समाज

उत्तराखंड में भादो अष्टमी और सातों-आठों का लोकपर्व

इन दिनों कुमाऊं की धरती पग-पग पर माता भवानी की डलिया लेकर इन्हीं गीतों और संगीत के रंग में डूब रही है. चाँदनी रात में गाए जाने वाले ‘झोड़ा’ गीतों की तर्ज पर ही रात-रातभर चलने वाली ‘सातों-आठों’ पर्व की धमक इन दिनों हवाओं में ताजा है. यहाँ देवता धरती पर उतरते हैं ; नाचते, गाते, झूमते हैं और मनुष्य के सुख दुख के साझी बनते हैं. उन्हें मदमस्त होते देखा जा सकता है. मनुष्य और देवत्व की बीच की दूरी नहीं रह जाती.
(Bhado Ashtami Uttarakhand)

यहाँ बात हो रही है उत्तराखंड की पावन परंपराओं में बसे, कुमाऊं मंडल के पिथौरागढ़ जिले की. अभी महीने भर पहले सावन की घटाओं ने भिगोया और अब भादों के महीने के साथ ही बादलों की कतारें दबे पॉंव, एक-एककर पर्वतों के पार गुजरने लगी हैं. इसी बीच वर्षा की हल्की-फुल्की छटाओं के बीच आता है पावन पर्व – रक्षाबंधन और इसी के साथ पहाड़ों का जनमानस हिलोरें लेने लगता है. उमगाया हुआ सावन मास अपनी हरियाली का आलोक छितरा चुका. घाटियों में चारों ओर हरी घास और हरे धान लहलहा रहे हैं. आसमान अब पूरा रीत चुका है. कृषिहारों के माथे पर उल्लास के चिन्ह हैं.

रक्षाबंधन के साथ ही त्योहारों की एक नई श्रृंखला शुरू हो जाएगी. पहले ‘सातों-आठों’ का पर्व, फिर दशहरा और दिवाली जैसे पर्वों के बीच में कई अन्य लोक-त्योहारों की गूँज सुनाई देने लग जाती है. हवाओं में कुछ-कुछ भारीपन आने लगता है. पर्वतों के बाट अब खुलने लगते हैं. बर्फ की चादर ओढ़ने के पहले यह पहाड़, अब अगले कुछ दिनों तक तो संसार की सबसे सुंदर निधि बन जाते हैं. इनके अलमस्त मंजर स्वतः ही गीत बनकर लोगों के होठों पर गूँजने लगते हैं.

न जाने कितने बेनाम कलाकारों ने उल्लास के इन नज़ारों को स्वर दिया, शब्द दे दिया और साथ ही दिये – कई लोकगीत. गीत भी ऐसे, कि हृदय की मार्मिकता का हृदय से सीधा संवाद भी बन जाए और साहित्य की गूढ़ चादर भी न तने. यह उल्लास केवल उल्लास है. और यह भक्ति भी, केवल भक्ति. नैष्काम्य भक्ति. गीत संगीत तो जैसे यहाँ जन्म से मिला वरदान ही है. सिखाने की जरूरत ही नहीं. कदम उठेंगे, ताल मिलेगी और स्वर-लहरियाँ फूट पड़ेंगी.
(Bhado Ashtami Uttarakhand)

सावन-भादों की दुर्गा अष्टमी का पर्व पूरे उत्तराखंडी जन समुदाय के लिए महापर्व है. गढ़वाल में रक्षाबंधन के दिन से ही नंदा भगवती की विदाई का पर्व शुरू होता है. उसी का दूसरा रूप कुमाऊं में ‘सातों-आठों’ के रूप में मनाया जाता है.

