उत्सव मनाइए कि अठारह साल का हो गया आपका राज्य
त्रिनेत्रेश्वर मंदिर, बमनस्वाल पहुँचने के लिए आपको जागेश्वर के नज़दीक स्थित पेटशाल नाम की छोटी सी बसासत से मुख्य सड़क छोड़नी होती है. इस दूसरे रास्ते पर निकलते ही आपकी मुलाक़ात एक बेहद खूबसूरत और चौड़ी घाटी से होती है – शान्त बहती नदी, सीढ़ीदार खेत, और खूब सारी रोशनी. करीब दस-बारह किलोमीटर तक नई बनी हुई पक्की सड़क है जिसके बाद के पांच-छः किलोमीटर की कच्ची, मटियल सड़क को अभी पक्का किया जाना बाकी है. यह कच्चा रास्ता उसके बाद फिर एक पक्की सड़क से मिलता है. बाईं तरफ जाएंगे तो गरुड़ाबांज पहुंचेंगे और दाईं तरफ से बमनस्वाल होते हुए लमगड़ा. इस बिंदु से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर है बमनस्वाल.
तकरीबन बेनाम सी इस बसासत में पहुँचने पर पहले पहल कुछ भी उल्लेखनीय नज़र नहीं आता. कहीं कोई छोटा सा बोर्ड तक नहीं जो आपको सूचित करे कि इस जगह पर नवीं शताब्दी के दुर्लभ शिव-मन्दिरों का अनूठा समूह है. सड़क के ऐन किनारे लगे एक संकरे ढलवां रास्ते से होते हुए आप मंदिर परिसर के गेट पर पहुँचते हैं जिसके बाहर लगे सरकारी बोर्ड के बारे में आपको बाद में बताऊंगा.
गेट से भीतर घुसते ही आप इस जगह की सुन्दरता देखकर एक पल को सन्नाटे में आ जाते हैं. पहले तीन बड़े मंदिरों का समूह है जिसके आगे दो अलग-अलग सतहों पर कोई दर्जन भर छोटे-छोटे मंदिर हैं. इन मंदिरों पर भी उत्तर भारत की उसी प्राचीन नागरा, पीढ़ा देवल और वल्लभी शैली की छाप देखी जा सकती है जो जागेश्वर और बैजनाथ समेत कुमाऊं के तमाम प्राचीन शिव-मंदिरों की सिग्नेचर शैली है.
जब हम इस परिसर में घुसे तो वहां कोई नहीं था. तीनों बड़े मंदिरों के प्रवेश पर लोहे की सरिया से बने मामूली से गेट हैं जिन्हें बराये-नाम बनाया गया लगता है. उन्हें आसानी से खोला जा सकता है और अन्दर धरी मूर्तियों को नज़दीक से देखा भी जा सकता है. इनमें उमा-महेश की मूर्ति के अलावा शेषशायी विष्णु की दो मूर्तियां उल्लेखनीय हैं. गेट पर लगे बोर्ड में इबारत को याद किया जाय तो आपको पता लगेगा कि पहले यहां इनके अलावा सूर्य, लक्ष्मीनारायण और कार्तिकेय की मूर्तियाँ भी थीं. इनके अलावा कुछ मूर्तियाँ यहां से ले जाकर अल्मोड़ा के संग्रहालय में रख दी गयी हैं.
समय के साथ-साथ इन मंदिरों में खासी टूटफूट भी हुई है जिसके प्रमाणस्वरूप बाहर खुले में धरे नक्काशीदार स्तम्भों के निचले पार्श्व और मन्दिरों के शिखर इत्यादि ऐसे ही पड़े हुए हैं. आगे एक गोदामनुमा शेड है जिसके भीतर इस स्थान के पुरातात्विक महत्त्व को सरकारी महत्त्व देने के उद्देश्य से कुछ मूर्तियाँ वगैरह चट्टे लगाकर धरी गयी हैं. इस शेड में एक छोटा सा ताला लगा है अलबत्ता धूप और बरसात से मूर्तियों की सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं हैं क्योंकि चार तरफ से यह कमरा करीब-करीब खुला हुआ है.
