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जब अब्दुल रशीद कारदार ने बनाईं एक साल में तीन फ़िल्में

होली, पागल और पूजा तीनों 1940 में अब्दुल रशीद कारदार की बनाई तीन फ़िल्में हैं. अब्दुल रशीद कारदार की सिनेमाई भूमिका मूक फिल्मों से अमिताभ के उदय के दौर तक फैली हुई है. सहगल शाहजहाँ राजकपूर सुरैया की दास्तान और दिलीप-वहीदा की दिल दिया दर्द लिया मशहूर हैं. लेकिन अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ फिल्म उन्होंने एक ही साल में बना दी ही. एक निर्देशक के रूप में ये तीनों फ़िल्में कारदार की चरम उपल्बधियां हैं.

होली और पागल रंजीत मूवीटोन के लिये और पूजा नेशनल स्टूडियो के लिये बनाई गई. हिंदी का आरंभिक सिनेमा धार्मिक फंतासी और ऐतिहासिक फिल्मों से भरपूर रहा है. सामाजिक फिल्मों में भी आदर्शवादी नायक प्रतिष्ठित होते थे. खलनायक को नायक की शक्ल में प्रस्तुत करने वाली यह हिंदी की पहली फ़िल्में हैं. होली का नायक चाँद नायिका को छल से प्राप्त करना चाहता है. वह जिसे अपने उपभोग के लिए उठाकर लाता है, वह उसके जीवन की दिशा को बदल देती है और इतना ही नहीं अपने पूर्व सच्चे प्रेमी सुदंर को भूलकर नायक पर आसक्त हो जाती है. अच्छे से बुरे और बुरे से अच्छे के रूपांतरण को सटीक मनोविज्ञानिक विश्लेषण के साथ चित्रांकित किया गया. डी.एन. मधोक के गीतों को खेमचंद प्रकाश ने संगीतबध्द किया था. पगले मन किसे सुनाता है और धनवानों की दुनिया है गीत बहुत लोकप्रिय हुए थे.

पागल के संगीतकार भी खेमचंद प्रकाश ही थे और गीत मधोक के साथ पी. एल. संतोषी ने लिखे थे. इसके नायक थे पृथ्वीराज कपूर और नायिका माधुरी.  पृथ्वीराज ने इस फिल्म में एक वासनादग्ध डाक्टर की भूमिका अदा करते हैं. पुरुष के बनाए हुए सामाजिक नियमों के बीच स्त्री किस प्रकार यौनिक रूप से दमित होती है, इसका अत्यंत स्वाभाविक चित्रण कारदार ने किया था.

पूजा भी इसी क्रम की तीसरी फिल्म है. इसके गीतकार थे खान गजनवी और संगीतकार अनिल विशवास. सितारा देवी और सरदार अख्तर की मुख्य भूमिकाओं में प्रस्तुत करते हुए कारदार ने दो बहनों के बीच के संघर्षों को पारिवारिक विसंगतियों के बीच पाशविक यौनिकता के कारण उत्पन्न अन्तः और वाह्य संघर्ष को जिस सादगी और सच्चाई से चित्रित किया है, वह हिंदी सिनेमा में नई शुरुआत थी. अनिल विश्वास का संगीत पूजा की दूसरी ख़ास बात थी. लट उलझी सुलझा जा बालम, मेरे हाथों में मेहंदी लगी, कौन गुमान भरी रे बाँसुरिया,  झूलो झूलो मेरी आशा नित नैनन में झूलो , आज पीया घर आयेंगे, सुख क्या दुःख क्या जीवन क्या, जीवन है एक प्रेम कहानी हाय मुहब्बत हाय जवानी जैसे गीत लोकप्रिय नहीं हुये लेकिन कथा का मर्म कह गए. ये सभी गीत स्वयं कलाकारों ने ही गाये थे. कारदार की इन फिल्मों ने आगे आने वाले लोगों के लिये एक नया प्लेटफ़ार्म तैयार किया.

वसुधा के हिंदी सिनेमा: बीसवीं से इक्कसवीं सदी तक अंक के आधार पर 

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Girish Lohani

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