रक्षाबंधन के दिन से ही ‘सातों-आठों’ पर्व की धूम शुरू हो जाती है. रात के समय ‘खेल’ (सामूहिक नृत्य) लगने लगते हैं . जिनमें हुड़के (डमरू) की ताल पर नाचते गाते हुए लोग घेरा बनाते हैं, बिल्कुल लाखूउड्डयार क्षेत्र (अल्मोड़ा का पाषाण कालीन स्थल) में पाषाण युग के भित्ति चित्रों की तरह. आज से नहीं, यह तो हजारों सालों से लोगों के उल्लास की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है. मजेदार बात तो यह है कि नृत्य का यह तरीका जहाँ एक ओर सामाजिक सरोकारों का प्रतिबिंब है वहीं इससे भातृभाव और सामूहिकता का भाव पैदा होता है. एक दूसरे के कंधे पर हाथ रखे झूमने में प्रथम दृष्टया कुछ भी आकर्षक या अनोखा नहीं दीखता. लेकिन फिर ये पाया कि किसी समारोह मे अलग अलग नाचने वाले बारातियों के बेतरतीब झुंड में आत्मकेंद्रित होने की जैसी प्रवृत्ति होती है, उसके ठीक विपरीत, इन सामूहिक नृत्यों में केवल सामूहिक उल्लास होता है. लेकिन यहाँ पर कोई भी व्यक्ति केवल दर्शक रह ही नहीं सकता, सभी प्रतिभागी होते हैं.

गौरा को यहाँ गमरा के नाम से जाना जाता है. पौराणिक मान्यता के अनुरूप देवी भगवती या पार्वती को इस दिन घर बुलाया जाता है और साथ ही डलिया पर बैठकर महेश्वर भी लाये जाते हैं. कुछ दिन समारोहपूर्वक खुशियाँ मनाकर, पर्व के समापन पर भावपूर्ण विदाई दी जाती है.
(Bhado Ashtami Uttarakhand)

ऐसे में प्रश्न उठता है कि कौन है यह गमरा? और कौन हैं यह माहेश्वर? आखिर क्या नाता है इन दोनों का इस जनमानस के साथ?

सिंधु सभ्यता की मातृ देवी ही कहीं भगवती तो नहीं? और देव यात्रा के प्रतीक चिन्ह जो प्राचीन अवशेषों में मिलते हैं कहीं इसी लोकमान्यता की प्राचीनतम अभिव्यक्तियाँ तो नहीं? बधाणगढ़ (गढ़वाल की प्राचीन राजधानी) की पूजिता देवी ‘इड़ा-बधाणी’ ही कहीं ऋग्वेद की इड़ा (सरस्वती) तो नहीं? तब तो सारस्वत प्रदेश भी यहीं होना चाहिए. फिर तो पूरा वैदिक साहित्य ही यहाँ रचा गया होगा.

इस मातृदेवी, जिसे गौरा, गमरा, नंदा, भगवती, इड़ा, सरस्वती, पार्वती आदि नामों से पुकारा गया है, का मूल उद्गम कहीं भी हो, लेकिन पर्वत-प्रदेशों में जनमानस ने जिस लौकिक भाव से अपनी आस्था को जोड़ा है, उससे तो यही प्रतीत होता है कि वह इसी प्रदेश की पुत्री रही होगी. इतना अवश्य है कि उत्तराखंड के जनमानस ने इसी पर्वत-पुत्री पार्वती को अपनी पुत्री भी माना और माता भी. पुत्री के रूप में उसे घर बुलाते हैं और माँ के रूप में उसके स्वरूप की पूजा करते हैं. महेश्वर तो फिर जामाता ही ठहरे.
(Bhado Ashtami Uttarakhand)

गमरा और माहेश्वर को डोली में रखकर गाँव के बीच कहीं स्थापित किया जाता है. इसके साथ ही ‘सातों-आठों का पर्व शुरू होता है. गौरा माहेश्वर के विवाह के उपलक्ष में अगले कई दिनों तक लोक मानस त्योहार की तरह मनाता है. इस अवसर पर रामायण का भी सस्वर पाठ किया जाता है. बीच-बीच में झाँकियाँ भी निकाली जाती हैं जो कि कृषि धर्मी समाज का आईना होती है. लोक नृत्य भी होते रहते हैं. विषय कुछ भी हो, बात केवल जनमानस को जोड़े रखने की है. राम जन्म से लेकर रावण वध तक और फिर राजतिलक तक की संपूर्ण लीला संक्षेप में पढ़ी और गाई जाती है.

–मिहिर

मिहिर का मूलनाम इन्द्रेश हैं. वह उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर अंग्रेजी विभाग, गोचर महाविद्यालय सहारनपुर में कार्यरत हैं.

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