डरे हुये बच्चों की दवा होता था आमा के हाथ का बिंदा

आमा के हाथ का जादू सिर्फ खाने के जायके तक सीमित नहीं था. उसके हाथों ने गॉंव के उन तमाम लोगों के रोग और व्याधियों को भी दूर किया था जो डॉक्टरों के इंजेक्शनों और दवाईयों के बिलों के बोझ तले दबे जाते थे. आमा से बिंदा बँधवाने (झाड़-फूँक करवाने) हर दिन कोई न कोई घर पर आ ही जाता था. वैसे भी पहाड़ियों में यह ज्यादा प्रचलित था और आज भी है कि जो रोग डॉक्टर या दवा से ठीक नहीं हो रहा हो उसके पीछे जरूर कोई ग्रह चाल या फिर देवता का बिगड़ना है. बात अगर ज्यादा ही गंभीर हो तो उचैन/उचैण (चावल के दाने) धर कर डंगरिये (जो देवता निकालता है) से देवता निकलवा कर बात जानने और उसका हल निकालने की कोशिश की जाती है और छोटी-मोटी बात के लिए तो आमा का बिंदा बॉंधना ही काफी था. समय-समय पर अपने छोटे-छोटे बीमार बच्चों को गोद में लिए गॉंव की महिलाएँ आमा को ढूँढती हुई घर पहुँच ही जाती थी. इनमें भी सबसे बड़ी संख्या उन बच्चों की होती थी जो किसी कारणवश डर गए हों और खाना पीना छोड़ गुमसुम हो गए हों.
(Memoir by Kamlesh Joshi)

डर के मारे सहम जाना और गुमसुम हो जाना छोटे बच्चों के साथ अक्सर होता है. आमा बिंदा बॉंधने से पहले पूछती “कि हैगो नाति? कि देखि डर गैहै?” (क्या हो गया नाती? क्या देख कर डर गया?). बच्चे कई बार कारण बताते और कई बार नहीं भी बता पाते. जो बच्चे कारण नहीं बता पाते थे उनकी मॉं आमा को बताती थी कि किस वजह से बच्चा डरा हुआ है. आमा चूल्हे से चुटकी भर राख अपनी हथेली पर लेती और बच्चे के माथे पर राख का टीका सा लगाते हुए कुछ देर हाथ को माथे पर ही लगाकर कुछ मंत्र सा पढ़ती. थोड़ी ही देर में तीन बार जोर से हाड़च (विशेष प्रकार की ध्वनि) करती हुई “भल है जालो-भल है जालो” (भला हो जाएगा) कहती हुई बच्चे को प्यार से मसारती (सहलाती). बच्चा अगर बुरी तरह डरा हो तो कई बार आमा बिंदा बॉंधने के बाद उसे अपनी साड़ी के पल्लू से भी झाड़ती थी. आमा के जोर से हाड़च करने के बाद एक बार को तो बच्चा फिर से डर जाता था. कई बच्चे तो रो भी देते थे. शायद यही वह डर होता था जो बच्चे को यह एहसास दिलाता था कि जिस वजह से वह डरा हुआ है वह महज एक जोर की आवाज थी या फिर उसका वहम.

डरे हुए बच्चों के अलावा लाइलाज हो चुके तमाम बीमारों को लेकर लोग आमा के पास इस उम्मीद से चले आते थे कि शायद आमा का बिंदा बॉंधना चमत्कार कर दे. यद्यपि आमा का बिंदा बॉंधना एक साधारण सी क्रिया थी लेकिन यह सिर्फ आस्था और विश्वास का कारण था कि कई लोग जो कब से बीमार पड़े रहते और जिन पर दवाइयॉं भी असर नहीं कर रही होती अचानक ही ठीक होने लगते. कहते हैं कि जीने की इच्छा पैदा करने के लिए भी एक निमित्त चाहिये होता है और आमा का बिंदा बॉंधना कई बार उस निमित्त का काम कर जाता था. ऐसे सैकड़ों लोगों का घर आना-जाना एक तरह की आम बात हो गई थी. कई बार लोग एक बार में ठीक न होने पर दो तीन बार भी बिंदा बँधवाने आ जाया करते थे.
(Memoir by Kamlesh Joshi)

