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जहां तुम्हारी नजरें टिकी थी उसी जिस्म में तुम नौ महीने कैद थे

4G माँ के ख़त 6G बच्चे के नाम – 50 (Column by Gayatree arya 50)
पिछली किस्त का लिंक:  बच्चे का पेट से निकल कर गोद तक पहुंचना मां के लिए कितना जानलेवा है

खैर, तुम रोए. कानों को तसल्ली हुई, दिल शांत हुआ. नर्स तुम्हें छोड़कर मेरे पास आई और पूरी तरह तहस-नहस हो चुके मेरे सृजन द्वार को संभालने लगी. उस पूरी तरह फटे हुए सृजर द्वार को सिला जाना था, सो वहीं सुन्न करने का इंजेक्शन लगाया गया. लेकिन या तो सुन्न करने वाले इंजेक्शन की दवा ही नकली थी, या फिर दर्द की तेज लहरें दवा के असर को बेअसर करने की जिद पर थी. कुल मिलाकर दर्द का जो ज्वार चढ़ा था, अब वो भाटा बनकर उतर रहा था. अपनी फटी हुई खाल को सिलते हुए मैं महसूस कर रही थी! हर बार सुई मेरी चमड़ी में घुसाई जाती, मैं कराहती, नर्स कहती ‘बस-बस हो गया. क्या करूं. तुम्हारी स्किन ही ऐसी है.’ बीच-बीच में वो ये भी कह रही थी ‘ये तिरछा सा क्यों हो रहा है, यहां सूजन क्यों आई है? ऐसे कैसे हो रहा है?’ उसने दूसरी नर्स से ये सब कहा था.

सृजन द्वार की सिलाई खत्म हुई. दाई मेरे निचले हिस्से से रिसते खून को सोखने के लिए पैड बांध गई थी. ओह मैंने दर्द का महासंग्राम जीत लिया था ओऽऽह. अब वैसे दर्द को मैं अपने शरीर से छूने भी नहीं दूंगी, कभी नहीं, कभी भी नहीं. मैंने मन ही मन तय कर लिया था. मैंने तय कर लिया था की दूसरा बच्चा मैं गोद लूंगी. मैं तब तक नहीं जान सकी थी कि तुम एक लड़के हो या लड़की?

आश्चर्य, दर्द का सारा समंदर पीकर भी मैं जिंदा बच गई थी. मैंने तुम्हें पहली बार देखा तसल्ली से. चौड़ी सी नाक, सूजा हुआ मुंह और बड़ी-बड़ी आंखें लिए तुम इनक्यूबिएटर में लेटे हुए थे मुझसे कुछ ही दूरी पर. लेकिन मैं तुम्हें छू नहीं सकती थी, तुम्हारी आंखें भी खुली थी और मुठ्ठियां भी. तुम बिल्कुल शांत थे, जैसे हैरान हो कि कहां आ गए. इत्तेफाक से तुम मेरी तरफ ही देख रहे थे, पर असल में तुम्हारी पुतलियां ही मेरे ऊपर टिकी थी, तुम देख कहीं और रहे थे. बल्कि तुम कहीं भी नहीं देख रहे थे, तुम शून्य में झांक रहे थे मेरी जान. तुम नहीं जानते थे कि जहां तुम्हारी नजरें टिकी हुई हैं, उसी जिस्म में तुम नौ महीने कैद थे.

तुम्हारी शक्ल मेरे ऊपर थी. चेहरे पर सूजन के कारण, कुल मिलाकर तुम अजीब से दिख रहे थे. इस बीच मैंने दाई से पूछा ‘क्या हुआ है?’ जवाब मिला ‘लड़का.’ एक पल को मैं निराश हुई, तुम्हारे मेरी और तुम्हारे पिता की इच्छा पूरी नहीं हुई थी. लेकिन तुम पूरी तरह स्वस्थ हो इस बात ने मुझे जी भर खुशी और तसल्ली दी. कितना सुकून था इस बात में कि तुममें कोई शारीरिक विकृति नहीं थी, प्रकृति तुम पर और मुझ पर मेहरबान हुई थी मेरी जान. तुम शारीरिक-मानसिक तौर पर बिल्कुल स्वस्थ थे, इससे बड़ा तोहफा तुम्हारी मां के लिए और कुछ भी नहीं हो सकता था, कुछ भी नहीं.

