इच्छुक लग रहे थे. चांस थे भी काफी ब्राइट. इसलिए नौजवान निःशब्द, साँस रोके ड्राइव करता रहा. हरदम संदेह बना रहा, कि सवारी कहीं ‘अगोचर’ न हो जाए. रह-रहकर उनका स्वर सुनाई देता रहा. निढाल होकर भी वे अपने साढू के ‘सोशल स्टेटस’ को नहीं भूले थे . वह प्रतिबद्धता इस कदर हावी थी कि, अर्ध-मूर्च्छा में ही वे उसका ब्यौरा देना नही भूले. संक्षिप्त सा आर्थिक विश्लेषण करते रहे, ..स्साला.. ग ई..ब.. है. भौत.. ग..ई..ब.’

थक-हारकर, मध्य रात्रि में उन्हें घर पर ड्रॉप किया जा सका. तत्पश्चात् नौजवान अपने घर पहुँचा. उसकी आशंका निर्मूल साबित हुई, क्योंकि घर के सभी सदस्य सो चुके थे. केवल बड़ा भाई जगा हुआ था. उनसे उसे कोई खतरा नहीं था. वो उसका हमउम्र-हमराज किस्म का भाई था. इसलिए उन्हें आपबीती सुनाने में कोई गुरेज नहीं था. पूरी गाथा सुनने के बाद, भाई तंज कसते हुए बोला, “तुम तो बहुत चंट बनते हो. आखिर आ ही गए न उसके चरके में.” नौजवान अनजान सा बनते हुए बोला, “मुझे उसके बारे में पता नहीं था कि, वो ऐसा वाहियात हो जाता है.”

“ओह्हो, तो तू उसका तरीका-सलीका नहीं जानता. सुपरहिट आदमी है वो. भाई मेरे, वो ऐसे ही फँसाता है. बल्कि जाल फैलाकर शिकार खोजता है. ये तो उसका अति सुरक्षित तरीका है. उसे, बेहोशी की हालत में ढ़ोने के लिए हमेशा एक सहयोगी की दरकार रहती है. जब होश में रहता है, तभी इस्टीमेट बना लेता है, कि कौन फिट बैठेगा.” उन्होंने उसकी जो दास्तान सुनाई, उसको संक्षेप में दोहराना अनुचित नहीं होगा.

हफ्ते में, एक दिन फोरमैन साब की छुट्टी रहती थी. उस दिन वे खुलकर ‘गुलछर्रे’ उड़ाते थे. शाम होते ही वे परम चरम अवस्था में पहुँच जाते थे. वे अक्सर चौराहे पर पाए जाते थे. अँधेरा होते ही चलन से बाहर हो जाते थे और एक वटवृक्ष के नीचे जम जाते. चारों तरफ, आते-जाते लोगों पर गुपचुप निगरानी रखते. हालांकि, व्यवहार उनका बहुत ही शिष्ट और शालीन रहता था, ‘एक्स्ट्रा कर्टियस.’ हर किसी को घर तक पहुँचाने को उनका जी हुलसता रहता था. मन अक्सर हिलोरें मारता रहता. हर आते-जाते आदमी से पेशकश करते- आ..ओ तुम..को घर छो..ड़ दूँ.” अँधेरे में आवाज सुनकर आदमी एकदम से उछल पड़ता. अचकचाकर रह जाता. फिर ध्यान लगाकर देखता, ‘खुद तो खड़े होने की हालत में है नहीं, पेंडुलम की तरह आगे-पीछे झूल रहा है. दो कदम आगे चलने की कोशिश में, तीन कदम पीछे पहुँच जाता है. लेकिन शिष्टाचार निभाना नहीं भूलता. बल्कि आदर-सत्कार में कभी कोई कमी नहीं छोड़ना चाहता .’ सारांशतः हॉस्पिटेलिटी का बाजार गर्म किए रहता था. औपचारिकता, जबरदस्त उफान पर रहती थी. हरदम ज़िद मचाए रहता. एक ही रट लगाए रहता, “आओ तु..म को घ..र त..क छो..ड़ दूँ.” लोगों को पिंड छुड़ाना मुश्किल हो जाता. धीरे-धीरे लोग, इस ‘शालीन व्यवहार’ के आदी से होते चले गए.

अगले दिन, वे कल रात के व्यवहार से सर्वथा उदासीन से दिखते थे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो. वैसे संकुचित वे बिल्कुल भी नहीं थे. उजाले में, सामने वाले के प्रति एक मुस्कान जरूर उछाल देते थे. मानो उन्हें कल रात की प्रसन्नता को छुपाने का कोई ठोस कारण नहीं दिख रहा हो.

