फोटो: अशोक पाण्डे
रात की पार्टी समाप्त होने के बाद अगले दिन मुहल्ले के हर कायाधारी के चेहरे पर अजीब सी खुशी के साथ एकदम साफ न दिखने वाली झेंप भी थी. रात के नाच गाने में थोडे़ बहुत आपसी विवाद, हाॅलिडे होम की खूबसूरत मैनेजर को लेकर नज़रिये का टकराव, आपसी मान मनुहार सब धुल गये. जो काम सौ प्रेम पत्र नहीं कर सकते थे वह ग्यारह नंबरी शिकार और रम ने कर दिखाया. सुनील तो बारह बजे सोकर उठा.
इस पूरे उत्सव ने मेरे बारे में मुहल्ले भर में अलग अलग तरह की राय बना दी थी. कहना गलत न होगा कि अगली सुबह तक मैं “मुद्दा” बन चुका था. अब जब मुद्दा था तो मुद्दे को देखने के भी नज़रिये थे. नज़रिये थे तो उनमें आपस में नज़र को लेकर टकराव और समर्थन भी था. कुछ मेरी कथित सहृदयता के क़ायल हुये तो कुछ चुटकुलों के, कुछ को इस सबमें एक ख़ास ”बू“ नज़र आयी. कुछ ने इसे मेरे महक़मे से जोड़ कर भी देखा. रिश्वत और पांव पसारते भ्रष्टाचार पर भरी चर्चा हुयी. कुछ को आगे बढ़ने का मौका मिला तो कुछ को दुबकने की जरूरत महसूस हुयी. कुछ के मन में मुझे लेकर कुछ प्रश्न थे तो कुछ के मन में उन प्रश्नों के उत्तर भी थे. कुल मिलाकर उच्च स्तरीय फोरम पर विचार का मुद्दा बना दिया गया था मुझे. हालांकि खुद को लेकर चलने वाले विचार विमर्श की भनक तो पहले ही दिन से लग गयी थी पर केंद्रीय विषय बनने का अब मुझे मजा आने लगा था.
अब जहां एक ओर मेरी सामान्य जरूरतों को लेकर लोग जागरूक हो गये थे तो दूसरी तरफ “बड़ुवे (मकड़ी) से डरता है बल” जैसे गोपनीय तथ्य सामाजिक मनोरंजन का साधन बन रहे थे. किसी को आशंका थी कि अब तो हर रोज पीने का दौर चलेगा. किसी को लगा कि अच्छी अंग्रेजी शराब पीने को मिलेगी. किसी को लगा कि कम से कम एक ढंग का आदमी तो आया नहीं तो सब वही हाॅलिडे होम के कच्चे पक्के कर्मचारी, उनकी वही बातें.
मुहल्ले की महिलाओं को अच्छा लगा कि साहब हर औरत को देखकर अपनी तरफ से नमस्ते करता है, कभी भी नज़र ऊपर करके इधर उधर नहीं देखता, नहीं तो ज्यादातर को ”माव चरेउ” (माला मंगलसूत्र) की डिजाइन के आगे चेहरा देखने की फुर्सत कहां होती है.
हां! सबसे शुद्ध, साफ और निःस्वार्थ नज़़रिया मुझे लेकर निम्मी, कोहली और निम्मी के भाई का था. उन तीनों बच्चों को एक चौथा बच्चा मिल गया था जो क्रिकेट की बाॅल खोने पर नई बाॅल ला सकता था, जिसे हिन्दी की बाल कवितायें याद थीं, जो सबका होमवर्क करा देता था, जो सबके साथ खेल सकता था और सबसे मजबूत कि जिसका बनाया बहाना घर में चल जाता था.
इस प्रकार के नज़़रिये और उनका टकराव, मैं जब तक रहा, चलता रहा. पुरूषों की टोली का कथित हीरो कभी महिलाओं को ज्यादा पसंद न आया. फिर भी ज्यादातर औरतें अब खुश थीं क्योंकि उनके आदमी दारू, चखने के चक्कर में दूर नहीं जाते हैं और निगहबानी में रहकर दारू पीते हैं.
अक्सर पहला पैग समाप्त होने से पहले ही किसी न किसी के घर से कोई न कोई दरवाजे पर आकर बांग लगाता कि “रोटी बन गई बल”, “मिक्सी नहीं चल रही बल”, “आमां की दवाई कहां है बल” से लेकर “जय हनुमान आ गया बल”.
“सब औरतों के नुस्खे हैं साहब. अभी घर से अल्टीमेटम खाकर आयेंगे बच्चू” सर्वेश्वर ने अपनी टांगे कमर के किसी गुप्त हिस्से से रेडियो के एरियल की तरह निकाल कर फैला दीं. सर्वेश्वर इस मामले में मुहल्ले के सारे मर्दों से खुशनसीब था क्योंकि बकौल रमेश माजिला वह बिना रस्सी के सांड था बाकी सब रस्सी वाले सांड. जिस पर नज़़र सब रखते थे पर कोई पालता न था. फिर कोहली के अलावा उसकी जिम्मेदारी भी कोई न था. जब तक संध्यावंदन कार्यक्रम इधर चलता उधर कोहली को सर्वेश्वर की हारमोनियम बजाने का मौका मिलता, जिसकी पहाड़ी धुनें शाम की मयनोशी में इंस्ट्रूमेंटल संगीत के काम आती.
