विश्व पर्यावरण दिवस और उत्तराखंड

विश्व पर्यावरण दिवस हर साल 5 जून को धूमधाम से मनाया जाता है और वह धूमधाम ऐसी है कि जो आजकल सोशल मीडिया तक ही सिमट कर रह गई है. पर्यावरण के प्रति हमारी चिंताएँ कितनी गहरी हैं यदि यह जानना हो तो पूछिये खुद से कि अंतिम बार कब आपने पर्यावरण के किसी मुद्दे पर जोर-शोर से अपनी आवाज बुलंद की थी? कितने सवाल आपने सरकारों से पूछे थे या कब आप पर्यावरण बचाने के नाम पर सड़क में उतरे थे? मैं अधिक दूर नहीं जाऊँगा. बात करते हैं अपने ही राज्य उत्तराखंड की और यहाँ बनाई जा रही ऑल वेदर रोड की. विकास और विनाश का ऐसा अभूतपूर्व संगम आपको शायद ही किसी अन्य पहाड़ी राज्य में देखने को मिलेगा. विकास राज्य की नितांत आवश्यकता है लेकिन विनाश की शर्त पर नहीं.
(World Environment Day 2021)

पिछले लगभग चार साल से आल वेदर रोड का निर्माण हमारी आँखों के सामने हो रहा है. जिसके लिए लगभग 56,000 पेड़ों के काटे जाने का प्रस्ताव था. इसमें से 36,000 पेड़ तो आनन-फानन ही काट दिये गए. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार सबसे ज़्यादा 6,885 पेड़ टनकपुर-पिथौरागढ़ हाइवे, 6,291 पेड़ रुद्रप्रयाग-माणा हाइवे तथा 3,460 पेड़ ऋषिकेश-रूद्रप्रयाग हाइवे पर काटने की मंजूरी दी गई. यह सरकारी आँकड़ा है तो आप समझ सकते हैं कि हकीकत में कितने पेड़ काटे गए होंगे. फिलहाल आप बाइक लेकर गढ़वाल में नेशनल हाइवे 58 पर निकल जाइये आपको बड़ी-बड़ी मशीनें या तो सड़क निर्माण के कार्य में लगी दिखेंगी या फिर रेल निर्माण के कार्य में. कई बार ऐसा लगता जैसे पहाड़ों में शहर बनाने की कोशिश की जा रही है. आपको इस तरह की मशीनों से किया जा रहा बेतरतीब काम अमूमन मैदानी शहरों में ही देखने को मिलेगा.

उत्तराखंड भूकंप के उस अतिसंवेदनशील जोन 5 में आता है जिसमें सबसे ज़्यादा तबाही की आशंका जताई जाती है. फिर इतने संवेदनशील राज्य में इतनी चौड़ी सड़कें बनाने का औचित्य समझ के परे है. सड़क निर्माण से पूर्व भी पर्यावरणीय प्रभाव का जो आकलन (EIA) किया जाना था वो नहीं किया गया जिस वजह से एनजीटी को बीच में सड़क निर्माण पर रोक भी लगानी पड़ी और इस बावत कोर्ट को एक कमेटी का गठन भी करना पड़ा जो इसकी जाँच कर सके.

EIA से बचने के लिए सरकार ने 900 किलोमीटर चौड़ी सड़क को 57 भागों में बाँट दिया जिसमें प्रत्येक भाग की लंबाई 100 किलोमीटर से कम रखी गई. इस तरह सरकार ने पर्यावरणीय आंकलन प्रभाव से गुजरने की प्रक्रिया से खुद को बचा लिया. डॉ. रवि चौपड़ा के नेतृत्व में बनी कमेटी ने कोर्ट में अपनी रिपोर्ट जमा की जिसमें कहा गया कि अतिसंवेदनशील पहाड़ी इलाक़ों में 5.5 मीटर से अधिक चौड़ी सड़क नहीं बनाई जानी चाहिये जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी सहमति जताई. जब तक कोर्ट की सहमति आई तब तक काफी देर हो चुकी थी और कई जगह पहाड़ों को अंदर तक 10 से 12 मीटर काटकर सड़कें बनाई जा चुकी थी.

