फोटो: स्व. कमल जोशी
चाय हमारे हिन्दुस्तानी समाज में कुछ इस तरह रच-बस चुकी है कि वह अब केवल राष्ट्रीय पेय ही नहीं रहा, बल्कि चाय के बहाने बड़े बड़े काम चुटकियों में हल करने का जरिया भी है. बाजार से लेकर दफ्तर तक और ड्रांइग रूम की गुफ्तगू से लेकर शादी-ब्याह की तैयारी तक सारी चर्चा चाय के इ्रर्द गिर्द ही घूमती नजर आती है. चाय का इतिहास टटोलें तो इसका इतिहास हिन्दुस्तान के लिए पुराना नहीं है, महज दो सौ साल से भी कम समय में चाय ने इस कदर अपनी धमक दी कि चाय हमारा प्रमुख पेय बन गया. कहा जाता है कि उन्नीसवीं सदी में 1834 के आस-पास अंग्रेज चाय को भारत लाये, लेकिन इससे पहले भी आसाम में चाय की झाड़ियां पाई जाती थी, जिसका इस्तेमाल कबाइली लोग करते थे. आम जन तक अंग्रेजों ने हिन्दुस्तानियों को चाय से इस कदर रूबरू कराया कि आज हर आगन्तुक की आवभगत का चाय मुख्य जरिया बन गया.
(Chai Diwas 2022)
वैसे चाय का सबसे पहले प्रयोग चीन में बताया जाता है, और चाय शब्द भी मन्दारिन के ’चा’ से आयातित हिन्दुस्तानी तर्जुमा कहा जा सकता है. हमारे देश की अलग अलग प्रान्तीय भाषाओं में भी इसी से मिलते जुलते शब्द चाय के लिए व्यवहृत किये गये हैं. आज विश्व में चाय उत्पादन में भारत का दूसरा स्थान है, जब कि चीन पहले नंबर पर. लेकिन हमारे देशवासियों का चाय प्रेम इसी बात से जाहिर होता है कि अपना देश चाय उत्पादन में दूसरे नंबर पर होने के बावजूद निर्यात में चौथे पायदान पर है, जब कि श्रीलंका चाय निर्यात में अब्बल रहा है. यानि अपने उत्पादन का चाय का एक बड़ा हिस्सा हिन्दुस्तानी खुद ही गटक जाते हैं.
आज जब पहाड़ में पलायन की रफ्तार चरम पर है और सारी फसलों को जंगली जानवरों द्वारा चट कर जाना इसके पीछे प्रमुख कारण माना जा रहा है तो चाय की खेती एक आशा की किरण बन सकती है. पहाड़ की ढालदार जमीन तथा चाय के लिए माकूल जलवायु कुदरत ने हमें बख्शी है, तो क्या यह नहीं हो सकता है, कि पहाड़ में जहॉ चाय के लिए अनुकूल जलवायु व भूमि है, वहॉ चाय की खेती को प्रोत्साहन दिया जाय ? जिसमें जंगली जानवरों के भी नुकसान की संभावना बहुत कम है.
चाय का जिक्र आते ही दिमाग में बरबस दो बिम्ब उतर रहे हैं, जिनमें एक ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक चाय का प्रचार कर प्रमोट किया और दूसरे ने क्षेत्रीय स्तर पर ही सही चाय छोड़ने की मुहिम चलायी. हालांकि इन दो व्यक्तित्वों के लिहाज से देखा जाय तो दोनों में कहीं से कहीं तक कोई साम्य नहीं,लेकिन चर्चा चाय की हो रही है, तो दोनों बिम्ब एक साथ उभरने स्वाभाविक है. चलिये,उनका जिक्र बाद में करते हैं, पहले रोजमर्रा की जिन्दगी में चाय की अहमियत को जान लें. दिन की शुरूआत ’बेड टी’ से करना ये तो हमारी आदत में शुमार हो ही चुका है, मेहमान की आवभगत के लिए चाय से अच्छा सस्ता, सहज और सरल तरीका हो नहीं सकता. हालांकि आज बाजारवाद की होड़ में ठण्डे पेयों की भरमार है और तथाकथित अभिजात्य व शहरी समाज में ग्रीन टी लोगों का पसन्दीदा पेय बनता जा रहा है. जिसमें न तो चाय की पत्तियां इस्तेमाल होती हैं और न रंग ही इसका ग्रीन रहता है, फिर भी ग्रीन टी नाम क्यों दे दिया?
अपने देश के तो बहुसंख्यक लोग गांव देहातों में रहते हैं और निम्न मध्यम वर्गीय अथवा निम्न वर्ग से ताल्लुक रखते हैं, उनके लिए कोल्ड ड्रिंक या ग्रीन टी नहीं, चाय ही उनका पेय है. खेतों, कल कारखानों और सड़कों पर काम करने वाले श्रमिकों से जरा पूछिये, सूखे हलक में दो घॅूट चाय पहुंचने पर फिर से कैसी ताजगी व स्फूर्ति आ जाती है. हालांकि चाय में कोई पौष्टिक तत्व मौजूद नहीं हैं, इसमें मौजूद कैफीन का ही कमाल है कि क्षण भर के लिए इन्सान स्वयं को तरोताजा महसूस करने लगता है. पहाड़ में तो चाय का रिश्ता हमारे स्वागत सत्कार और आत्मीयता से जुड़ा है. ’’एक घुटुक चहा पी जाओ’’ कह देने भर से हम अपनापन प्रदर्शित कर देते हैं. फिर हमारे पहाड़ की गुड़ या मिश्री की डली के साथ कटकी चाय हो तो क्या कहने? कटकी चाय तो अन्दर तक तृप्त कर देती है.
