उत्तराखण्ड में स्थित अल्मोड़ा जनपद का पश्चिमी सीमावर्ती इलाका सल्ट कहलाता है. तीखे ढलान वाले रुखे-सूखे पहाड़, पानी की बेहद कमी, लखौरी मिर्च की पैदावार और पशुधन के नाम पर हष्ट-पुष्ट बैल इस इलाके की खास पहचान है. प्रशासनिक व्यवस्था के तहत सल्ट का इलाका चार पट्टियों (राजस्व इकाई) में बंटा हुआ है. दूधातोली पर्वत़ श्रेणी के पनढाल से निकलने वाली पश्चिमी रामगंगा नदी चैखुटिया, मासी व भिकियासैण होकर सल्ट इलाके को छूते हुए भाबर प्रदेश को चली जाती है. स्थानीय लोक गाथाओं के अनुसार यह इलाका ‘राजा हरुहीत’ की कर्मभूमि रहा है. राजा हरुहीत का जन्म आज से तकरीबन 200 साल पहले तल्ला सल्ट पट्टी के गुजड़ूकोट गांव में हुआ था. राजा हरुहीत अपनी वीरता के साथ ही अपनी दयालुता व न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे. इनके बारे में मान्यता है कि अपनी अथक मेहनत से इन्होंने बंजर पड़ी जमीन को खेती-पाती से लहलहा दिया था. यहां के लोगों की हरुहीत पर अथाह आस्था है.राजा हरुहीत के मन्दिरों में आज भी लोग न्याय की गुहार लगाते हैं. गोरखा शासन(1790-1815) के समय यहां के वीरों और गोरखालियों के मध्य छोटे-बड़े युद्ध होते रहे. गुजरगढ़ी, बासुरीसेरा जैसे युद्ध स्थलों ने आज भी यहां के वीरों की ऐतिहासिक गाथा को समेटा हुआ है. सल्ट इलाके के लोग अपनी वीरता, निर्भिकता व देश के लिए अपनी आन-बान देने के लिए प्रसिद्ध रहे हैं. इसी चारित्रिक विशेषता के कारण इन्हें ‘सल्टिया वीर’ भी कहा जाता है. (Bardoli of Kumaon)
बीसवीं सदी के पूर्वाद्ध काल में जब भारत में स्वतंत्रता संग्राम अपने चरम अवस्था था तब उस वक्त कुमाऊं में कुली बेगार प्रथा व जंगलों के हक-हकूकों पर लगाई रोक के विरोध में वहां की जनता आन्दोलित हो रही थी. आन्दोलन की इस चिंगारी के सल्ट इलाके में पहुंचते ही वहां के लोगों में भी अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ प्रतिकार के अंकुर फूटने लगे. कुमाऊं डिविजन के कई गांवों में तब अंग्रेज अफसरों के दौरे के समय स्थानीय लोगों से उनका सामान ढोने और सेवा करने का कार्य बेगार के रुप में लिया जाता था. दौरे पर आये अफसरों के लिए डोला-पालकी का भी इन्तजाम करना होता था. इन व्यवस्थाओं का हिसाब रजिस्टरों में दर्ज होता था. अंग्रेजी हुकुमत के अन्याय का प्रतीक बन चुकी इस कुप्रथा को ग्रामीणों ने विवश होकर जड़ से खत्म करने का निर्णय लिया. 14 जनवरी 1921 को मकर संका्रन्ति के मेले पर बागेश्वर में हरगोविन्द पंत, बद्रीदत्त पाण्डे, व विक्टर मोहन जोशी के नेतृत्व में हजारों लोगों ने कुली बेगार के रजिस्टर सरयू नदी में बहा दिये और बेगार न देने का संकल्प लिया. इस असहयोग आंदोलन से कुमाऊं को राष्ट्रीय स्तर एक नई पहचान मिली. कुली बेगार आन्दोलन की इस सफलता से अंग्रेज अफसरों में बौखलाहट आना स्वाभाविक था सो उन्होंने समाज में अपनी पकड़ ढीली होती देखकर सल्ट की चार पट्टियों व पौड़ी की गुजडू पट्टी से बेगार कराने का फरमान जारी कर दिया. इसके लिए बकायदा रानीखेत के एस.डी.एम. हबीबुर्ररहमान को सल्ट भेजा गया. महत्वपूर्ण बात यह रही कि एस.डी.एम. के पहुंचने से पहले ही कुमाऊं के अग्रणी स्वतंत्रता सेननी पं. हरगोविन्द पंत सल्ट पहुंच चुके थे. पंत ने वहां जिला परिषद् के प्राइमरी स्कूल में हेड मास्टर पं. पुरुषोत्तम उपाध्याय से सम्पर्क किया और उनके साथ गांव-गांव में सभा आयोजित कर बेगार न देने की अपील की. सल्ट के ग्रामीण स्थानीय पटवारियों व पेशकार की रिश्वतखोरी व मुफ्तखोरी से भी तंग आ चुके थे सो सभी लोगों ने बेगार न देने का निर्णय लिया. इस तरह लोगों की एकजुटता व निर्भिकता से अंग्रेज अफसरों की चाल कामयाब नहीं हो पायी.
