फोटो : Gopu Bisht की फेसबुक वाल से साभार
कुमाऊं के गांवों में आज से सातों-आठों लोकपर्व की तैयारियां शुरु हो चुकी हैं. सातों-आठों कुमाऊं में बड़े उल्लास मनाया जाने वाला लोकपर्व है. (Biruda Panchami )
बिरुड़े का अर्थ पांच या सात प्रकार के भीगे हुये अंकुरित अनाज से है. कुमाऊं में भाद्रपद मास की पंचमी को बिरुड़े भिगाये जाते हैं. सामान्य रूप से यह महिना अंग्रेजी के अगस्त या सितम्बर महीने की तारीख में पड़ता है. (Biruda Panchami )
भाद्रपद महीने की पंचमी को बिरुड़-पंचमी कहते हैं. इस दिन एक साफ़ तांबे के बर्तन में पांच या सात अनाजों को भिगोकर मंदिर के समीप रखा जाता है . भिगो कर रखने वाले अनाजों में हैं मक्का, गेहूं, गहत , ग्रूस(गुरुस), चना, मटर व कलों.
सबसे पहले तांबे या पीतल का एक साफ़ बर्तन लिया जाता है. उसके चारों ओर गोबर से छोटी-छोटी नौ या ग्यारह आकृतियां बनाई जाती हैं जिसके बीच में दूब की घास लगाई जाती है. जो घर मिट्टी के होते हैं वहां मंदिर के आस-पास सफाई कर लाल मिट्टी से लिपाई की जाती है और मंदिर के समीप ही बर्तन को रखा जाता है.
कुमाऊं क्षेत्र में दालों में मसूर की दाल अशुद्ध मानी गयी है इसलिये कभी भी बिरुड़े में मसूर की दाल नहीं मिलायी जाती है. कुछ क्षेत्रों में जौं और सरसों एक पोटली में डालकर उस बर्तन में भिगो दिया जाता है जिसमें बिरुड़े भिगोए जाते हैं.
सातों के दिन बिरुडों से गमारा (गौरा) की पूजा की जाती है और आठों के दिन बिरुडों से महेश (शिव) की पूजा की जाती है. पूजा किये गये बिरुडों को सभी लोगों को आशीष के रुप में दिया जाता है और अन्य बचे हुये बिरुड़े प्रसाद के रूप में पकाकर खाये जाते हैं.
बिरुड़-पंचमी का लोक-महत्व के साथ-साथ कृषि महत्व भी है. पूरे कुमाऊं अंचल में मनाये जाने वाले सातों-आठों पर्व की शुरुआत है बिरुड़-पंचमी.
-काफल ट्री डेस्क
जब शिव-पार्वती बनते हैं गांव के दीदी-जीजाजी
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