कहते हैं, चाय तलब से पी जाती है, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है कि हर कोई चाय तलब से ही पी रहा हो. कभी-कभी चाय के आगे ’म’ लुप्त रहता है और हमें बिना तलब के चाय पिला दी जाती है, ’मतलब’ बहुत बाद में समझ आता है. जाहिर है किसी को चाय के बहाने घर पर बुलाने के पीछे भी कुछ इसी तरह का भाव छुपा रहता है. गांव-देहातों में पहले एक परम्परा थी कि विवाह योग्य कन्या के लिए जब वर पक्ष देखने आते तो कन्या का प्रथम दर्शन चाय के बहाने ही कराया जाता. किसी को यह बताने की जरूरत ही नहीं पड़ती कि होने वाली दुल्हन अमुक है. जो चाय ला रही होती वह निश्चित रूप से वरार्थी कन्या ही होती. ’कभी चाय पर आइये’ या ’कभी चाय पर बुलाते हैं’ जैसे संवाद का मतलब केवल चाय पीना ही नहीं होता, उसके पीछे किसी प्रसंग विशेष पर चर्चा का न्यौता भी होता है. नुक्कड़ की चाय की दुकानें तो अक्सर गरमागरम चर्चाओं के केन्द्र हुआ करती हैं. जैसा समाज वैसी चर्चाऐं, गांव की चाय की दुकानों से लेकर राजधानी के कॉफी हाउस तक सरकारें बनाने तथा गिराने तक की साक्षी रही हैं.
(Chai Diwas 2022)
चाय की कीमत दस-पांच रूपये में आंकने की भूल मत कीजिएगा. पहले हमारे समाज में गोदान की परम्परा थी, अभीष्ट फल की प्राप्ति के लिए दुधारू गाय बछिया या बछड़े सहित दान की जाती थी, लेकिन आज ऐसा नहीं है, क्योंकि स्वयं गृहीता गाय पालने में समर्थ नहीं. गोदान करने वाला दस-बीस हजार की गाय के बदले 500 रूपये की गौ-निष्कृति देकर गोदान के फल का भागी बन जाता है. ठीक इसी के बरअक्स एक शब्द है – ’’चाय-पानी करना ’’. दफ्तर के काम जिसने करवाये हों, वे इससे अच्छी तरह वाकिफ होंगे. अगर किसी दफ्तर में आपका कोई काम अटका हो तो दफ्तर के उस कारिन्दे को बस आप आश्वस्त करा दें कि आपका ’चाय-पानी’ हो जायेगा. फिर देखिये इस चाय पानी का कमाल. महज चाय-पानी मतलब कुल खर्च दस-बीस रूपये. लेकिन दफ्तर वाले ’चाय-पानी’ की कीमत बढ़ जाती है- हजार, पांच हजार, दस हजार तक. मतलब साफ है, गाय से हमारी चाय ज्यादा वजनदार हो जाती है.
आइये ! अब उन दो बिम्बों पर बात करें, जो चाय-चर्चा में बरबस दिमाग में कुलबुला रहे है. सच्चाई तो ये है कि चाय भले बाहरी देशों से भारत आई हो, लेकिन आज वडनगर (गुजरात)के रेलवे प्लेटफार्म के चाय वाले ने इसे राजनीतिक चर्चाओं के गलियारे में लाकर खड़ा कर दिया है. वर्ष 2014 के बाद चाय केवल पेय नहीं रहा, यह राजनीति का भी गरमा-गरम मुद्दा बन चुका है. एक चाय बेचने वाला यदि फर्श से अर्श तक पहुंच सकता है, तो चाय तो खुद-ब-खुद सुर्खियों में रहेगी ही. अन्तर्राष्ट्रीय चाय बाजार को तो उस शख्स का शुक्रगुजार होना चाहिये, जिसने चाय के अन्तर्राष्ट्रीय ब्रांड एम्बेसेडर का काम मुफ्त में कर दिया.
