अल्मोड़ा डिग्री कॉलेज में फाइन आर्ट द्वितीय वर्ष के छात्र हैं भास्कर भौर्याल. एक बेहतरीन चित्रकार. 19 साल की उम्र में ही भास्कर के हाथ जिस तरह से कागजों में पहाड़ी लोकजीवन का जीवंत चित्रण कर देते हैं वह कमाल का है. पहाड़ी लोकजीवन का हर पहलू भास्कर के चित्रों में जगह बना चुका है. एक किशोर का उत्तराखण्ड की लोक, कला, संस्कृति से यह गहरा सरोकार एक सुखद भविष्य की उम्मीद जगाता है. प्रस्तुत है ‘काफल ट्री’ के लिए भास्कर के साथ सुधीर कुमार की बातचीत के ख़ास हिस्से.
उत्तराखण्ड के बागेश्वर जिले के कुरोली गाँव (रीमा के पास) में जन्मे भास्कर का बचपन काफी उथल-पुथल भरा रहा है. तीसरी कक्षा तक की पढ़ाई भास्कर ने गाँव के ही सरकारी हाई स्कूल में की. इसके बाद रिटायर्ड फौजी पिता खुशाल सिंह भौर्याल ने स्तरीय शिक्षा की गरज से उन्हें बागेश्वर भेज दिया. यहाँ एक कॉन्वेंट स्कूल में उन्हें तीसरी कक्षा में दाखिल किया गया. वे बागेश्वर में एक रिश्तेदार के घर रहकर पढाई करने लगे. यहाँ एक साल पढ़ने के बाद ही उन्हें चौथी कक्षा में प्रवेश के लिए हल्द्वानी जाना पड़ा.
हल्द्वानी में उन्हें अपने रिश्तेदार के घर में ज्यादातर अकेला रहना पड़ता था. भास्कर बताते हैं यहाँ अकेलेपन से लड़ने के लिए उन्होंने कैलेण्डर पर मौजूद देवी-देवताओं के चित्रों की प्रतिकृति बनाना शुरू किया. वे शादी के कार्डों के पिछले हिस्से में उन चित्रों को हु-ब-हू उकेरने लगे. इससे पहले वे स्कूली पढ़ाई के लिए जरूरी चित्र ही बनाया करते थे.
अस्थिरता थी कि इस बालक का पीछा छोड़ने को ही तैयार नहीं थी. आखिरकार उनके पिता ने उन्हें चौकोड़ी के एक निजी विद्यालय में पांचवीं कक्षा में दाखिल कर दिया. यहाँ हॉस्टल होने से उनकी जिंदगी में थोड़ा स्थायित्व और सुकून आया.
चौकोड़ी में स्कूल की प्रधानाचार्या देव बाला बिष्ट ने उनकी बनायी पेंटिंग्स देखीं. वे भास्कर के चित्रों से प्रभावित हुईं और उन्हें देवी-देवताओं से अलग कुछ अन्य विषयों के इर्द-गिर्द भी चित्र बनाने के लिए दिए. देव बाला ने उन्हें लगातार प्रोत्साहित भी किया और विभिन्न प्रतियोगिताएं में भी भेजना शुरू किया. अब भास्कर ने कई चित्रकला प्रतियोगिताएँ जीतीं और उनका हौसला बढ़ता गया.
छठी कक्षा के लिए उनका चयन नवोदय विद्यालय में हो गया और वे आगे की पढ़ाई के लिए गंगोलीहाट आ गए. यहाँ भी उन्होंने अपनी साधना जारी रही और सहपाठियों, अध्यापकों के चहेते बने रहे. यहाँ भी प्रिंसिपल राजेश्वरी पांगती ने उन्हें अपनी कला को और ज्यादा निखारने के लिए प्रोत्साहित किया. वे उन्हें विभिन्न पेंटिंग्स और संगीत की प्रतियोगिताएं में भेजने लगीं. हर जगह भास्कर पहला या दूसरा स्थान हासिल कर लेते. गौरतलब है कि भास्कर पेंटिंग्स बनाने के साथ ही अच्छा गा भी लेते हैं और गीत रचते भी हैं.