आल वेदर रोड के निर्माण के चलते पूरे गढ़वाल क्षेत्र में सैकड़ों एक्टिव भूस्खलन क्षेत्र बन गए हैं जिनकी वजह से हुए हादसों में न जाने कितने ही लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी है. भूस्खलन की वजह से आए दिन हाइवे का बंद होना आम सी बात हो गई है. श्रीनगर शहर से कुछ ही दूर नरकोटा में 31 मई को भूस्खलन के कारण नेशनल हाइवे तीन दिन के लिए बंद रहा जो अंततः 2 जून की शाम को जाकर खुला.
(World Environment Day 2021)

इसी तरह सड़क चौड़ीकरण से निकलने वाले मलबे के निस्तारण के लिए डंपिंग ज़ोन तो बनाए गए हैं लेकिन कई बार देखने में यह आया है कि नदी के किनारों में ही मलबे को डंप कर दिया जाता है जिस वजह से अलकनंदा व अन्य नदियों का जलस्तर ऊपर उठने का खतरा बना हुआ है. कई गाँवों में तो मलबा पानी के साथ बहकर खेतों में आ जाता है जिस वजह से खेतों का उपजाऊपन खत्म हो रहा है. अधिकतर देखने को यह मिलता है कि आल वेदर रोड की साइट पर इंजीनियर नदारद रहते हैं और सारा काम मजदूरों और मशीन ऑपरेटरों के भरोसे छोड़ दिया जाता है.

उत्तराखंड का इतिहास पर्यावरण संरक्षण का रहा है और पेड़ों को काटने का जब-जब जिक्र आता है तब-तब चिपको आंदोलन का नाम सबसे पहले लिया जाता है लेकिन उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद से कोई बहुत बड़ा आंदोलन पर्यावरण संरक्षण को लेकर नहीं हुआ है. हवाईअड्डे के विस्तार के लिए काटे जाने वाले थानो के जंगलों को बचाने के लिए जरूर एक आंदोलन हमने देखा लेकिन वह देशव्यापी तो छोड़िये राज्यव्यापी भी नहीं बन सका.

इसी बीच आल वेदर रोड के दौरान काटे जाने वाले पेड़ों को लेकर हमें सरकारों को घेरना चाहिये था लेकिन हम मूकदर्शक बनकर सिर्फ विकास के ढोल की थाप पर नाचते रहे. हाल ही में अपना जीवन पर्यावरण के नाम कर देने वाले सुंदरलाल बहुगुणा जी के देहावसान पर हमने उनके पर्यावरण संरक्षण में योगदान और समर्पण को लेकर तमाम बातें की और आज भी पर्यावरण दिवस पर हम पेड़ लगाने से लेकर पर्यावरण बचाने तक की सैकड़ों अपीलें सोशल मीडिया में पोस्ट कर देंगे लेकिन उत्तराखंड जैसे अतिसंवेदनशील राज्य में हो रहे पर्यावरणीय विनाश के खिलाफ हम कब उठ खड़े होंगे पता नहीं.
(World Environment Day 2021)

कमलेश जोशी

नानकमत्ता (ऊधम सिंह नगर) के रहने वाले कमलेश जोशी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक व भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्ध संस्थान (IITTM), ग्वालियर से MBA किया है. वर्तमान में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग में शोध छात्र हैं.

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

इसे भी पढ़ें: बचपन में ईजा-आमा संग यादें

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

View Comments

Recent Posts

Casino Middelkerke bezoeken – complete gids met bonussen, betaalmethoden en mobiele app

Visit Casino Middelkerke: praktische begeleiding voor een geslaagde ervaring Waarom een bezoek aan Casino Middelkerke…

3 hours ago

Trusted Grand Casino Chaudfontaine: stappen en methoden

Praktische gids voor het trusted Grand Casino Chaudfontaine Welkom op de ultieme handleiding voor iedereen…

3 hours ago

Magyar Online Casino a legjobb ügyfélszolgálattal és támogatással

Magyar Online Casino a legjobb ügyfélszolgálattal és támogatással ▶️ JÁTSZANI Содержимое Magyar Online Casino a…

1 day ago

Казино Sultan Games в Казахстане – Удобный вход и безопасная игра

Казино Sultan Games в Казахстане - Удобный вход и безопасная игра ▶️ ИГРАТЬ Содержимое Удобство…

1 day ago

Казино онлайн 2026 – самые перспективные площадки для любителей азартных игр

Казино онлайн 2026 - самые перспективные площадки для любителей азартных игр ▶️ ИГРАТЬ Содержимое Лучшие…

1 day ago

NV Casino Online – Boni und Sonderaktionen

NV Casino Online - Boni und Sonderaktionen ▶️ SPIELEN Содержимое Willkommenspaket: 100% bis 500 EuroSonderaktionen:…

1 day ago