बहुत बार आमा बाहर से आए बच्चों को बिंदा बॉंधने के बाद घर के सभी बच्चों को भी बिंदा बँधवाने बुला लेती थी ताकि कोई किसी वजह से डरा हुआ महसूस कर रहा हो तो ठीक हो जाए. घर में किसी बच्चे के पेट दर्द होने पर भी आमा दवा खिलाने से ज्यादा पेट मंतरने पर विश्वास करती थी. वह नाभि में हाथ रखकर पेट को कुछ देर सहलाती थी और इस क्रिया से कई बार पेट दर्द ठीक भी हो जाता था. दॉंत दर्द होने पर वह सरसों के तेल में नमक मिलाकर उसे रूई में डुबोकर दर्द हो रहे दॉंत में रखने को कहती थी जिससे दॉंत का दर्द काफी हद तक कम हो जाता था.  इसी तरह के न जाने कितने ही घरेलू नुस्खे आमा के पास होते थे जो कई बीमारियों से राहत दिलवाने के काम आते थे.
(Memoir by Kamlesh Joshi)

बिंदा बॉंधना या बँधवाना एक बार को अंधविश्वास लग सकता है लेकिन आमा ने कभी यह दावा नहीं किया कि उसके बिंदा बॉंधने से लोग ठीक होते हैं. यह लोगों का विश्वास था जो उन्हें आमा तक खींच लाता था. वैसे भी जिसका बच्चा या बड़ा तमाम इलाज और दवाइयों के बाद भी ठीक न हो रहा हो तो वह उन सभी पैंतरों को आजमा लेना चाहता है जिससे वह ठीक हो सके. आमा के पास बिंदा बँधवाने आने वाले लोगों की ऑंखों में एक उम्मीद के साथ-साथ चमक भी होती थी कि शायद इस विकल्प से कुछ रास्ता निकल आए. कई बार लोग इसमें विश्वास करने के मनोवैज्ञानिक कारणों की वजह से ठीक हो जाते थे और कई बार नहीं भी होते थे. लेकिन आमा के पास जब भी कोई बीमार या डरा हुआ आता था वह निःस्वार्थ भाव से सिर्फ अपना काम करती थी.

बीमार को लेकर न वह किसी प्रकार का दावा करती थी और न ही बीमारी को पूर्णतः ठीक कर देने का दम भरती थी. आज भी जब पहाड़ी घरों में कोई मुसीबत आती है या फिर कोई रोग ऐसा लग जाता हो जो डॉक्टरों और दवाइयों से ठीक न हो रहा हो तो घर में उचैन/उचैण धर कर देवता निकलवाने की प्रथा कायम है. इसके बाद भी यदि संतुष्टि न मिलती हो तो अपने इष्ट देवताओं को मनाने, पूजा करने और जागर लगाने लोग पहाड़ों में अपने पैतृक गाँवों और मंदिरों का रूख करते हैं. साथ ही घॉंट (घंटी) आदि का चढ़ावा भी करते हैं. आप इस सब पर विश्वास करें या न करें लेकिन लोगों का आज भी अपने कुल देवी-देवताओं, डंगरियों, जागर और आमा की तरह बिंदा बॉंधने वालों पर विश्वास कायम है. और सबसे बड़ी बात यह कि इन्हीं कुल देवताओं को पूजने की वजह से पलायित हो चुके लोग आज भी पहाड़ों से जुड़े हुए हैं और साल में पूजा के नाम पर ही सही दो तीन बार पहाड़ों की तरफ लौटते जरूर हैं.
(Memoir by Kamlesh Joshi)

नानकमत्ता (ऊधम सिंह नगर) के रहने वाले कमलेश जोशी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक व भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्ध संस्थान (IITTM), ग्वालियर से MBA किया है. वर्तमान में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग में शोध छात्र हैं.

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