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युद्ध की तैयारी में अपना जीवन खपा देने वाले तमाम सैनिक भी अंततः युद्ध नहीं चाहते.

4G माँ के ख़त 6G बच्चे के नाम – 39  (Column by Gayatree arya 39)

पिछली किस्त का लिंक: तुमने बेहद हिंसक और क्रूर दुनिया में जन्म लिया है

तुम्हारे पिता एयरफोर्स में हैं बेटू. क्या तुम्हें पता है तुम्हारे पिता जिस जगह काम करते हैं वहां हर पल, हर घंटे, हर दिन, यानी साल के 365 दिन, साल-दर-साल सिर्फ युद्ध की तैयारी ही होती रहती है. किसी देश पर कैसे, कब और कहां हमला करना है, किस तरह से करना है, कैसे दुश्मन को मारना है और कैसे दूसरे के हमले से खुद को बचाना है. इसी सब की तैयारी साल भर चलती रहती है. दुनिया के सारे देश हर रोज युद्ध और हमले की रणनीति तैयार करते हैं. तीनों सेनाएं जिंदगी भर सिर्फ और सिर्फ युद्ध की तैयारी में जीती हैं. मेरे ख्याल से ये एक ऐसा अकेला रिहर्सल है, जिसका फाइनल शो कोई नहीं चाहता मेरी जान! या कहूं कि साल भर युद्ध की रिहर्सल करने वाले ज्यादातर लोग इसका फाइनल शो, यानी की युद्ध कभी नहीं चाहते.

ये सच है मेरे बेटे कि पूरी दुनिया में अभी भी युद्ध न चाहने वाले लोगों की ही संख्या सबसे ज्यादा है. दुनिया की बड़ी आबादी लाशों के ढेर नहीं चाहती. खून की नदियां कोई नहीं चाहता. लेकिन विडम्बना ही है कि उसके बावजूद भी पूरी दुनिया के करोड़ों, अरबों लोग अपनी पूरी जिंदगी युद्ध की तैयारी में ही लगा देते हैं! तुम पूछ सकते हो, कि मां जब दुनिया में ज्यादातर लोग युद्ध नहीं चाहते, तो फिर वे जीवन भर युद्ध की तैयारी में क्यों लगे रहते हैं? तो मैं सिर्फ इतना ही कहूंगी, कि वे इस सम्भावित युद्ध की तैयारी के बदले मिले पैसों से ही अपने परिवार का पेट भरते हैं. ये कितनी क्रूर विडंबना है न मेरी जान, कि तबाही और विध्वंस जैसी नकारात्मक चीजों पर ही, न सिर्फ बहुत से देशों की, बल्कि असंख्य घरों की भी अर्थव्यवस्थाएं टिकी हैं.

तुम्हारे पिता ने मुझे बताया कि तीनों सेनाएं असल में साल भर युद्ध यानी ‘डमी वार’ की ही तैयारी करती रहती हैं. लेकिन ‘डमी वार’ में अपना जीवन खपा देने वाले तमाम सैनिक भी अंततः युद्ध नहीं चाहते. इसके बावजूद वे तमाम सैनिक पूरे जोश से उस काम में लगे रहते हैं, जिसे वे कभी भी अंतिम रूप से अंजाम नहीं देना चाहते. हर कोई जीना ही चाहता है. मारने वाले भी जीना चाहते हैं, मरने वाले भी जीना चाहते हैं. लेकिन फिर भी वे हर पल एक-दूसरे को मारने की तैयारी में जीवन भर जुटे रहते हैं. कैसा आश्चर्यजनक है न मेरे बच्चे!

तुम ये भी पूछ सकते हो कि जब हर कोई जीना ही चाहता है, तो फिर मरने-मारने का खेल क्यों है, जीयो और जीने दो क्यों नहीं है? पर इस बेहद सीधे सवाल का कोई सीधा सा जवाब नहीं है मेरे पास मेरी जान. हम सब ‘जीयो और जीने दो’ का सिर्फ नारा उछालते हैं, जोर-जोर से उछालते हैं, पर असल में इस नारे में जरा सा भी यकीन नहीं करते.

तुम्हें बचपन में सिखाया जाएगा कि दूसरों की मदद करो, किसी को चोट मत पहुंचाओ, किसी को मारो मत, धोखा मत दो, झूठ मत बोलो आदि. पर असल में सच ये है मेरे बेटे, कि ये सिर्फ किताबी बातें हैं. ये ऐसी बातें हैं जिन्हें बच्चों को सिर्फ सिखाने के लिए सिखाया जाता है, व्यवहार में इनका कोई मोल नहीं है. दुनिया के सबसे अक्लमंद और होशियार लोग भी इन बातों को अपने जीवन में नहीं उतार रहे. मैं समझ नहीं पा रही कि जब बड़े होकर तुम बच्चों को भी इस या उस धड़े में शामिल होकर, किसी न किसी को मारना ही है या मारने के पक्ष में खड़े होना ही है, तो ये सब झूठमूठ में तुम लोगों को क्यों रटाया जाता है?

