उत्तराखण्ड सरकार ने इस साल भी छठ की पूजा के लिए आज 13 नवम्बर को पूरे राज्य में सार्वजनिक छुट्टी घोषित कर दी है. जिस पर कुछ तीखी प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया में हो रही हैं. ये प्रतिक्रियाएं भी उन लोगों की ओर से हो रही हैं, जो न तो राजनीति में हैं और न किसी तरह के क्षेत्रीय संगठनों व दलों में. न वे किसी तरह का दबाव सरकार पर डालने की ही स्थिति में हैं, जबकि इस पर प्रतिक्रिया क्षेत्रीय राजनैतिक दलों , संगठनों व दबाव समूहों की ओर से आनी चाहिए थी, पर उनकी ओर से इस बारे में एक रहस्यमय चुप्पी है. पता नहीं क्यों? ये अपने आप को किस आधार पर क्षेत्रीय राजनैतिक दल व संगठन कहते हैं?
सोशल मीडिया में यह प्रतिक्रिया इसलिए है कि एक तो पूर्वांचल के लोग बहुत कम संख्या में और राज्य के चार जिलों में ही रहते हैं, उनके छठ त्यौहार पर सार्वजनिक छुट्टी किया जाना किसी की समझ में नहीं आता, सिवाय इसके कि इसके पीछे केवल और केवल वोट की राजनीति है और कुछ नहीं ! दूसरी ओर राज्य की बहुसंख्यक आबादी वाले कुमाउनी व गढ़वाली समाजों के मुख्य तीज त्योहारों हरेला, घी संक्रान्त, घुघुतिया त्यार, बच्चों के सबसे बड़े त्योहार फूलदेई, दुतिया त्यार, बिखौती त्यार जैसे अनेक प्रसिद्ध लोकपर्वों पर सरकारों को छुट्टी करना याद नहीं रहता है. दरअसल , जब हम खुद ही अपने तीज – त्योहार को भूल रहे हैं, तो उन लोगों का क्या कसूर जो अपने तीज – त्योहारों से गहरे तक जुड़े ही नहीं हैं, बल्कि परदेश में खूब धूमधड़ाके से मना भी रहे हैं.
हमें तो अपने तीज – त्योहार अपने ही घर में मनाने और अपनी बोली / भाषा का उपयोग करने में शर्म आती है. फूलदेई में अपने बच्चों के हाथ चावल, गुड़ व फूल से भरी थाली व टोकरी पकड़ाने में हमारे अन्दर हीन भावना जन्म लेने लगती है. हल्द्वानी में बदायूँ , रामपुर व पीलीभीत के बटाईदारों के बच्चे ” फूलदेई , छम्मादेई” कहते हुए हमारे द्वारों पर फूल डालते हैं और हम उनके हाथ में एक – एक रुपया रखकर गर्व से फूले नहीं समाते ! पर अपने बच्चों से पड़ोसी के घर तो छोड़िए अपने घर की देहरी तक पर ” फूलदेई छम्मा देई ” कहते हुए चावल व फूल नहीं डलवाते !
घुघुतिया त्यार पर अपने बच्चों के गले में संतरा , दाड़िम से सजी हुई घुघुते की माला डालना हमें दकियानूसी रिवाज लगता है. दूतिया त्यार को हमने ही दूसरों की देखा – देखी भय्यादूज में बदल दिया. मीडिया के मित्रों को भी दूतिया त्यार लिखने में शर्म आती है. सुदूर गॉव में भी अब दूतिया त्यार की बजाय भैय्यादूज होने लगा है. हॉ , छठ की महिमा का खूब बखान कर रहे हैं और करेंगे ! करें भी क्यों न ? आखिर ! छठ की पूजा करने वाले लोग दम लगाकर अपने छठ का बखान करते हैं और हमें अपने फूलदेई , दूतिया त्यार , घुघुतिया पर गर्व नहीं होता. हल्द्वानी जैसे कुमाउनी बाहुल्य वाले भाबरी शहर में घुघुतिया त्यार के दिन छतों व घरों से ” काले कव्वा आजा , घुघुति माला खाजा ” की बच्चों की गूँजती आवाजें क्यों नहीं आती? हल्द्वानी में पर्वतीय संस्कृतिक उत्थान मंच में भी ” घुघुतिया त्यार ” के अवसर पर जो सात दिन का मेला लगता है और वहॉ सात दिन तक जो भी हर तरह के कार्यक्रम होते हैं, उन सभी का संचालन कुमाउनी में न होकर हिन्दी में ही क्यों होता है? जब हम ऐसे अवसरों पर भी अपनी बोली / भाषा का उपयोग नहीं करेंगे तो कैसे बचेगी वह? कौन अपनाएगा उसे ?
यही हाल हमारे हर तरह के क्षेत्रीय राजनैतिक संगठनों, दलों व अब ” गैरसैंण को राजधानी बनाओ ” कहने वालों का है. इनमें से किसी के भी ऐजेन्डे में कुमाऊँ – गढ़वाल की बोली / भाषा व तीज – त्योहार नहीं हैं. क्यों नहीं हैं? इसका जवाब इनके राजनैतिक नेतृत्व को ही देना चाहिए. गैरसैंण में राजधानी बनाना क्या केवल एक राजनैतिक मुद्दा भर है? उस मॉग के पीछे हम लोगों की बोली / भाषा व तीज – त्योहारों की क्षेत्रीय पहचान की मॉग भी नहीं छुपी है? कैसा होगा अगर गैरसैंण राजधानी बने और वहॉ हमारे कुमाऊँ – गढ़वाल के लोकगीतों – लोक संगीत की गूँज के बजाय ” कमरिया लचके ” जैसे बिहारी गीत व भौंडे पंजाबी पॉप गीत गूँजें? हरेला , बग्वाल , घुघुतिया की बजाय छठ व करवा मनाते हुए लोगों की भीड़ हो ! क्या करोगे तब ऐसी राजधानी का? जहॉ तुम्हारी राजनैतिक , सामाजिक व सांस्कृतिक पहचान ही न हो?
ज्यादा आधुनिक बनने की दौड़ में हमने खुद ही अपनी नई पीढ़ी को अपनी बोली / भाषा, तीज – त्योहारों से अलग कर दिया है. कभी उन्हें अपने तीज – त्योहारों से जोड़ने की कोशिश ही नहीं की. उल्टा उन्हें यह कहकर अपनी जड़ों से दूर करने का अपराध हर रोज व लगातार कर रहे हैं कि आजकल के बच्चे कहॉ बोलते हैं कुमाउनी – गढ़वाली? ये क्या जानते हैं तीज – त्योहारों को? पहले हमने खुद ही अपने बच्चों को अपनी बोली / भाषा, तीज – त्योहारों से दूर किया फिर सेमिनार , गोष्ठियों में इनके विलुप्त होने पर जमकर रोना – रोते हैं और सरकारों को कोसते हैं कि वह इनके संरक्षण व इन्हें बचाने के लिए कुछ नहीं कर रही है. पहले हम अपने – अपने घरों में तो अपनी बोली / भाषा , तीज – त्योहारों का संरक्षण करें.
जगमोहन रौतेला
विविध विषयों पर लिखने वाले जगमोहन रौतेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और हल्द्वानी में रहते हैं. काफल ट्री पर उनकी रचनाएँ नियमित प्रकाशित होती रही हैं.
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