फोटो: अमित मधेशिया
अँधेरे में बैठकर एक जगमगाते स्क्रीन को देखना एक तरह का त्राटक ही है. आप आसपास की सारी दुनिया भूल जाते हैं और समूचा अस्तित्व उन चलती-फिरती तस्वीरों के साथ हिलने-डोलने लगता है, जो सामने है.
त्राटक में तो लाल दीपक की लौ या काला अपारदर्शी अभेद्य ठोस गोल वृत्त होता है जो आपकी दृष्टि और ध्यान को अन्तर्मुखता की तरफ लौटाता है लेकिन यहाँ बात उलटी होती है.
यहाँ त्राटक कैनवास अपेक्षाकृत बड़ा होता है, आप उसे और भी ज्यादा दूरी से देखतें हैं और वह दीपशिखा की तरह निष्कंप या निष्पंद या कृष्णबिंदु की तरह निश्चल या जड़ीभूत नहीं होता. यह सफ़ेद और चमकदार होता है और उसमें श्वेत-श्याम अथवा इन्द्रधनुषी रंगों से सजी हुई हमारी परिचित, अल्प परिचित, अर्थ-कल्पित या कल्पित जिन्दगी अनोखी और अबाध स्वतंत्रता के साथ हरकत करती नजर आती है.
छवियों का यह खेल हमें गहरे बाँध देता है और फिर अगर आप बच्चे या किशोरवय या वयस्क होकर भी तरुण मानसिकता से ग्रस्त (या फिर अगर आप कहीं किसी तरह की भावनात्मक चोट खाए हुए) तब तो फिर इन छायाचित्रों की यह चमकती-दमकती, हंसत-खेलती दुनिया आप पर ऐसा ऐन्द्रियजालिक जादू फेरती है कि आप बस सोते-जागते उसी के हो रहते हैं. अँधेरे हाल में व्यतीत हुए उन तीन घंटों में आप-हम कहीं नहीं रहते या कहिए कहीं के नहीं रहते. सिर्फ उस नकली तमाशे के भयावह रूप से सम्मोहित दर्शक मात्र होते हैं.
अपने बचपन और किशोर जीवन की सिने स्मृतियों में विवरण करता हुआ मैं उन प्राणांतक भावनात्मक आघातों की दुचालन-कुचलन, उसके प्रचंड तथा दुर्निवार वशीकरण तथा उसी मोहमयी विरेचक-छलना को आज तक झेंपती हुई अवज्ञापूर्ण हंसी के साथ खारिज कर सकता हूँ. मनोविज्ञानिक तर्क और चंद धांधली बाहरी सफाइयां भी पेश कर सकता हूँ- तब भी इस तथ्य से आँख चुराना कठिन होगा कि कभी किसी समय अँधेरे रास्ते में, अचानक, पड़ी हुई रस्सी को सांप समझकर, दर से पसीने-पसीने हो जाने वाली शारीरिक-मानसिक प्रतिक्रिया, उतनी ही सच थी जितनी कि आज झेंपती हुई हँसी के पर्दे में रस्सी को सांप साबित करने की कोशिश.
वसुधा के हिंदी सिनेमा: बीसवीं से इक्कसवीं सदी तक अंक में छपे मनोहर वर्मा लेख सपनों को नीलाम करने वाली आर्ट गैलरी के आधार पर
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