पहाड़ और मेरा जीवन –28
पहाड़ों में गुजरे बचपन के दिनों को याद करते हुए इधर दो बातें हुईं. पहली यह कि मैंने छत्तीस साल के बाद पहली बार अपनी सातवीं क्लास की एक सहपाठी कविता पांडे से बात की. उसका नंबर मुझे अपनी एक अन्य सहपाठी मीना से मिला. कविता को जब मैंने फोन किया, तो किसी ने नहीं उठाया. इतने सालों बाद अपनी क्लास की साथी से बात करने की इतनी उत्सुकता और उत्तेजना थी कि मैंने कुछ-कुछ देर में दो-तीन बार फोन कर दिए. लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया. अंतत: जब फोन उठाया गया, तो दूसरी ओर से महिला का ही स्वर सुनाई दिया. लेकिन मेरे कुछ कहने से पहले उस स्वर ने कहा कि मैडम अभी है नहीं, कौन बोल रहा है, क्या काम है? मेंने कहा काम तो आपकी मैडम से ही है. वही बात करें, तो बताऊंगा कि कौन बोल रहा हूं. वैसे मैं मैडम से आज छत्तीस साल बाद बात कर रहा हूं. मेरी बात सुन दूसरी ओर कानाफूसी हुई और ‘हलो, हू इज देयर’ की बेहद सभ्रांत और मैडम वाली आवाज आई. आवाज सुनकर ही मैं जान गया था कि वह कविता है. मैंने कहा, हाय कविता, मैं तुम्हारा सेवंथ क्लास का क्लासमेट बोल रहा हूं. अब तुम बताओ कि मेरा नाम क्या है. बता दो तो मान जाएं. मैंने उसे चुनौती दी. उसने दो-तीन नाम लिए पर उनमें मेरा नाम नहीं था. फिर उसने कुछ क्लू मांगते हुए पूछा कि सीधेसादे थे कि शैतान? मैंने कहा थोड़ा-सा शैतान. यह देखकर कि उसे मुझे पहचानने में दिक्कत हो रही है अंतत: मैंने उसे बताया कि एक दिन मैथ के सर ने मुझे क्लास में पटाखा फोड़ने के लिए बहुत बुरी तरह पीटा था. सुनते ही वह जोर से बोली – सुंदर! ओह तुम सुंदर हो!
कविता बरेली में डॉक्टर है. उसकी आवाज और व्यस्तता देख कह सकते हैं कि वह बड़ी डॉक्टर है. उसके साथ की मुझे कोई विशेष घटना याद नहीं. सिर्फ इतना याद है कि वे तीन बहनें थीं. उनके पिताजी केसी पांडे सेंट्रल स्कूल के प्रिंसिपल थे. उन्होंने ही मुझे एक साल बाद राजस्थान से लौटने पर नवीं कक्षा में दाखिला नहीं दिया. पर वह कहानी बाद में. अभी वह घटना जिसे याद कर कविता मुझे पहचान पाई. वे दीवाली के आसपास के सर्दियों के दिन थे और मैं उस दिन भी अपना ‘कोटरे’ का काला कोट पहनकर स्कूल गया था. वह गणित की क्लास थी और पढ़ाने वाले कोई और नहीं हमारी सहपाठी मीना बिष्ट के पिताजी थे, जिन्हें हम बिष्ट सर के नाम से ही जानते थे. मीना अब हलद्वानी में सेटल हो गई है. उसके पिताजी यानी हमारे सातवीं कक्षा के बिष्ट सर अभी भी स्वस्थ हैं और उसी के साथ रहते हैं. उनके परिवार में तीन बहनें और एक भाई था. कुछ दिन पहले ही मीना से बहनों के बारे में जानकारी ली. सबसे छोटी वाली पिथौरागढ़ में ही है. बड़ी दीदी पूनम शायद इलाहाबाद में है जबकि स्वयं मीना अपने पिता की तरह ही उत्तराखंड में बारहवीं के बच्चों को गणित पढ़ाती है. इससे पहले कि मैं उसके पिता की मुख्य भूमिका वाली उस अविस्मरणीय घटना का यहां खुलासा करूं, मैं एक ऐसी बात बताना चाहता हूं, जो मीना को भी नहीं पता होगी. वह यह सब पढ़कर चौंकेगी जरूर.