इस बीच दाई तुम्हारी एक झलक तुम्हारे पिता व दादी को दिखा आई थी. मेरी दोस्त ने बताया था कि डिलिवरी होते ही बड़े जोर की भूख लगती है, लेकिन मुझे जरा भी भूख नहीं थी. फिर भी मुझे एक ग्लास गर्म दूध और बिस्किट तुम्हारे पिता व दादी ने भिजवाए. मिलट्री हॉस्पिटल में दूध के नाम पर वही उपलबध रहा होगा, सफेद पानी. बेहद बेमन से मैंने उसे पिया.

यदि मैं कहूं कि तुम्हें देखते ही मेरे मन में ममता हिलोरे मारने लगी थी, तो ये बिल्कुल झूठ होगा. मुझे सिर्फ तसल्ली थी कि तुम जिंदा हो, स्वस्थ हो और ठीक हो. मेरी हालत जंग जीतकर लौटे टूटे-फूटे, थके-हारे, बुरी तरह से घायल योद्धा जैसी थी, जिसमें जीत का जश्न देखने की भी ताकत न बची हो. मैं सच में बेहद थकी थी मेरे बच्चे, और सिर्फ एक गहरी नींद सोना चाहती थी. लेकिन मुझे तुम्हारी चिंता बहुत थी, आखिर तुम मेरी इतनी मेहनत और तकलीफ की कमाई जो थे. मैं बार-बार दाई से कह रही थी, कि वो तुम्हें दूध पिला दें और वे बार-बार मुझे कह रही थी कि मैं चिंता न करूं. लेकिन मैं कैसे न करती भला चिंता.

मैं थके-हारे और बुरी तरह घायल सिपाही की तरह तुम्हें देख रही थी मेरे बच्चे. तुम बिल्कुल शांत लेटे थे, जैसे समझने की कोशिश कर रहे होओ कि अभी कुछ देर पहले जो सब हुआ, वो क्या था? और तुम कहां आ गए? मैं एकटक तुम्हें देख रही थी मेरे बच्चे. इसी बीच तुमने दो-तीन छींकें मारी तो मुझे चिंता हुई, मैंने दाई से कहकर पंखा तुमसे दूर करवाया. वे तुम्हारी जिंदगी की पहली छींकें थीं और मेरी भी पहली ही ऐसी छींक जिसे सुनकर मुझे चिंता हो.

मैं कितनी निश्चित थी कि दर्द का दौर, भयानक दर्द का दौर, हमेशा के लिए चला गया. डिलीवरी कराने वाली नर्स जा चुकी थी अपनी ड्यूटी खत्म कर के. इस बीच में दूसरी नर्स आकर मेरा पैड खोलकर देखती, कि ब्लीडिंग की क्या स्थिति है. दाई ने आकर बिना सुंई के इंजेक्शन से तुम्हें दूध पिलाया, फिर मैं भी आश्वस्त होकर सो गई.

लगभग तीन घंटे बाद पौने चार बजे, वही दैत्य समान डॉक्टर आया मुझे देखने. उसके आते ही मुझे पता चला कि कुछ गड़बड़ है. डॉक्टर ने गल्वज पहने और कहा ‘ये कैसे स्टिच किया है? किस-किस को रख लेते हैं?’ और इतनी तकलीफ झेलकर जो चमड़ी मैंने सिलवाई थी उसे डाक्टर ने वापस उधेड़ दिया क्योंकि वो गलत सिली थी.

मैं गलत थी कि दर्द के आखिरी महासंग्राम को मैंने जीत लिया है. मेरी हालत ऐसी हो गई थी मेरे बच्चे, जैसे किसी मछली को एक रेगिस्तान से निकालकर कहा गया हो कि उसे वापस संमदर में छोड़ा जा रहा है, लेकिन फिर से उसे दूसरे और बड़े रेगिस्तान में फेंक दिया गया हो तड़पने के लिए.

इधर डॉक्टर ने मेरे उधड़े हुए सृजन द्वार को, मेरे बिल्कुल ताजे जख्मों को कुरेदना शुरू किया और उधर मैं फिर से दर्द में तड़पने लगी …उऽऽफ्फ, वो दर्द. वो दर्द, प्रसव पीड़ा से कहीं ज्यादा था मेरे बच्चे. मैं हॉस्पिटल में थी, या कसाई घर में?

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उत्तर प्रदेश के बागपत से ताल्लुक रखने वाली गायत्री आर्य की आधा दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में महिला मुद्दों पर लगातार लिखने वाली गायत्री साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान से सम्मानित एवं हिंदी अकादमी, दिल्ली से कविता व कहानियों के लिए पुरस्कृत हैं.

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Sudhir Kumar

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