18 मार्च 1922 को सविनय अवज्ञा आन्दोलन के लिए जब महात्मा गांधी की गिरफ्तारी हुई तो उसका असर सल्ट की जनता में भी दिखायी दिया. उनकी गिरफ्तारी पर यहां के लोगों में गहरा असन्तोष था. देश को गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए खुमाड़ में पुरुषोत्तम उपाध्याय के घर पर अक्सर बैठकें होती थीं. गांव रास्तों की सफाई, स्वावलम्बन के लिए ऊन कताई, शिक्षा का प्रसार, दलितों के उद्धार जैसे रचनात्मक काम भी किये जाते थे. लगातार सक्रियता के कारण पुरुषोत्तम उपाध्याय के लिए सरकारी नौकरी करना संभव नहीं हो पाया तो उन्होंने त्यागपत्र दे दिया. 16 जून, 1929 को वे सल्ट के कार्यकर्ताओं के साथ प्रेम विद्यालय ताड़ीखेत के वार्षिकोत्सव में पहुंचे जहां उन्होंने महात्मा गांधी से भी भेंट की. 31 दिसम्बर 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन से लौटने के बाद पुरुषोत्तम उपाध्याय ने तमाम कार्यकर्ताओं के सहयोग से सल्ट इलाके में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार व समाज को नशामुक्त रखने के लिए आन्दोलन को और अधिक गति प्रदान की.
1930 का दौर सल्ट के स्वाधीनता आंदोलन का उत्कर्ष काल था. 12 मार्च 1930 को गांधी जी द्वारा दांडी यात्रा के जरिये किये गये नमक सत्याग्रह का असर सल्ट में भी दिखायी दिया. अप्रैल महीने में सल्ट के उभरी, हटुली व चमकना गांवो में लोगों ने नमक बनाकर नमक विरोधी कानून को भंग करने की पहल की.
17 अगस्त 1930 के दिन इलाके के मालगुजारों द्वारा एकाएक सामूहिक त्यागपत्र दे देने से अंग्रेज शासकों के पैरों तले जमीन खिसक गयी, क्योंकि ग्रामीणों पर नियंत्रण रखना अब उनके लिए दुष्कर कार्य साबित होने जा रहा था. अन्ततः 20 सितम्बर 1930 को अंग्रेज शासकों ने सल्ट की जनता पर दबदबा बनाये रखने की नीयत से एस.डी.एम. की देखरेख में तकरीबन 60 पुलिस के जवानों का दल खुमाड़ गांव भेजा. 23 सितम्बर को खुमाड़ पहंुचने से पहले प्रशासन के दल ने नयेड़ नदी पर कैम्प लगाया. पुलिस ने डंूगला गांव में खेतों की फसल रौंद डाली. पुलिस के जवान तमाम घरों से नकदी, खाने-पीने का सामान आदि लूट ले आये. घटना की खबर आसपास के गांवो में पहुंचते ही ग्रामीणों ने तुरही बजाकर सैकड़ों की तादात में लोगों को वहां बुला लिया और बहादुरी से पुलिस दल की घेराबन्दी कर उन्हें वापिस लौटने को मजबूर कर दिया. इस दौरान पुलिस कप्तान की मंशा गोली चलाने की थी परन्तु मौके की नजाकत भांप कर एस.डी.एम. ने गोली नहीं चलाई. हांलाकि इस अहिंसात्मक प्रतिकार में ग्रामीणों की विजय हुई लेकिन अंग्रेजी हुकुमत के प्रति सत्याग्रहियों का गुस्सा दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा था.