किसी छुट्टी के दिन, वे साइकिल पे सवार थे. उसी अवस्था में, झूलते हुए नाचते-गाते, कहीं से टुन्न होकर लौट रहे थे. जैसे ही वे लड़खड़ाए, तभी एक लड़के की उन पर नजर पड़ी. उसने, उनको थामने के लिए दौड़ लगा दी. तो महाशय को उसकी यह कोशिश बिल्कुल भी रास नहीं आई. उन्होंने ऐसा जताया मानों, उसकी मदद लेना उन्हें तनिक भी गवारा नहीं था. एक तरह से उसकी बिन माँगी मदद, फौरन ठुकरा दी. मददगार को बरजते हुए वे बोले, “रैणे दे भाणजे, क्यों परेशान होता है. मैंत्तो ऐसेई उतरता हूँ.” कहते-कहते वे लड़खड़ाकर गिर पड़े. लड़का ताज्जुब में पड़ गया. इस बर्ताव से वह एकदम से ठिठकर रह गया. उसने अनुभव किया कि, वे गिरे भी विलंबित लय में थे, हू-ब-हू रिप्ले-चलचित्र की तरह. लेकिन उस अवस्था में भी, औचित्य छाँटने से बाज नहीं आए. साफ-साफ दिख रहा था कि, वे धराधाम पर ‘सिधारे’ थे, लेकिन उन्होंने जताया ऐसे कि, वे स्वेच्छा से ‘पधारे’ हैं. इतना ही नहीं, ‘निज-एक्शन’ के समर्थन में बड़े पते की बात भी कही, ‘मैं तो… लंब्बी छलाँगें.. लगाकेई उतरता हूँ. मेरा तो…येई इस्टाइल है.’

एक भौतिक सिद्धांत के अनुसार, साइकिल से गिरता हुआ आदमी और कमान से निकला हुआ तीर, कभी वापस नहीं जाता. तो वे जमीनी स्तर पर नियमित रूप से मनोरंजन करते हुए मिलते थे. खुलकर जी बहलाया करते थे. दूब-स्नानकर, ऐशोआराम लूटना, उनके प्रिय शगल में शामिल था. अक्सर वे पगडण्डी के किनारे साइकिल ओढे लेटे रहते थे, आँखें मूँदे हुए. लेटे-लेटे मंद-मंद मुस्कराते, जरूर कोई विशेष विचार आता होगा, लुभावना सा. वे जब-तब पगडण्डी के किनारे पाए जाते थे, लेकिन चुप बिल्कुल नहीं रहते थे, ‘अँधेरे में बोल रहा हूँ भाईसाब, लेकिन उजाले में याद रखता हूँ.’ अक्सर आसमान से बातें किया करते थे. खास बात यह थी कि, विपरीत परिस्थिति में भी वे बड़ी सफाई से अपना दामन बचाना जानते थे. औचित्य-चर्चा छेड़े रहते थे- ‘मेरे गिरने का बायस न पूछो दोस्तों, मेरे उतरने का अंदाज़ ही यही है.’

वैसे उनका यह विचार एकदम नया नहीं था. सुरेश वाडेकर से बहुत पहले, ऋषि वामदेव कह चुके थे, ‘मैं ही मैं हूँ. मैं ही सूर्य हूँ, मैं ही मनु…’

 

ललित मोहन रयाल

उत्तराखण्ड सरकार की प्रशासनिक सेवा में कार्यरत ललित मोहन रयाल का लेखन अपनी चुटीली भाषा और पैनी निगाह के लिए जाना जाता है. 2018 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘खड़कमाफी की स्मृतियों से’ को आलोचकों और पाठकों की खासी सराहना मिली. उनकी दो अन्य पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य हैं. काफल ट्री के नियमित सहयोगी.

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Girish Lohani

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  • गजब़नाक !!!!!
    सोमरससिक्त जिह्वा भाषित लफ्ज नैसर्गिक.मुफ्त राइड याचक की फ़जीहत,सीट संकरी धरा विस्तारशीला आदि......
    सांगोपांग हैं।
    शब्दों के शिल्पी लेखक मनोभाव के अणुवीक्षण में सिद्धहस्त तो बेशक हैं ही ।
    अपने भुल्ला को बेपनाह मुबारकाँ !!!!!
    M.S.Rayal

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