बिष्ट सर का परिवार पहले एमईएस कॉलोनी में ही रहता था. उनके घर के बगल में ही एक मंदिर था, जहां कई बार हम बच्चे शाम की आरती के वक्त प्रसाद लेने पहुंच जाते थे. जन्माष्टमी के दिन उस मंदिर में बड़ी धूम रहती थी. मध्यरात्रि तक वहां चहल-पहल बनी रहती. हमें भी मंदिर के बहाने घर से बाहर रहने की छूट मिल जाती. थोड़ी देर तो हम मंदिर में जोर-जोर से भजन गा लेते, लेकिन जल्दी ही उकता जाते. अब क्या करें. इसी उकताहट से शरारतों का जन्म होता था. उस जन्माष्टमी के रोज भी कुछ देर जोर-जोर से ताली बजाते हुए ऊंची आवाज में कृष्ण के भजन गा लेने के बाद लड़के मंदिर के अहाते से बाहर निकले और क्या करें क्या करें करते हुए अचानक किसी का रात को गन्ने खाने का मन हुआ. सबसे नजदीक बिष्ट सर का ही घर दिखा, जिसके एक ओर बाड़ लगाकर कुछ सब्जियों के साथ गन्ने भी लगे हुए थे. जैसा कि उन दिनों हुआ करता था, शरारत करते हुए सबसे आगे अनिवार्य रूप से मैं ही होता था. तो सबसे पहले मैं ही बाड़ की दो तारों के बीच से निकला और एक हृष्ट-पुष्ट गन्ना तोड़कर बाहर आ गया. मेरी देखादेखी पूरी बानर सेना भीतर जाकर अपने-अपने लिए गन्ने तोड़ लाई. उधर मंदिर में कृष्ण का जन्म हो रहा था और इधर मैं अपने साथियों के साथ स्कूल के प्रिंसिपल के गन्ने चुराकर पार्टी कर रहा था.
उस दिन बिष्ट सर की क्लास में क्या हुआ मुझे अच्छी तरह याद है. दीवाली के दिनों में हम पटाखे चलाने वाली बंदूक चलाते थे. उससे हम फिल्मों के पुलिस वाले की तरह धांय-धांय करते, चोर-सिपाही खेलते, झूठा निशाना लगाते. तब हमारी क्लास में डेस्क पर दो-दो बच्चे बैठा करते थे. मेरी बगल वाला लड़का उस दिन पिस्तौल में चलाए जाने वाले पटाखे की लड़ी लाया था. इस लड़ी में जगह-जगह मसाला भरा होता था और लड़ी पिस्तौल में घूमती रहती थी. उसने लड़ी से मसाले वाले हिस्से काट-काटकर इकट्ठे कर लिए थे. अब वह उन्हें डेस्क के पाए के नीचे रखकर डेस्क को जरा-सा हिलाता, तो वह फूट पड़ता. अब किसी पटाखे पर ठीक से दबाव नहीं बनने पर वह फूटने से रह भी सकता है. बस यही तथ्य मेरे खयाल से रह गया और जब बिष्ट सर गणित पढ़ाने आए तो डेस्क जरा-सा हिल गया. वह हिला नहीं कि पटाखा भी फूट गया. पटाखा फूटते ही पूरी कक्षा स्वत:स्फूर्त हंस पड़ी. बिष्ट सर के अहं को ठेस पहुंची. मेरे ठीक सामने बैठने वाले इन कल के छोकरों की ऐसी हिमाकत! क्लास में पटाखा फोड़ते हैं!