हम सभी आम और खास लोग दूसरे देश के लिए दुश्मन हैं, सिर्फ दुश्मन! जिसे समय और स्थिति के हिसाब से बस इसलिए मार दिये जाने का ओदश मिलेगा, क्योंकि हम सामने वाले देश के दुश्मन हैं और सामने वाला देश हमारा दुश्मन. जरूरी नहीं कि हम सबने मिलकर सामने वाले देश के लिए कोई गलत काम किया ही होगा. गलत काम सिर्फ कुछेक मुट्ठीभर लोग करेंगे, पर सजा एक सिरे से सबको मिलेगी. कोई नहीं बख्शा जाता, वे बच्चे भी नहीं, जिन्हें सही-गलत का अर्थ तक नहीं पता. जिन्होंने अभी गलत या सही कैसा भी काम करने शुरू तक नहीं किये. क्या गुत्थी है कि सरहद के इस पार भी दुश्मन और उस पार भी दुश्मन. वे हमारे दुश्मन, हम उनके दुश्मन. हम भी दुश्मन वे भी दुश्मन. ये दुश्मनों से भरी दुनिया है, तुम दोस्त ढूंढने कहां जाओगे मेरी जान?

हम सब लोग असल में एक-दूसरे के डर में जी रहे हैं. देशों का अरबों-खरबों रुपया इसी फर्जी युद्ध में खत्म हो जाता है, जिससे शायद हम इस दुनिया के सारे लोगों को तीनों वक्त का खाना, साफ पानी, साफ-सुथरा घर और चिकित्सा दे सकते थे. तुम्हारे जैसे कितने बच्चों को बचा सकते थे, जो कभी भूख तो कभी साध्य बीमारियों से बस यूंही मर जाते हैं. पर अफसोस, कि ऐसा कभी नहीं हो सकेगा. मुठ्ठी भर युद्ध चाहने वालों की वहशी इच्छा; दो वक्त की रोटी की भूख, बीमारी के इलाज और जीवन पर हमेशा ही भारी पड़ती आई और आगे भी पडे़गी.

क्या तुम्हें पता है मेरी जान, कि एक से एक खतरनाक हथियारों की दिन-रात खोज हो रही है. डिस्कवरी चैनल पर ‘फ्यूचर वैपन्स’ नाम से एक प्रोग्राम आता है. उसमें रूह कंपा देने वाले विनाशकारी हथियारों के बारे में एक आदमी खुश हो-होकर बताता है. क्षणों में चुपचाप तबाही मचाने वाले हथियार देखकर मुझे डिप्रेशन होता है. कैसी बात है न, तुम्हारे पिता जो खुद हिंसा में यकीन नहीं रखते, वे साल भर इसी ‘डमी वार’ में जुटे रहने की तनख्वाह पाते हैं.

अभी तक तो तुम बहुत ही कॉपरेटिंग, कम तंग करने वाले, हंसमुख और मस्तमौला बच्चे हो. तुमने थोड़ा-थोड़ा सा चीजों को पकड़ना सीख लिया है और तुम जब-तब मेरे बाल, कपड़े और माला पकड़ते रहते हो. आजकल तुम हाथों और उंगलियों का कार्डिनेशन सीख रहे हो शायद. तुम अपनी दोनों हथेलियों को, उंगलियों को आपस में उलझाते रहते हो पूरा दिन और उन्हें ही देखते भी रहते हो बहुत ध्यान से. अपनी उंगलियों को ध्यान से देखते हुए इतने प्यारे लगते हो न तुम रंग, कि बस क्या ही कहूं मैं, मेरे पास शब्द ही नहीं हैं मेरे बच्चे. तुम मुझे भी सूरजमुखी की तरह देखते रहते हो. क्या मैं तुम्हारा सूरज हूं मेरे सूरजमुखी? क्या जादू है तुम्हारी हंसती हुई चमकीली आंखों में… उफ्फ!

मैं तुम्हारा एक भी मुस्कुराता हुआ पल नहीं खोना चाहती, बस जी भर के जी लेना चाहती हूं, तुम्हारे साथ के इन पलों को. अभी तुम सिर्फ मेरे हो, मेरे लिए हो. पूरी तरह. न पढ़ाई, न कैरियर, न दोस्त, न खिलौने, न आजादी कुछ भी नहीं चाहिए तुम्हें मुझसे अलग. अभी सब कुछ मैं ही हूं तुम्हारे लिए. मैं आकंठ जी लेना चाहती हूं, इन पलों को रंग! क्योंकि ये अनमोल पल फिर कभी लौटकर नहीं आएंगे मेरे जीवन में. बड़े होने पर तुम भी आजादी की सांस लेना चाहोगे, अपनी पसंद-नापसंद के हिसाब से जीना चाहोगे, जो कि मेरी पंसद के अलग हो होगी या हो सकती है और तुम्हें पूरा हक होगा मेरी जान अपना जीवन अपने हिसाब और पसंद से जीने का. पर अभी तुम्हें आजादी भी नहीं चाहिए, अभी तुम्हें सिर्फ अपनी मां चाहिए मेरे बच्चे! जो कि हर पल तुम्हारे पास, तुम्हारे साथ है.

09पी.एम. / 12.12.09

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उत्तर प्रदेश के बागपत से ताल्लुक रखने वाली गायत्री आर्य की आधा दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में महिला मुद्दों पर लगातार लिखने वाली गायत्री साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान से सम्मानित एवं हिंदी अकादमी, दिल्ली से कविता व कहानियों के लिए पुरस्कृत हैं.

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Sudhir Kumar

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