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लाई वी न गई ते निभाई वी न गई

अंतर देस इ
(… शेष कुशल है!)

मामला जम नहीं रहा था. तीन दिन से लगातार पिच्चर हॉल जा रहा हूँ. पूरी मूवी नहीं बस वो राष्ट्रगान वाले टाइम रहकर फिर बाहर आ जाता हूँ. देशभक्ति नहीं आई मुझमें.

अभी कल ही तीन लेट नाइट मूवीज़ देख डालीं. आंख सिकोड़ने की बात नहीं है इस पखवाड़े एएक्सएन पर भी आंखे-वांखे टाइप देश प्रेम से लबरेज़ पिक्चरें ही आ रही हैं. सबका टाइम आता है भाई. पिच्चर और टीवी वालों का तो खासतौर पर. रिमोट कंट्रोल तक से मेरे देश की धरती ई ई ई ई ई ई निकलने लगा पर देस भक्ति… ना!

राष्ट्र के नाम आदेश वाला एकांकी भी देखा. छप्पन वीर रस से ऊभ चूभ कविताएं भी पी लीं. कविताएं भी कौन सी हुंकार, झंकार और टंकार तुक वाली. जिसमें माइक हटा भी दो तो भी कान पर रुमाल लगाकर सुनना पड़ता है. कवि के फेफड़े में इतनी हवा भरी जान पड़ती है कि अटरू-पटरू देस तो फूंक मार के उड़ा दे. सुनने में ही लगता कि कवि हवा में दुश्मन की शक्ल मानकर घूंसा मार के स्पीकर फोड़ देगा और बाहर निकल आएगा. कान फट के हाथ में आ गए पर देस भक्ति… ना!

(तुम से न हो पाएगा देश के प्यारो!)

कूद कूद कर क्राइम टाइम के सारे दरबारी प्रलाप सुने, गुने, भुने. उन्हीं के साथ दुश्मन देस पर चढ़ाई करने को निकला पर वो पहले ‘जी भर के जीने’ के लिए कहीं अटक गए मैंने भी सोचा ‘देश का नमक’ खा लिया जाए. बस! देसभक्ति आने का टाइम निकल लिया.

सुबह से कवि प्रदीप के लिक्खे सारे गाने सुन डाले लेकिन देश भक्ति थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी. वाट्सएप टटोला. कल वाली अधूरी बहस आगे बढ़ाई. जवाब में मां के अंतरंग सम्बन्धों वाली तीन सौ पिचहत्तर गालियों से भरे मैसेज की शुरुआत में ॐ के साथ भारत माता की जय भेज दिया किसी ने. वाट्सएप हैंग हो गया. एक काली स्क्रीन वाली फोटो अपने आप ही वाल पेपर सेट कर के बोला अब खुश ? ससुरा वाट्सएप भी चिढ़ा रहा था. खिसियाहट आ गई. पर देस भक्ति…
नहीं आई तो नहिये आई!

फिर दो बार गरम, लगभग खौलते, पानी से सिर-स्नान कर डाला. तब जाकर एक सिहरन हुई और छन्न से खुलासे की एक बूंद सरकती हुई आई और बोली-

देश प्रेम का बोझा जवानों के सर पर टिका कर सेल्फ़ी लेने में लगे लोगों तुम कब चेतोगे कि तुम भी उतना ही ज़रूरी और देश सेवा का काम कर रहे हो जितना कि वो. किसी को अतिरिक्त सम्मान देकर न्यूनतम ज़िम्मेदारी से मुक्त हो रहे हो. जबकि ज़रूरी नहीं कि बन्दूक थामो, सरहद पर जाओ. डंडा लेकर सड़क पर ट्रैफिक चलाने जाओ तब भी साबित कर सकते हो, कलम लेकर फाइल पर सिर पटकते हो तब भी और जहरीली गैस से भरे गटर में उतरते हो (सफाई के लिए, गैस कलेक्शन के लिए नहीं) तब भी अपनी देश भक्ति साबित कर सकते हो.

(ज्यादा फर्क नहीं है वरिष्ठ और गरिष्ठ अधिकारी मे)

किसी की बपौती नहीं, किसी अकेले की ज़िम्मेवारी नहीं, किसी इकलौते के बस की बात भी नहीं. कोई मिनिमम क्वालीफिकेशन नहीं इस मुआमले में. कोई भी,कभी भी, कहीं भी देश प्रेमी हो सकता है. सरहद, सीना या सिनेमा हॉल, की भी ज़रूरत ना है. (नोट करो ‘देश प्रेम!’ ‘राष्ट्र प्रेम’ के चलताऊ, बोले तो अभी-अभी अँखुआए-बिलबिलाए-भन्नाए, मुहावरों से चमकीला परिधान बनता है, प्रधान नहीं बे, और ढांप लेता है तुम्हारी त्वचा. फिर प्रेम के उप्पर घृणा चमकने लगती है.)

गाना गाने से देस परेम छलकता भर है, ज़रूरत भर भरता नहीं. भाषण देने से गला साफ होता है सुनने में वो सुभीता भी नहीं क्योंकि कान में नुकीली चीज़ डालने से डॉक्टर भी मना करते हैं. वैक्स और अंदर जाने का ख़तरा भी है. छाती पीटने से तो औरो गड़बड़ है, माप कम होने का बराबर ख़तरा बना रहता है. बकिया के सारे प्रपंच भी चादर-चेहरे और मुखौटे के सिवा कुछ नहीं हैं.

अपना काम ईमानदारी, निष्ठा, कर्तव्य परायणता और उच्च मनोबल से करने से ही भला होता है. देश का भी और कमोबेश तुम्हारा भी.

(सरकारीपन भाषा पर रंदे लगाकर फिसलन भरा बना दे तो भी मतलब निकल ही जाना चाहिए … पहचानते भी रहें तो सोने पे सुहागा.)

बूंद सरक कर कान की ललरी तले आ गई है.
तो!

जिवें टुटेया अम्बर तो तारां !!

डिस्क्लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं.

 

अमित श्रीवास्तव

उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं. 6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता).

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Girish Lohani

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