भास्कर भौर्याल
इस दौरान नवोदय विद्यालय कि प्रिंसिपल और अन्य अध्यापकों ने भास्कर के पिता को इस बात के लिए तैयार किया कि वे पेंटिंग को ही उसके कैरियर के रूप में भी देखें. ऐसा हुआ भी. नवोदय विद्यालय में चित्रकला का विषय न होने की वजह से वे 10वीं कक्षा के बाद एक बार फिर स्कूल बदलकर अल्मोड़ा आ गए और महर्षि विद्या मंदिर में दाखिला ले लिया. इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण था कि वे अपनी ग्रेजुएशन और आगे की पढ़ाई अपनी पसंद के विषय से कर सकें. लेकिन यहाँ भास्कर को निराशा हाथ लगी वे बताते हैं कि स्कूल में विषय जरूर था मगर अध्यापक नहीं. पेंटिग विषय के 2 ही छात्र थे. इसके बावजूद अब उन्हें पहली दफा पेंटिग से जुड़ी कुछ तकनीकी जानकारी मिलने लगी. वे बताते हैं कि पहली बार ये पता लगा कि पेंसिल भी कई तरह की होती हैं.
इस दौरान उन्हें महसूस हुआ कि उनके चित्रों के विभिन्न विषयों में से उत्तराखंडी लोकजीवन से जुड़ी पेंटिंग्स ज्यादा पसंद की जाती है. सो बीए प्रथम वर्ष तक आते-आते उन्होंने इसी विषय पर केन्द्रित पेंटिंग्स बनाना शुरू कर दिया.
भास्कर बताते हैं कि उत्तराखण्ड का लोकजीवन, संस्कृति, परिवेश आदि को अपना विषय बनाने की प्रेरणा उन्हें अपनी माँ जानकी देवी से मिली. वे बताते हैं कि चार बड़ी बहनों के बाद अकेला बेटा होने व घर का सबसे छोटा बच्चा होने के कारण वे हमेशा घर भर के और खासकर माँ के लाडले रहे हैं. इस वजह से माँ के साथ काफी वक़्त भी बिताया. वे बताते हैं कि उनकी माँ निरक्षर होने के बावजूद लोकसंस्कृति की गहरी समझ रखती हैं. वे उत्तराखण्ड की चांचरी, छपेली, न्योली जैसी संगीत विधाओं के साथ संस्कृति के कई अन्य पहलुओं की ज्ञाता हैं. माँ के साथ रहने से ही उन्हें लोकसंस्कृति के संस्कार मिले. माँ से मिले गहरे सांस्कृतिक सरोकार ही उनकी पेंटिंग्स के विषय बनते चले गए. अब वे मुख्यतः इन्हीं विषयों के इर्द-गिर्द पेंटिंग्स बनाते हैं.
एक किशोर की कूची से चित्रित उत्तराखण्ड के विभिन्न रंग आपको हैरानी से भर देते हैं. भास्कर अपनी पढ़ाई के साथ ही चित्रकारी में भी रमे हुए हैं. वे अपनी कला के माध्यम से उत्तराखण्ड की संस्कृति के सेवा करने का इरादा रखते हैं.
भास्कर के चित्रों में उत्तराखण्ड के तीर्थ, घस्यारी, पनिहारिन, डौर-थाली वादक, छोलिया, आमा-बुबू, ईजा, भिटौली के मौके पर भाई-बहन, ब्योली, गीतकार, गायक, नर्तक, पर्व-त्यौहार आदि सभी कुछ है. जैसे कूची से समूचा उत्तराखण्ड रच दिया गया हो. भास्कर के चित्रों में उत्तराखण्ड है और उत्तराखण्ड की उम्मीद भास्कर जैसे युवा हैं. इन चित्रों में पहाड़ और लोकसंस्कृति के भविष्य की आस बिखरी दिखाई देती है.
‘काफल ट्री’ भास्कर के उज्जवल भविष्य की कामना करता है.
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