कॉलम

साझा कलम: 5 – कौशल पन्त

[एक ज़रूरी पहल के तौर पर हम अपने पाठकों से काफल ट्री के लिए उनका गद्य लेखन भी आमंत्रित कर रहे हैं. अपने गाँव, शहर, कस्बे या परिवार की किसी अन्तरंग और आवश्यक स्मृति को विषय बना कर आप चार सौ से आठ सौ शब्दों का गद्य लिख कर हमें kafaltree2018@gmail.com पर भेज सकते हैं. ज़रूरी नहीं कि लेख की विषयवस्तु उत्तराखण्ड पर ही केन्द्रित हो. साथ में अपना संक्षिप्त परिचय एवं एक फोटो अवश्य अटैच करें. हमारा सम्पादक मंडल आपके शब्दों को प्रकाशित कर गौरवान्वित होगा. चुनिंदा प्रकाशित रचनाकारों को नवम्बर माह में सम्मानित किये जाने की भी हमारी योजना है. रचनाएं भेजने की अंतिम तिथि फिलहाल 15 अक्टूबर 2018 है. इस क्रम में पढ़िए  कौशल पन्त की रचना.  – सम्पादक.]

 पाँच का सिक्का

– कौशल पन्त

मैं और माँ, मौसी के यहाँ चल दिये. छत पर भीड़ भरी थी तो आँगन में ही मैं, माँ का हाथ पकड़ कर खड़ा हो गया. इंतज़ार काफी लंबा था लेकिन आवाजों का जोश एक बार भी कम नहीं हुआ. मैं भी चाहता था –  मेरी आवाज़ भी उन लफ्जों को चूमें जिन्हें मैं सुन रहा था, मगर महिलाओं की सिसकियों से भरे करुण क्रंदन में, मैं नहीं कर सका था.

दुख में धीरज धरे घरवालों को आस दिलाता वो दीया जो अभी-अभी जलाया गया था – इस आस में की सब कुछ ठीक ह . घर पर भारत की माँ की ऐसी आस लोगों को उसके सर, माथे में हाथ फ़ैरने पर मजूबूर कर रही थी. माँ को ढांढस बांधते वे बच्चे अपनी उम्र से अधिक का भार उठाकर उस पीड़ा को गर्व की मुस्कान में बदल रहे थे . उस समय मीडिया इतना विकेंद्रित नहीं था की हर घर मे दस्तक दे सके . जिन पडोस के लोगों के सामने बच्चों ने कभी गलती करने पर भी आँसू ना बहाएँ हों, घर के अंदर सिसकियाँ ली हों , आज उन्हीं के सामने वे आँसू छलक आए थे.

मैं माँ के साथ खड़ा कभी सड़क को तो कभी उस घर की खिड़की को देख पा रहा था जहां विश्वास का दीया जल रहा था. भारत, जिसे कुछ मालूम तक नहीं, अपने हम उम्र दोस्त के साथ कंधे पर हाथ डाले आस पास घूम रहा था. कोई टोककर कहे भी तो क्या – लोगों की भावनाएं शब्दो में नहीं बह पा रही थी. वह कभी घर के पास आता और गाँव से आए बड़े बुजुर्गों को प्रणाम करता हुआ झट से भाग जाता. लोग कहते भी आज नहीं करते बेटा – अभी वक़्त नहीं इन रिवाजों का.

उसे कोई कहे भी तो कैसे मात्र 5 साल की उम्र में कोई ऐसे दुख को कैसे समझ सकता है. घर के नजदीक बढ़ती भीड़ ने उसे घर से धीरे–धीरे दूर कर दिया और वह अपने हम उम्र दोस्त के साथ हरे-भरे खेतों में टहलने लगा. वह सुने भी तो किसकी सुने. उसको समझाने वाले भी थे तो वो लोग जिनकी नाक मे वह हर रोज दम करके रखता है. वह इन्तजार में था कि कब दुकानें खुलेंगी और कब वह उस 5 के सिक्के से कुछ लेगा. उसके पास लोग थे जो गाँव से आए थे, माहौल अलग था. 5 का सिक्का था और एक हम उम्र दोस्त, बस उसे इस बात का इंतज़ार था कि दुकान कब खुलेगी. मैं उस आँगन मे खड़ा होकर सब देख पा रहा था. शायद यह मेरा सौभाग्य रहा होगा कि इस वाकिए को मैं आज प्रेक्षित कर पा रहा हूँ.

