छछिया का हिंदी अर्थ होता है एक बर्तन जिसमें मट्ठा रखा जाता है. लेकिन उत्तराखण्ड में यह एक अर्धतरल व्यंजन हुआ करता है. छछिया, छसिया या छ्छेड़ो उत्तराखण्ड के पारंपरिक खान-पान (Traditional Foods of Uttarakhand) का हिस्सा रहा है. इस व्यंजन को बीमार व्यक्ति के लिए विशेष तौर पर सुपाच्य माना जाता है. ऐसा भी नहीं है कि यह सिर्फ बीमारों का ही भोजन है, जब भी कभी हल्का-फुल्का और सुपाच्य भोजन खाने की इच्छा हो तो छछिया उर्फ़ छसिया सबसे आगे हुआ करता है. छछिया या छसिया को गढ़वाल में छ्छेड़ो के नाम से जाना जाता है. भट की चुड़कानी
छछिया, छसिया या छ्छेड़ो उत्तराखण्ड की बिसरा दी गयी भोजन परंपरा का एक परित्यक्त व्यंजन है. यह व्यंजन अब उत्तराखंडी थाली से लगभग बाहर जा चुका है. एक वक़्त था जब छछिया यहाँ की थाली का एक नियमित भोजन हुआ करता था. यही नहीं डाक्टर भी किसी बीमार व्यक्ति को दवा के साथ भोजन के रूप में ‘पतला-पतला छछिया’ खाने की हिदायत जरूर दिया करते थे. धीरे-धीरे भोजन की ठंडी या गर्म तासीर और बीमारियों में उससे होने वाले नुकसान का पैमाना बदलता चला गया और छछिया डॉक्टरों के उपयोगी नुस्खे के रूप में अपनी पहचान खोता चला गया. सुदूर गांवों में छछिया या छ्छेड़ो आज भी अपनी आखिरी सांसें ले रहा है.
गढ़वाल में पकाया जाने वाला छ्छेड़ो मुख्यतः झंगोरे के चावल से बनाया जाता है. लेकिन कुमाऊँ में इसे झंगोरे व धान दोनों के ही चावल से बनाए जाने की परंपरा रही है.
छछिया या छ्छेड़ो को चावल में मट्ठा डालकर पकाया जाता है. मट्ठा न हो तो दही में पानी डालकर उसे अच्छी तरह फेंटकर बनाया गया पतला घोल भी इस्तेमाल किया जा सकता है. मसालों के नाम पर सिर्फ हल्दी और नमक डाला जाता है. स्वाद बढ़ाने के लिए थोड़ी सी मिर्च डाली जा सकती है. इसे बगैर तड़का लगाये ही खाया जा सकता है. चाहें तो पक जाने के बाद में देशी घी में जीरा या जखिया का तड़का भी लगाया जा सकता है.
इसे तैयार करते वक़्त मट्ठे और चावलों का अनुपातिक संतुलन बनाये रखना बहुत जरूरी है. यह संतुलन इस तरह होना चाहिए कि पूरी तरह पक जाने के बाद यह भात या खिचड़ी की तरह गाढ़ा न हो जाये बल्कि अर्धतरल बना रहे. भट के डुबुक
तैयार छछिया, छसिया या छ्छेड़ो देखने में झोई-भात (कढ़ी-चावल) का मिश्रण लग सकता है लेकिन स्वाद में यह इससे बहुत ज्यादा अलग होता है.
भट का जौला नहीं टर्टलबीन्स रिसोटो कहिये जनाब!
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
कुमाऊँ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान कृष्ण के जन्म का धार्मिक पर्व नहीं रही है,…
पिछली कड़ी : पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल इन्द्र…
पूरी तरह आंचलिक परिवेश में तैयार, "टुकड़ा टुकड़ा जिंदगी" वरिष्ठ इतिहासकार डॉ निर्मल जोशी की नव प्रकाशित…
ये सितंबर 1994 की सुबह थी जब खटीमा में पूर्व सैनिकों का जुलूस निकल रहा था. पूर्व…
उत्तराखण्ड को सामान्यतः हिमालय, नदियों, झरनों और जलधाराओं की भूमि के रूप में जाना जाता है. किंतु…
पिछले 3 सालों से अल्मोड़ा के कुछ जागरूक युवा अल्मोड़ा मानसून मैराथन का आयोजन कर रहे हैं,जिसमें…