इस घटना के प्रतिकार में 25 अक्टूबर 1930 को तमाम सत्याग्रहियों ने रानीखेत जाकर अपनी गिरफ्तारी दी. 30 नवम्बर 1930 को जंगल सत्याग्रह में गिरफ्तारी देने के उद्देश्य से पुरुषोत्तम उपाध्याय और 400 से अधिक सत्याग्रही मोहान के डाकबंगले में एकत्रित हुए जिसमें पुरुषोत्तम उपाध्याय सहित 58 सत्याग्रहियों को बगैर मुकदमें में गिरफ्तार कर काशीपुर व बाद में मुरादाबाद के जेलों में ठूंस दिया गया. 16 मार्च 1931 को ये सभी लोग रिहा हो गये. लगभग एक साल बाद पुरुषोत्तम उपाध्याय को पुलिस ने पुनः गिरफ्तार कर बरेली जेल में रख दिया जहां 30 दिसम्बर 1932 को बीमारी के कारण उनका निधन हो गया.
पुरुषोत्तम उपाध्याय के निधन के बाद उनके अधूरे कामों को हरिदत्त वैद्य, लक्ष्मण सिंह अधिकारी, पान सिंह पटवाल व रघुवर दत्त उपाध्याय ने आगे बढ़ाने का प्रयास किया. 1933 के बाद के सालों में सल्ट में स्वतंत्रता आंदोलन की गति में थोड़ा बहुत उतार-चढ़ाव होता रहा लेकिन अंग्रेजी हुकुमत के विरोध में ग्रामीणों का असंतोष किसी भी दशा में कम नहीं हुआ था. 19 अगस्त 1942 को सल्ट के पड़ोसी इलाके देघाट में में आन्दोलनकारियों को बन्द करने पर जब वहां के ग्रामीणों में विरोध किया तो एस.डी.एम. जॉनसन ने जनता के बीच गोली चला दी जिससे दो लोग मौके पर ही शहीद हो गये थे. देघाट गोलीकाण्ड की घटना से सल्ट के आन्दोलनकारी और अधिक आक्रोशित हो उठे और सभी ने 5 सितम्बर को खुमाड़ में एकत्रित होने और आगे की रणनीति बनाने का निर्णय लिया. एस.डी.एम. जॉनसन को किसी तरह गुप्त सूचना मिल गयी कि बड़ी तादाद में प्रमुख आन्दोलनकारी व ग्रामीण अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ खुमाड़ पहुंच रहे हैं तो उसने पूरी तैयारी के साथ आन्दोलनकारियों के दमन की योजना बना ली.
बरसात का मौसम होने के बाद भी 3 सितम्बर 1942 को जॉनसन ने पुलिस के 200 जवानों के साथ खुमाड़ की ओर प्रस्थान किया. बितड़ी गांव में लालमणि नाम के एक आन्दोलनकारी ने जत्थे का रास्ता रोकने का प्रयास किया तो उन्हें बुरी तरह यातना देकर हिरासत में ले लिया गया. 5 सितम्बर 1942 को खुमाड़ पहुंचते ही जॉनसन ने भीड़ को हट जाने का आदेश दिया. उस समय पं. गंगादत्त शास्त्री की अध्यक्षता में सभा चल रही थी, जिसमें पांच हजार के करीब लोग आये हुए थे. गांव में तिल रखने की भी जगह नहीं थी. जॉनसन के आगे बढ़ने पर गोविन्द ध्यानी नाम के एक नवयुवक ने जोशीले नारे लगाते हुए जॉनसन का रास्ता रोकने का प्रयास किया. पुलिस उसे पकड़ पाती इससे पहले ही वह चकमा देकर ओझल हो गया. जाॅनसन ने उपस्थित लोगों को धमकी दी और कहा अगर वे आन्दोलनकारियों की जानकारी नहीं देंगे तो वह आग लगा देगा. लोगों को भयभीत करने के लिए जॉनसन हवाई फायर कर ही रहा था कि भीड़ से निकलकर एक व्यक्ति नैनमणि उर्फ ‘नैनुवा’ ने उसका हाथ रोक दिया उससे पिस्तौल छीनने का असफल प्रयास किया.
