फोटो: सुधीर कुमार
उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को बाहरी आक्रमणकारियों के अलावा ठकुराइयों द्वारा एक दूसरे की गढ़ियों को हड़पने के लिए की जाने वाली लडाइयों का भी सामना करना पड़ता था. इन आक्रमणों का सामना करने में पहाड़ की चोटियों से बड़ी-बड़ी चट्टानों और पत्थरों को हमलावरों पर लुड़काना और फेंकने का बहुत महत्त्व होता था. (Budi Devi Worshiped in The Mountainous Regions of Uttarakhand)
वक़्त आने पर इस योजना को अमल में लाने के लिए बड़े-बूढ़ों द्वारा एक योजना बनायी गयी, जिसके तहत सभी दर्रों पर ‘बूड़ीदेवी’ के नाम से मंदिरों की स्थापना की जाती. दर्रा पार करने वाले हर व्यक्ति के लिए बूड़ी देवी को एक पत्थर की भेंट चढ़ाना जरूरी होता था. इस परम्परा से उस जगह पर पत्थरों का ढेर लग जाया करता था जो बाहरी हमले के समय दुश्मनों पर फेंकने के काम आया करते थे. इसके अलावा पत्थरों का यह ढेर मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाता था.
आधुनिक भारत में भी इस परंपरा का उदाहरण 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान देखने में आया, जब अल्मोड़ा की सालम पट्टी के जैती गांव में अंग्रेज सिपाही पहुंचे. जब ब्रिटिश सिपाही आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार करने पहुंचे तो वे एक पहाड़ी चोटी पर चढ़ गए. स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार करने के लिए ब्रिटिश सैनिक जब भी पहाड़ी पर चढ़ने की कोशिश करते तो वे उन पर बड़े-बड़े पत्थर लुढ़का देते. इस लड़ाई में कई ब्रिटिश सैनिक मारे गए लेकिन स्वतंत्रता सेनानी उनके हाथ नहीं लगे.
वक़्त बदलने के साथ ही इस परम्परा की जरूरत ख़त्म हो गयी लेकिन प्रतीकात्मक रूप में आज भी बूड़ी देवी के मंदिर मौजूद हैं और उनकी पूजा कर भेंट चढ़ाई जाती है. पहाड़ में जहाँ आज भी रास्ता बताने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है वहां ये युक्ति रास्ता बताने के संकेत के रूप में काम किया करती है.
सन्दर्भ : उत्तराखण्ड ज्ञानकोष – प्रो. डी. डी. शर्मा
हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online
थोकदार: मध्यकालीन उत्तराखण्ड का महत्वपूर्ण पद
रैदास के वंशज हैं उत्तराखण्ड के दास
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
पिछली कड़ी : कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे का बहुआयामी व्यक्तित्व व कृतित्व : इतिहास से…
उत्तराखंड अपनी निराली संस्कृति के लिए जाना जाता है. यहां के लोक जीवन के कई…
‘‘...हिमालय के दूर-दराज गाँव के अत्यंत विपन्न परिवार में जन्मा एक छात्र नोबेल विजेता भौतिकशास्त्री…
अल्मोड़ा के काफलीखान गांव के रवि टम्टा ने जब अपने बनाए फ्लाइंग व्हीकल "हापिडा स्काईनेक्स"…
उत्तराखंड के पहाड़ों में लोकगीत और लोकनृत्य केवल मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि यहां की सामाजिक-सांस्कृतिक…
पिछली कड़ी : हिमालय की सामाजिक-आर्थिक संरचना पर प्रोफेसर पूरन चंद्र जोशी कुमाऊं को विशिष्ट…
View Comments
पथोड़िया बोला जाता था/ है ,उन जगहों को,,,,