फोटो : www.indiangorkhas.in से साभार.
इस बात को सभी लोग जानते हैं हैं कि भारतीय राष्ट्रगान रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा लिखा गया था. भारत का राष्ट्रगान जन-गण-मन 1911 में रविन्द्र नाथ टैगौर ने लिखा था. इसे पहली बार 27 दिसंबर 1911 के दिन कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में गाया गया था. राष्ट्रगान पहली बार 1912 में तत्वबोधिनी नाम की पत्रिका में ‘भारत विधाता’ नाम के शीर्षक से छपा था.
राष्ट्रगान की वर्तमान मार्चिंग टोन देने वाले व्यक्ति का नाम था कैप्टन राम सिंह ठाकुर. कैप्टन राम सिंह ठाकुर का जन्म 15 अगस्त 1914 को धर्मशाला के चीलगाड़ी में हुआ था. कैप्टन राम सिंह ठाकुर बचपन से ही संगीत में रुचि रखते थे. कैप्टन राम सिंह ठाकुर दादाजी जमनी चंद पिथौरागढ़ जिले के मुनाकोट गांव के रहने वाले थे. जमनी चंद 1890 में अपने परिवार समेत हिमांचल बस गये थे.
कैप्टन राम सिंह ठाकुर के पिता हवालदार दिलीप सिंह ने उन्हें बचपन से ही सेना में जाने के लिये प्रेरित किया था. 1927 में मिडिल की परीक्षा पास कर वह सेकेण्ड गोरखा राइफल्स के बैंड में भर्ती हो गये. अपने एक इंटरव्यू में कैप्टन राम सिंह ठाकुर सिंह बताते हैं कि उन्हें संगीत सीखने की प्रेरणा अपने नानाजी नथु चंद से मिली.
सेना में जाने के बाद सन 1941 में कैप्टन राम सिंह ठाकुर कम्पनी मेजर हवलदार बने. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इन्हें उनकी यूनिट के साथ सिंगापुर और मलाया भेजा गया. दिसंबर 1941 में जापानी सेना ने मलाया-थाईलैंड सीमा पर हमला किया और ब्रिटिश सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया. जापानियों द्वारा 200 से अधिक भारतीय सैनिकों को गिरफ्तार किया गया था जिनमें कैप्टन राम सिंह ठाकुर भी एक थे.
अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने की शर्त पर इन सैनिकों को आजाद हिन्द फौज में शामिल किया गया. प्रारंभ में कैप्टन राम सिंह ठाकुर ने आजाद हिन्द फौज में शामिल होने से मना कर दिया लेकिन जब उन्हें पता चला की आजाद हिन्द फौज की कमान सुभाष चन्द्र बोस के हाथों है तो वे आजाद हिन्द फौज में शामिल हो गये.
आजाद हिन्द फौज में कैप्टन राम सिंह ठाकुर की गायन प्रतिभा से उनके सभी साथी बड़े प्रशन्न रहते थे. जब सुभाष चन्द्र बोस को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने कैप्टन राम सिंह ठाकुर से कौमी तराना (राष्ट्रगीत) तैयार करने का आग्रह किया. दि ट्रिब्यून में छपे एक लेख अनुसार कैप्टन राम सिंह ठाकुर इस पल को याद करते हुए कहते हैं कि
सुभाषजी ने मुझे बताया कि कौमी तराना की धुन इतनी शक्तिशाली और प्रेरणादायक होनी चाहिए कि जब आईएनए के सैनिक इसे प्रस्तुत करें, तो इससे न केवल सैनिकों बल्कि लाखों भारतीयों की आत्मा भी हिल उठे.
31 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में आजाद हिन्द फौज की सेना का कब्ज़ा हो गया और कैप्टन राम सिंह ठाकुर ने अपने आकेस्ट्रा के साथ कौमी तराना बजाया. 1944 में सुभाष चन्द्र बोस ने कैप्टन राम सिंह ठाकुर को दो स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया. यह स्वर्ण पदक उन्हें रंगून में भेजे गये थे जो आजाद हिन्द फौज के बड़े अधिकारियों के सामने 23 जनवरी 1944 को कैप्टन राम सिंह ठाकुर को दिये गये.
द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हर के बाद आजाद हिन्द फौज के सौनिकों को भी समर्पण करना पड़ा. कैप्टन राम सिंह ठाकुर दिल्ली में काबुल लाइन छावनी में कैद थे. जहां महात्मा गांधी उनसे मिलने आये थे. 15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ तब लाल किले में कैप्टन राम सिंह ठाकुर के नेतृत्त्व में ऑर्केस्ट्रा ने सुख चैन की बरखा बरसे… गीत की धुन बजाई. यह जन-गण-मन का उर्दू-हिन्दी अनुवाद था. इस गीत की धुन को बाद में जन गण मन… की धुन के रूप में प्रयोग किया गया.
वायलिन पर राम सिंह ठाकुर. फोटो : www.indiangorkhas.in से साभार.
कैप्टन राम सिंह ठाकुर ने सेना में प्रसिद्ध ब्रिटिश संगीतकार हैडसन और डेनिश से ब्रास बैंड, स्ट्रिंग बैंड और डांस बैंड का प्रशिक्षण प्राप्त किया. वायलीन उन्होंने कैप्टन रोज से सीखा था. उन्होंने कदम-कदम बढ़ाये जा ख़ुशी के गीत गाये जा… गीत लिखा था और उन्हीं के द्वारा इसका संगीत भी दिया गया था.
आजाद हिन्द फौज के लगभग सभी गानों में कैप्टन राम सिंह ठाकुर ने ही संगीत दिया था. कैप्टन राम सिंह ठाकुर ने मुस्ताक अहमद के ‘गीत कौमी तिरंगे झंडा ऊंचा रहे जहां में’, मुमताज हुसैन के ‘सुभाष जी, सुभाष जी, वो जाने हिन्द आ गये. है नाज जिसपै हिन्द को वो जाने हिन्द आ गये’, कल्याण सिंह हजारत के ‘हिन्द सिपाही, हिन्द सिपाही’ आदि के लिखे गीतों को संगीत दिया.
अगस्त, 1948 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के कहने पर कैप्टन राम सिंह ठाकुर उत्तर प्रदेश पी.ए.सी. में सब इंस्पेक्टर के रूपमें लखनऊ आये और पी.ए.सी. के बैण्ड मास्टर बन गये. 30 जून, 1974 को कैप्टन राम सिंह ठाकुर सेवानिवृत्त हो गये, उन्हें “आजीवन पी.ए.सी. के संगीतकार” का मानद पद दिया गया. 15 अप्रैल, 2002 को कैप्टन राम सिंह ठाकुर की मृत्यु हो गयी.
– गिरीश लोहनी
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यह मार्च गीत लखीमपुर के अवधी सम्राट पंडित बंशीधर शुक्ल ने लिखा।