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ज़िंदा गरीब औरत को तो मरा ही समझो डाक्साब!

सर्जिकल वार्ड सेवन में, जुलाई की उमस भरी बदबूदार दोपहर में, सीलन भरे अंडे के छिक्कल पर दरारों जैसी ब्रिटिश क़ालीन गुम्बद के आकार वाली छत के नीचे, ओवरसाइज्ड एप्रैन पहने पसीने से तर-ब-तर वह नया नवेला इन्टर्न 70 प्रतिशत जली रामकली को सी. पी. आर. देकर बचाने का हर सम्भव प्रयत्न कर रहा था. वह बार-बार पास खड़ी नर्स को बीच-बीच में अलग-अलग तरह की सुइयां लगाने की हिदायतें देता, कभी-कभी रुक-रुक कर आले से दिल की धड़कनों को सुनने की कोशिश करता. Chandra Shekhar Joshi Short Story

अगर ज़िंदगी की कोई भी फुसफुसाहट आले से कानों में आती तो वो फिर दोगुने जोश से कुछ और नये प्रयत्न करता. बिना यह देखे कि रामकली के सड़े-गले घाव, उनसे लगातार रिसता पीला पानी, उसका ढीला पड़ा शरीर, दूर-दूर मील के पत्थर सी टूटी-फूटी कभी-कभी चेहरा दिखाती साँसें, ऊपर टकटकी लगाए फैली हुई पुतलियाँ समेटे आँखें. मानो सब कुछ  तो साफ़-साफ कह ही रहीं थीं. लेकिन यह सब उस नये-नये इन्टर्न को कहां दिख रहा था. वह तो कर्मरत था युद्ध में. यमराज के विरुद्ध वह यह भी गौर नहीं कर पाया कि पूरा वार्ड अब उसी बिस्तर पर ध्यान लगाये हुआ था.

जब उसकी नज़र आसपास लगी भीड़ पर पड़ी तो उसने क्रोधित हो नर्स को पर्दा लगाने का आग्रह कर अपना युद्ध जारी रखा. अब वह पसीने से नहा गया था. नर्स भी ऊब चुकी थी. सुइयाँ भी कम ही बची थीं तथा छत का पंखा हड़ताल पर जा चुका था. थककर, सर उठाकर उसने रामकली की ओर देखा तो उसे यह समझने में थोड़ा वक़्त लगा कि रामकली के कान से खून बह रहा था और उसके गले में किसी का हाथ कुछ हरकत कर रहा था. Chandra Shekhar Joshi Short Story

गौर से देखने पर समझ में आया कि रामकली की सास उसके शरीर से गहने उतारने का प्रयास कर रही थी. जाने उसे क्या हुआ, उसने उसी पल एक झन्नाटेदार थप्पड़ रामकली की सास के हड्डी गालों में रसीद दिया. फिर क्रोधित होकर बोला कि यहाँ हम इनकी जान बचाने की कोशिश कर रहे हैं और तुम्हें इतना सब्र नहीं कि जीते जी उसके शरीर से ज़ेवर नोच रही हो, धिक्कार है तुम्हें!

सास भी पूरी तरह से तैयार थीं. वह बोली, “डाक्साब इसे तो मरी हुई ही समझो, तुम्हें न दिखाई दे तो अलग ही बात है. ई है पुलिस केस. ई के मरने के बाद हम सब जेल जईहैं. बच्चों का लालन-पालन खातिर पैसा चाहिए कि नाहीं? जेल में कहाँ से लइबो पैसा? उन्हीं का ख़ातिर हम यह ज़ेवर निकालिस हैं. बच्चों को देई देब. पोस्ट मार्टिन से पहिले तो ज़ेवरिया पुलिसिया खा जाब न!”

इन्टर्न साहब सुन्न थे, पर इस घटनाक्रम से कुछ बातें सीख गए.

पहली बात यह थी कि ज़रूरी नहीं कि जो चीज आँखों से भी दिखाई दे रही हो वही सच हो. दूसरी बात कि उन्हें अभी समाज का ‘क ख ग’ सीखना बाक़ी है तथा तीसरी सबसे महत्वपूर्ण बात कि रामकली को अब मर जाना चाहिए. अब उनकी प्राथमिकता जल्दी से रामकली को डेड डिक्लेयर करके डैथ बुक भरने के बाद पुलिस को सूचित करने की ही रह गई थी.Chandra Shekhar Joshi Short Story

डॉ. चन्द्र शेखर जोशी

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लेखक डॉ. चन्द्र शेखर जोशी

31 अक्टूबर 1963 को बरेली में जन्मे उत्तराखंड के खटीमा में रहने वाले डॉ. चन्द्र शेखर जोशी पेशे से चिकित्सक हैं और एक अस्पताल का संचालन करते हैं. खटीमा और उत्तराखंड के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में उनकी महत्वपूर्ण उपस्थिति लम्बे समय से दर्ज की जाती रही है. कविता-साहित्य में विशेष दिलचस्पी रखने वाले डॉ. जोशी की काफल ट्री में छपने वाली यह पहली रचना है.

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