इसी बीच जॉनसन ने पुलिस बल को गोली चलाने का आदेश दे दिया. पुलिस बल में शामिल ज्यादातर सिपाही आसपास के इलाके थे इसलिए उन लोगों ने ग्रामीणों पर गोली सीधे न चलाकर हवा में चलानी शुरु कर दी. यह देखकर जॉनसन आग बबूला हो उठा और उसने अपनी पिस्तल से निशाना साधते हुए खुद ही गोलियां चला दी. इस गोलीबारी से दो आन्दोलनकारियों गंगाराम व खिमानंद जो सगे भाई थे घटनास्थल पर ही शहीद हो गये जबकि दो अन्य आन्दोलनकारी चूड़ामणि व बहादुर सिंह मेहरा गम्भीर रुप से घायल होने के उपरान्त चैथे दिन वीरगति को प्राप्त हुए. इस घटना में मधूसूदन, गोपाल दत्त,गंगादत्त शास्त्री नारायण सिंह,बचे सिंह व गोपाल सिंह सहित कुछ और लोग भी गोलीबारी में घायल हुए. मरहम पट्टी के लिए जॉनसन जब घायलों के पास पहंुचा तो बहादुर सिंह मेहरा ने निर्भीक स्वर में कहा कि खबरदार…!!! अपने गन्दे हाथों से हमें छूना भी मत.
स्वाधीनता संग्राम में सल्ट के सत्याग्रहियों का योगदान महत्वपूर्ण रहा जिसकी गांधी जी ने खूब प्रशंसा की और इसे कुमाऊं की बारडोली नाम देकर विभूषित किया. खुमाड़ के शहीद स्मारक में आज भी हर साल 5 सितम्बर को सल्ट के रणवीरों को याद किया जाता है. सल्ट के असहयोग आन्दोलन में स्थानीय कुमाउनी कवियों ने भी ग्रामीणों के हृदय में देशप्रेम व देशभक्ति का जोश भरने का काम किया-
हिटो हो उठो ददा भुलियो,आज कसम खौंला
हम अपणि जान तक देशो लिजि द्यौंला’’
झन दिया मैसो कुली बेगारा, पाप बगै है छो गंगा की धारा
झन दिया मैसो कुली बेगारा, आब है गयी गांधी अवतारा
सल्टिया वीरों की घर-घर बाता, गोरा अंग्रेजा तू छोड़ि दे राजा
यानि चलो भाई लोगो उठो, आज हम कसम खाते हैं कि हम देश के लिए अपनी जान तक दे देगें. आप लोग कुली बेगार मत देना,इस पाप को तो अब गंगा की धारा में बहा दिया गया है, अब गांधी ने अवतार ले लिया है. गोरे अंग्रेजों अब तुम यहां अपना राज करना छोड़ दो !!! सल्ट के वीरों की यह ललकार हर घर से उठ रही है.
(प्रस्तुत आलेख प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका कादम्बिनी के अगस्त, 2019 के अंक में प्रकाशित हो चुका है. जिसे हम काफल ट्री में साभार दे रहे हैं.)
चंद्रशेखर तिवारी. पहाड़ की लोककला संस्कृति और समाज के अध्येता और लेखक चंद्रशेखर तिवारी दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, 21,परेड ग्राउण्ड ,देहरादून में रिसर्च एसोसियेट के पद पर कार्यरत हैं.
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