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क्या थी धर्म संसद, और यह गई कहां?

जिस स्विडनबॉर्जियन चर्च की पहल पर 11 सितम्बर 1893 को दुनिया की एकमात्र धर्म संसद आयोजित हुई थी, वह खुद तो कहीं बह-बिला गया लेकिन दक्षिण एशिया में उसके दो अवशेष लंबे समय तक अपना प्रभाव दिखाते रहेंगे. इनमें एक हैं हमारे स्वामी विवेकानंद, जिनकी मेहरबानी से हिंदुओं के पास आज भी वैश्विक मंचों से धर्म के नाम पर बोलने के लिए कुछ बचा हुआ है. और दूसरे श्रीलंका के अनागारिक धर्मपाल, जिन्हें दक्षिण एशिया में, खासकर भारत में बौद्ध धर्म को पुनर्जीवित करने का श्रेय जाता है.

ऊपर बताए गए तीनों नामों की खासियत यह है कि वे अपने-अपने यहां आउटकास्ट थे. स्विडनबॉर्जियन चर्च सपनों में ईसा मसीह से बात करने वालों का खड़ा किया हुआ था और उसका मकसद थियोसॉफिकल (थियोलॉजिकल यानी धर्मशास्त्रीय और फिलसॉफिकल यानी धर्मशास्त्रीय को मिलाकर बनाया गया शब्द) सोसायटी जैसे संदिग्ध, विवादास्पद और किनारे पड़े पंथ को न सिर्फ ईसाइयत बल्कि पूरी दुनिया की धार्मिक मुख्यधारा बनाना था.
भारी बेचैनी और अकेलेपन से घिरे 29 साल के संन्यासी विवेकानंद इस आयोजन में शामिल होना चाहते थे लेकिन तत्कालीन हिन्दू धर्म धाराएं उन्हें कायस्थ और पांथिक बताकर इसके प्रति अपनी नाराज़गी जाहिर कर चुकी थीं. ऐसे में 1892 में मात्र 20 वर्ष आयु के थेवर बिरादरी के रामनाड के राजा भास्कर सेतुपति ने विवेकानंद की लंबी समुद्री यात्रा को स्पॉन्सर करने का फैसला किया.

भास्कर सेतुपति दक्षिणी तमिलनाडु के रामेश्वरम क्षेत्र के जमींदार थे, जबकि मन्नार की खाड़ी के दूसरी तरफ थियोसॉफिकल सोसायटी की संस्थापिका रूसी-जर्मन मैडम ब्लावत्स्की के प्रभाव में ईसाइयत से बौद्ध धर्म में लौटे और डेविड से धर्मपाल बने, विवेकानंद से मात्र एक साल छोटे श्रीलंकाई युवक अनागारिक को धर्म संसद में भेजने के लिए कई व्यक्तियों और संस्थाओं का समर्थन प्राप्त था. अमेरिका में बिल्कुल अलग-अलग पृष्ठभूमि के इन युवाओं की आध्यात्मिकता को लेकर खूब पटरी बैठी और हमेशा बैठी रही.

असल में धर्म संसद का आयोजन धर्मों की मूल प्रकृति के ही खिलाफ जाता था. हर धर्म के शुरुआती दौर को छोड़ दें तो समय बीतने के साथ इस शब्द का व्यावहारिक अर्थ हर जगह सामुदायिक पहचान से ही जुड़ता गया है. लेकिन इस आयोजन का उद्देश्य सभी धर्मों के बीच की बुनियादी एकता का संधान करने का था. यही कारण है कि यह संसद अकेली, न भूतो न भविष्यत आयोजन बन कर रह गई. हालांकि उस समय इसको विज्ञान, धर्म और दर्शन के आपसी समायोजन के प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया गया था और अगले दो दशकों तक दुनिया पर इसका काफी प्रभाव भी देखा गया.
अपने यहां थियोसॉफिकल पृष्ठभूमि वाली श्रीमती एनी बेसेंट की राजनीति और संस्कृति से जुड़ी महत्वपूर्ण भूमिकाओं से हम सभी परिचित हैं. यह आंदोलन और इससे निकले लोग आधुनिक पश्चिमी सभ्यता में स्वप्न युग (1878-1914) की देन कहे जा सकते हैं. इनके पहले या बाद यूरोप-अमेरिका में ऐसी कोई चीज नहीं देखी गई. उस खास दौर में ही धर्म-दर्शन का ऐसा उदात्त उभार क्यों देखा गया, इसका मुख्य कारण इन साढ़े तीन दशकों में यूरोप में कोई युद्ध न होना ही है.

आप चाहें तो इस दौर की एक झलक आपको टाइटैनिक फिल्म में भी मिल सकती है. कुलीनता की एक ऐसी किस्म, जिसमें नकचढ़ापन तो था, लेकिन उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं, भिन्न मानवजातियों और उपेक्षित विचारों को इज्जत देने का एक गहरा बोध भी था. इस दौर ने टॉल्स्टॉय और एमिल जोला ही नहीं, गांधी और टैगोर भी पैदा किए. बहरहाल, प्रथम विश्वयुद्ध और रूसी सर्वहारा क्रांति ने उस स्वप्न युग को तहस-नहस कर दिया. भारत में विवेकानंद की स्मृति के रूप में उसके अवशेष अभी जिंदा हैं, हालांकि अक्सर दुष्ट लोग ही इसे भुना रहे हैं.

चन्द्र भूषण

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Sudhir Kumar

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