इसी बीच कुछ गाडियाँ आ करके रुकी और सड़क के नजदीक खड़े लोगों की आवाजें मुझे भी सुनाई देने लगी. लोगों की निगाहें अब सड़क की ओर टिक गयी थीं. बूढ़े अपनी कुर्सी से उठ गए, महिलाओं के घूँघटों ने करवट ली. जोश में नारे लगाते लोगों का हुजूम आता चला जा रहा था ” जब तक सूरज चंद रहेगा देवी तेरा नाम रहेगा… जब तक सूरज चाँद रहेगा देवी तेरा नाम रहेगा…”

वह भावुकता के साथ गर्व देने वाला पल था. लोगों का हुजूम तिरंगे में लिपटे कारगिल युद्ध में शहीद देवी दत्त भट्ट को उसकी आस में बैठे परिवार से रूबरू कराने को आतुर था. घर के जितना नजदीक कारवां बढ़ता जाता उतनी ही आवाजें तेज होते जातीं. वह समय बलवान रहा होगा कि मैं 7 साल की उम्र का होने के बावजूद भी अपनी जगह से हिला तक नहीं.

नारों की आवाज़ों के बीच दिल पसीज देनी वाली करुणा, ममता से भरी आवाजें माहौल को गमगीन कर रही थीं. भारत की नज़रें अभी भी दुकान की तरफ थी. कोई उसे ढूंढे भी तो कैसे और कहाँ? इतने में एक दुकान का शटर खुला और कुछ लोग अंदर चल दिये. इतने में वह दौड़ा और उसका हमउम्र दोस्त उसके पीछे-पीछे… दुकान मे क्या कहा, क्या मांगना चाहा, यह बचपन की एक आदत है. दुकान के अंदर गए लोगों ने उसे गोद मे उठा लिया और तिरंगे के झंडो को हाथ में उठा कर घर की ओर चल दिये.

एक व्यक्ति ने उसे झण्डा दिया और अपने साथ नारे लगाने को कहा – ” देवी दत्त अमर रहे… जब तक सूरज चंद रहेगा देवी तेरा नाम रहेगा… वंदे मातरम… भारत के कुछ शब्द अस्पष्ट जरूर थे मगर उन्हें सुनकर लोगों के नम आँखों की धार और बढ़ने लगी. “देवी दत्त अमर रहे, वंदे मातरम …”

वह लम्हा भारत को समझ में कम आ रहा हो मगर उन लोगों के जोश और उनकी तत्परता ने भारत की पांच के सिक्के की मंजिल को घर तक पहुंचाया. पांच के सिक्के का मूल्य शायद चुकता हो चला था. मगर मेरी कुंठा उन शब्दों को कहने की अभी पूरी नहीं हुई थी. माँ ने मेरा हाथ अभी भी पकड़ा ही हुआ था.

कारवां अंतिम विदाई की ओर घर से चल पड़ा. मेरा दूसरा हाथ मुट्ठी बांधे नारे लगाने को आतुर था. मैं नम आँखों से मन ही मन गर्व से नारे लगा रहा था. मेरे बंद होंठो की दबी आवाज़ बाहर निकलना चाहती थी. मेरे कदम रुक नहीं सकते थे अब – मेरा हाथ छूटा, मैंने अपने पिता को उस भीड़ में देख लिया था… मैं भागा, मुझे जल्दी थी, कुछ कदमों के बाद मेरी आवाज भी गुजने लगी… मेरी आवाज़ भी कह रही थी,

“वंदे मातरम… देवी दत्त अमर रहे… देवी दत्त अमर रहे … भारत माता की जय… वंदे मातरम … जब तक सूरज चंद रहेगा देवी तेरा नाम रहेगा …

 

 

 

कौशल पन्त पिथौरागढ़ के निवासी हैं. उनसे  fridayblessed@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

 

 

 

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