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तभी दरवाजे पर दस्तक हुयी. सभी सहम से गये क्योंकि यह “महापुरुष” के आने का वक्त था पर दस्तक की कोमलता एक तरफ किसी और की तरफ इशारा कर रही थी. दरवाजे पर गौर वर्ण के कोई डेढ़-डेढ़ फिट की जुल्फों वाले महाशय खड़़़े थे जिनकी आंखे स्पष्ट मुखबिरी कर रहीं थीं कि उन्हें संध्यावंदन कार्यक्रम की भनक लग गयी थी पर मनोभावों को छुपाते हुये वे बोले “आपको एक दिन गज़ल गुनगुनाते सुना तो लगा कि मेरी साहित्यिक बिरादरी में सूनापन खत्म होने वाला है”.
अंदर आते ही उन्होंने मसनद पर कब्जा जमाया. गिलास अपने आप उनके सामने आ गया. बिना किसी भूमिका के तीन उंगली तक भरने के बाद रमेश माजिला ने उनकी तरफ प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा और जैसे आंखों ही आंखों में आगे दोबारा मिलने का भरोसा भी दिलाया.
अब संगत में रमेश माजिला के पहाड़़ी जोड़़ों के स्थान पर हिमशिखर, हिमाद्रि, हिमालय, हिमवंत, पहाड़, पर्वत, नगाधिराज, पन्नग, पर्यावरण, अस्मिता, जीवन, मृत्यु, मोक्ष जैसे भारी भरकम शब्दों के बोझ से दबी अतुकांत कविता दौड़ रही थी. अर्थ खोदने का अथक प्रयास जारी था पर हाथ कुछ आ नहीं रहा था.
कविवर के अतिरिक्त सबके चेहरे बता रहे थे के कविता मगज से कई कई मीटर ऊपर निकल रही थी जिसे सब मुंह ऊपर उठाये देख रहे थे. गाल अब मुस्कुराहट का बोझ नहीं उठा पा रहे थे पर हिमालय और उसकी हिमानियों को विस्तार समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा था. कविता उत्तराखण्ड के गिरि प्रांतर को लांघ कर कभी तराई तो कभी मैदानों से लेकर सहारा, गोबी, कालाहारी के मरूस्थलों को भी छू आती फिर अचानक से पिंडारी, नामिक, सुन्दरढूंगा आदि ग्लेशियरों में खो जाती.
कविवर, कविता की स्पीड के साथ साथ पैग की स्पीड मिलाकर चल रहे थे. रमेश माजिला अधीर हो रहा था तभी दरवाजे पर दस्तक हुयी.कविवर ने पहला पाॅज किया.
बाहर कविवर की पत्नी एक कोमल, सुशिक्षित और शालीन मुस्कान के साथ भोजन बनने और आयोजक को भी आमंत्रित करने की सूचना देकर चलीं गयीं.
दूसरी बोतल न खोले जाने के मेरे संकल्प ने कविवर और अन्य पुरूषों के चेहरे पर खिन्नता की एक हल्की रेखा उभार दी थी जिसे आयोजक अर्थात मेरे द्वारा सिरे से इग्नोर कर दिया गया. उपस्थित पैग को आखिरी मानने की मजबूरी साफ दिख रही थी. आज कविवर की पत्नी बिना कुछ किये धरे मन ही मन सामूहिक भर्त्सना का पात्र बन चुकीं थीं.
उधर भोजन का प्रस्तुतिकरण चैंकाने वाला था. भोजन उम्मीद से कहीं परे मराठी भोजन था जिसे क्लासिकी तरीके से परोसा गया था. मराठी कढ़ी, पूरनपोली के साथ साथ झुणका भाखर भी थाली में था. ऊपर से मराठी ढंग से साड़ी पहन कर जमीन पर बैठा कर कराये गये भोजन ने आत्मा तक को तर कर दिया.
कविवर का तो पता नहीं पर अंदर ही अंदर एक भाव उठ रहा था कि अगर पहले पता चलता तो संध्या वंदन कार्यक्रम न किया जाता, तभी मुहल्ले की अन्य महिलाओं और उनके पतियों के प्रति सामाजिक दायित्व का अधिक व्यापक सामाजिक भाव उठा जो न सिर्फ अपने बल्कि दूसरों के प्रति दायित्वबोध की तरफ इशारा कर रहा था.
भद्र महिला महाराष्ट्र की थीं. कविवर नैनीताल के. दोनो बहुत शालीन, सभ्य, सुसंस्कृत और पर्यटन के मर्मज्ञ थे. दोनों बंगलौर और चेन्नई जैसे शहरों से कुमाऊँ के लिये पर्यटक भेजने का कार्य व्यापक स्तर पर कर चुके थे.
गले तक जीम कर घर वापस आया. चारपाई पर पड़े-पड़े हिमशिखर, हिमाद्रि, हिमालय, हिमवंत, पहाड़, पर्वत, नगाधिराज, पन्नग, पर्यावरण, अस्मिता, जीवन, मृत्यु, मोक्ष जैसे शब्द आतंकित कर रहे थे पर पूरनपोली की मिठास और घी की सुगंध एक उम्मीद जगा रही थी. कवि की अगली कविता से मुकाबला लेने का साहस भर रही थी.
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विवेक सौनकिया युवा लेखक हैं, सरकारी नौकरी करते हैं और फिलहाल कुमाऊँ के बागेश्वर नगर में तैनात हैं. विवेक इसके पहले अल्मोड़ा में थे. अल्मोड़ा शहर और उसकी अल्मोड़िया चाल का ऐसा महात्म्य बताया गया है कि वहां जाने वाले हर दिल-दिमाग वाले इंसान पर उसकी रगड़ के निशान पड़ना लाजिमी है. विवेक पर पड़े ये निशान रगड़ से कुछ ज़्यादा गिने जाने चाहिए क्योंकि अल्मोड़ा में कुछ ही माह रहकर वे तकरीबन अल्मोड़िया हो गए हैं. वे अपने अल्मोड़ा-मेमोयर्स लिख रहे हैं
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