इसी के बरअक्स अब वह बिम्ब जो बचपन से दिमाग में बसा है और आज चाय दिवस पर अनायास अन्दर ही अन्दर हिलोरे मार रहा है. एक ऐसे फकीर का अफसाना जिसने मजरूह सुल्तानपुरी की उस नज्म को भी गलत साबित कर दिया, जिसमें वे कहते हैं – ’’मैं अकेला चला जानिबे मंजिल मगर, लोग मिलते गये और कारवां बनता गया ’’’. लेकिन इस फकीर (हालांकि वह गृहस्थी था ) के साथ कारवां तो छोड़िये एक इन्सान ने भी मुहिम में साथ नहीं दिया, फिर भी वह थका नहीं, रूका नहीं और ’एकला चलो रे’ की जिद पर उसने पूरी जिन्दगी चाय के विरोध में खपा दी. यदि आप पिछली सदी के साठ-सत्तर के दशक में हल्द्वानी से अल्मोड़ा या रानीखेत की तरफ गये हों तो सड़क के दायें-बायें बड़ी-बड़ी शिलाओं पर चूने से लिखी हुई कुछ इबारतें आपने जरूर देखी होगी.
बात पुरानी हो चुकी है, स्वाभाविक है कि जिक्र होने पर धुंधली सी तस्वीर आपके दिमाग में उतर रही होंगी. इन शिलाओं में कुछ स्लोगन लिखे होते थे, जिसमें प्रमुख रूप से ’चाय-बीड़ी छोड़ो ’ की नसीहते होती. इसके अलावा कभी सामाजिक बुराईयों के प्रति जनचेतना फैलाने और कभी राष्ट्रीय कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार व समाज के लिए नसीहतें. जाहिर है कि साठ-सत्तर के दौर में चीन तथा पाकिस्तान के साथ तनातनी थी, तो इससे संबंधित स्लोगन भी इन पत्थरों अथवा दीवारों पर अंकित रहते.
(Chai Diwas 2022)
उन्हें देखे हुए 50 साल से अधिक का अर्सा बीत चुका है, लेकिन अभी भी उनका चेहरा तथा हुलिया पूरी तरह याद है. कोई 50-55 की उम्र रही होगी तब उनकी. नुकीले नाक-नक्श, गोरा रंग, गंजे सिर पर चुटिया के पास काले-सफेद मिश्रित गिनती के बाल, छरहरा बदन और तन पर लपेटा सफेद सूती अंगवस्त्र (बिना सिला हुआ) तथा पांव नंगे. बिल्कुल गान्धी जी वाली वेषभूषा के साथ गान्धी के मौन अनुयायी. तब हम स्कूली बच्चे हुआ करते और रोज मेन हाईवे पर पैदल चलकर 8 किमी दूर अपने स्कूल जाते. हम उन्हें केवल ’चाय-बीड़ी छोड़ो’ वाले शख्स के तौर पर जानते. भला हो उन वाहन चालकों का कि उन्हें हर कोई बिना पैसे लिये लिफ्ट दे देता था. वे किसी भी ट्रक अथवा बस में इधर-उधर जाते अक्सर नजर आ जाया करते और जहॉ कोई बड़ी शिला अथवा स्लोगन लिखने का उचित स्थान मिलता, हाथ में चूने की बाल्टी और कूची लेकर लिखने लगते. लिखावट ऐसी की हूबहू छापे के अक्षर. लेकिन उनका सामना करने का साहस हम में नहीं होता, कारण चाय तो हरेक पीता ही था और स्कूली जीवन में ही कई को बीड़ी पीने की लत भी लग चुकी थी. इसलिए उनसे दूरी बनाये रखना ही बेहतर समझते. बहुत बाद में पता चला कि उनका नाम शिवदत्त जोशी है और पास में ही ज्योलीकोट में उनका घर तथा परिवार है. बताते है कि कभी नैनीताल में वे खुद भी चाय की दुकान चलाते थे, लेकिन न जाने कौन सा टर्निंग प्वाइन्ट उनकी जिन्दगी में आया कि चाय-बीड़ी व मादक पदार्थों के सेवन के विरूद्ध जनजागरण ही उनका मकसद बन गया. आज सोचता हॅू कि ऐसा निस्वार्थ कर्मयोगी, जो काम सरकार को करना चाहिये वह बिना किसी अपेक्षा के कर रहा है. मुझे नहीं मालूम कि सरकार व प्रशासन की नजर भी उनके काम पर कभी पड़ी या नही? यह भी नहीं मालूम कि उन्हें कभी इस कार्य के लिए पुरस्कृत किया गया हो.
चाय दिवस के मौके पर दोनों की याद आना स्वाभाविक हैं. एक ने चाय को चर्चा में लाकर बतौर इन्टरनेशनल एम्बेसेडर, चाय के बाजार को परोक्ष रूप से ही सही प्रोत्साहित किया और दूसरे ने चाय-बीड़ी तथा मदिरापान के विरोध में जनजागरण कर नशामुक्त समाज की नसीहतें दी. मुझे नहीं मालूम कि ये नसीहतें कितनों ने आत्मसात की. जाहिर है कि जनजागरण की नसीहतों का प्रभाव प्रत्यक्ष अथवा तात्कालिक नहीं दिखता, लेकिन समाज को इस दिशा में सोचने को मजबूर तो करता ही है.
(Chai Diwas 2022)
भवाली में रहने वाले भुवन चन्द्र पन्त ने वर्ष 2014 तक नैनीताल के भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय में 34 वर्षों तक सेवा दी है. आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से उनकी कवितायें प्रसारित हो चुकी हैं.
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