मेरा पूरा यकीन है कि बिष्ट सर पटाखों से बहुत नफरत करते रहे होंगे और अपने घर में भी बच्चों को ज्यादा पटाखे नहीं चलाने देते होंगे. ऐसा इसलिए क्योंकि उस एक अदद पटाखा फूटने के बाद उन पर ऐसा गुस्सा और बौखलाहट सवार हुई कि उन्होंने बिना किसी तहकीकात के मुझे बालों से पकड़कर खींचा और दन दन दन दन दन दन करते न जाने कितने घूंसे जड़ दिए. और घूंसे भी कहां. सिर पर. मैंने बचपन में कॉमिक्स में चित्रों में देखा था कि चाचा चौधरी का डंडा जब गुंडों को पीटता था, तो उन्हें दिन में तारे नजर आ जाते थे. मुझे पहली बार दिन में तारे देखने को मिले. तूफान जब थमा तो मेरा हाथ अपने आप ही मेरी टांट की ओर चला गया. मुझे यह तो अहसास हो गया था कि टांट में कई गुमड़ियां निकल आई हैं, लेकिन जब मैंने हाथ फेरा तो वहां सतह पर जिस तरह के पहाड़ निकले हुए थे, मुझे समझने में देर नहीं लगी कि वे जो सिर की सतह पर निकले हुए थे, वे गुमड़ियां नहीं ‘गुमड़े’ थे क्योंकि उनका आकार बड़ा था. आजकल के बच्चे टीचर की जरा-सी डांट पर ही रो जाते हैं. पर मजाल है मेरे मुंह से उफ भी निकल गई हो. बिष्ट सर के ईगो को चोट लगी तो उन्होंने बेकसूर को पीट दिया, मेरे भी ईगो पर चोट लगी इसलिए मैंने भी जबड़े सख्ती से भींचे और चेहरे पर जरा भी शिकन न आने दी. यही मेरी जीत थी.
क्लास के बच्चों के बीच मेरी छवि बहुत मजबूत दिलवाले बच्चे की थी. मैं उस छवि को कैसे टूटने देता. लेकिन मां के सामने मेरी छवि उसके बच्चे की ही थी. इसलिए जब घर पहुंचा तो मां को देखते ही रुलाई फूट पड़ी. मां के लिए मेरा यूं रोना विचित्र था. उसने पूछा तो मैंने पूरी कहानी बता दी. मां ने सिर पर हाथ फेरा तो उसे भी वे ‘गुमड़े’ महसूस हुए. अगले कुछ मिनटों तक वह बिष्ट सर को भला-बुरा बोलती रही. आज का जैसा समय होता, तो बिष्ट सर के लिए जरूर मुसीबत खड़ी हो सकती थी. माता-पिता ने अगले ही दिन स्कूल में जाकर धरने पर बैठ जाना था. पर मेरे पिता को बच्चों से ज्यादा सरोकार था नहीं और मां के पास हजार काम. अगले दिन तक तो खुद मैं ही भूल गया. हालांकि वे गुमड़े अगले दिन भी पूरे शहंशाही अंदाज में टांट पर खिले हुए थे. बिष्ट सर ने मारे बहुत तगड़े घूंसे थे. अब कभी उनसे मिलूंगा, तो पूछूंगा जरूर, सर बताइए कि जवानी में खाते क्या थे.
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अगली कड़ी – मैं क्यों चलता था 15 किलो बोझ लादे बिजली के खंभे पर संतुलन बनाता
कवि, पत्रकार, सम्पादक और उपन्यासकार सुन्दर चन्द ठाकुर सम्प्रति नवभारत टाइम्स के मुम्बई संस्करण के सम्पादक हैं. उनका एक उपन्यास और दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. मीडिया में जुड़ने से पहले सुन्दर भारतीय सेना में अफसर थे.
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