आगे पत्थर के फर्श वाली दो समतल सतहों पर करीब आधा दर्ज़न समाधिनुमा मंदिर हैं जो देखभाल के अभाव में टेढ़े हो गए हैं. सभी के भीतर कुछ न कुछ मूर्तिनुमा पत्थर स्थापित हैं और कुछ समय पहले की गयी पूजा के अवशेष देखे जा सकते हैं.
पहली निगाह में नदी किनारे स्थित यह मन्दिर परिसर आपको वैराग्य और आनंद से तर कर देता है क्योंकि यहां अधिक लोकप्रिय बना दिए गए इसी तरह के बाकी मंदिरों जैसी भीड़ का कोई नामोनिशान नहीं है लेकिन थोड़ी ही देर में यह कड़वा सच आपको परेशान करने लगता है कि इसकी देखरेख में बरती जा रही लापरवाही के सबब धीरे-धीरे नष्ट होते जाना ही इस जगह नियति है.
करीब दो घंटे तक यहाँ हमारी उपस्थिति के दौरान वहां सिर्फ दो छोटे-छोटे स्कूली बच्चे आये जिनकी दिलचस्पी सिर्फ हमारे कैमरों और मोबाइलों में थी. फिर एक युवा श्रद्धालु महोदय आये. उनसे हमने सामने बह रही नदी का नाम पूछा तो वे बोले कि नदी का कोई नाम नहीं है बस ऐसे ही पानी बह रहा है. अलबत्ता सामने चार बड़े पत्थरों के बीच ठहर गए नदी के पानी को ब्रह्मकुंड कहा जाता है. उन्होंने आगे बताया कि वे दिल्ली में रहते हैं और अपनी ननिहाल बमनस्वाल गांव आए हुए हैं. मंदिर के इतिहास के बारे में उनसे पूछा तो वे बोले कि उनका दिल्ली के चावड़ी बाजार में में हार्डवेयर का काम है इसलिए उन्हें यहां का इतिहास जानने का समय ही नहीं मिला. हम उन्हें बताना चाहते थे कि यह सुयाल नदी है जो आगे जाकर अल्मोड़े के विश्वनाथ घाट से होती हुई क्वारब में कोसी नदी से मिल जाती है लेकिन हमें उनकी पहले से व्यस्त जिन्दगी में और सूचनाएं ठेलने का मन नहीं हुआ.
इस खूबसूरत जगह को छोड़ने का मन नहीं करता लेकिन जब आप वापस आते हैं तो आपकी निगाह पुनः उसी सरकारी बोर्ड पर पड़ती है जो बताता है कि यह त्रिनेत्रेश्वर और एकादश रूद्र महादेव मंदिर एक संरक्षित स्मारक है जिसे हानि पहुंचाने की सूरत में अधिनियम संख्या 7, सन 1957 का उल्लंघन होगा और आपको बंदीगृह का दंड और पांच हजार रुपये तक का जुर्माना भोगना पड़ेगा.
बोर्ड में लिखी गयी इबारत पर लिखा है – ‘आज्ञा से उत्तर प्रदेश सरकार’. अपनी सांस्कृतिक धरोहर का फटा हुआ ढोल लगातार पीटने वाली और नशे-बेरोजगारी में आकंठ डूबे गाँवों-कस्बों वाली धरती को देवभूमि बताने वाली उत्तराखंड की अब तक की सरकारें कितनी सजग रही हैं इसका प्रमाण यह बोर्ड है जिसे अब तक बदला नहीं जा सका है. ऐसी अभी कितनी और जगहें होंगीं मुझे नहीं पता लेकिन होंगी ज़रूर.
फिर ध्यान आता है कि सरकार ने अभी दो-तीन दिन पहले राज्य स्थापना दिवस मनाया है. उत्सव मनाइए कि अठारह साल का हो गया आपका राज्य!
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