Featured

उत्तराखण्ड की सामाजिक कुरीति है छूत

फर्ज कीजिये आप परेशानी में हैं, दर्द से कराह रहे हैं और रक्त का स्राव हो रहा है. ऐसे हालात में आप पहली उम्मीद क्या करेंगे? यकीनन कोई आपको डॉक्टर के पास ले जाए और सबसे महत्वपूर्ण, इस मुश्किल घड़ी में, आपका कोई करीबी या रिश्तेदार आपकी देखभाल के लिए आपके पास हो. ठीक इसका उल्टा होता है जब एक महिला हर महीने अपने उस मासिक चक्र से गुजरती है जिसे महावारी कहते हैं. पहली बात तो इस प्राकृतिक चक्र को लेकर हमारे घर-परिवार में कोई चर्चा ही नहीं होती और दूसरी बात यह कि इसे कई बार एक बीमारी की तरह पेश किया जाता है. उत्तराखंड के कई पहाड़ी (कुमाऊँनी/गढ़वाली) घरों में आज भी इसे छूत के नाम से जाना जाता है. (Tradition in Uttarakhand During Menstrual)

बचपन में इस बात की समझ किसी भी बच्चे को नहीं होती कि आखिर क्यों हर महीने उसकी मां को अपने ही घर में 4-5 दिन के लिए किसी अलग कमरे या कोने में रहने के लिए मजबूर किया जाता है. इस दौरान महिलाओं को एक अलग बिस्तर और एक थाली, कटोरी व गिलास खाने के लिए पकड़ा दिया जाता है. कई बार देखने में आता है कि खाना इस तरह से परोसा जाता है जैसे किसी जानवर को दिया जा रहा हो. महावारी से पीड़ित महिला से दूरी बनाकर रोटी या सब्जी को इस तरह फेंक कर दिया जाता है जैसे अगर गलती से छू लिया तो पता नहीं कौन सी महामारी फैल जाएगी.

किसी को भी उस महिला के कमरे में जाने की इजाजत नहीं होती है. खासकर उन छोटे-छोटे बच्चों को जिन्हें हर पल मां की जरूरत महसूस होती है. इन बच्चों को यह कहकर कमरे से दूर रखा जाता है कि मम्मी की तबीयत बहुत खराब है या फिर उसे किसी कीड़े ने काट लिया है. अब बच्चे तो बच्चे ही होते हैं, मां से दूर भला कब तक रहेंगे. वो खेलते-कूदते मां के पास पहुँच ही जाते हैं. ये सब देखकर घर के बुजुर्गों में एक अलग ही रोष रहता है. खासकर बूढ़ी आमा (दादी/नानी) को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं आता. पुराने खयालात की बूढ़ी आमाओं के लिए महावारी अशुद्धि और अपवित्रता का पैमाना जान पड़ती है. हर बार मां के पास पहुँच जाने वाले छोटे बच्चों को हमेशा आमा की डांट सहनी पड़ती है और कई बार तो इसके चलते उनको मार तक खानी पड़ती है. बच्चों को समझ ही नहीं आता कि बिना कोई गलती किये अपनी ही मां से मिलने पर मार क्यों पड़ी. अगली बार से वह मार की डर से महावारी के समय अपनी माँ से खुद ही दूरी बना लेते हैं.

महावारी से पीड़ित महिलाओं को सिर्फ घर के बाहर के काम करने की इजाजत होती है. उन्हें न तो किचन में और न ही बेडरूम में जाने की इजाजत दी जाती है. और अगर किसी आवश्यक काम की वजह से उन्हें बेडरूम में जाना भी पड़े तो गंगाजल या गौमूत्र छिड़कर पूरे बेडरूम को शुद्ध किया जाता है. महावारी के दौरान यदि कोई महिला को छू ले तो उसके ऊपर भी गंगाजल या गौमूत्र डालकर शुद्ध किया जाता है. महावारी के आखिरी दिन महिलाओं को अपने सारे बिस्तर, कपड़े व बर्तन अच्छे से धोने होते हैं और खुद नहा धोकर गंगा जल या गौमूत्र छिड़ककर पूरे घर को शुद्ध करना होता है. इस तरह 4-5 दिन की उपेक्षा व अवहेलना के बाद उन्हें घर के अंदर प्रवेश की इजाजत मिलती है.

एक महिला मित्र से इस विषय पर चर्चा हुई तो उसने बताया कि महावारी के दौरान पेट  या कमर में एक अजीब सा दर्द होता है और कई बार यह दर्द इतना भयानक होता है कि इंजेक्शन तक लेने पड़ते हैं. हमारे समाज में, खासकर ग्रामीण परिवेश में, आज भी महावारी को एक बीमारी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. जिस समय एक महिला को देखभाल की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस होती है उसी दौरान उसे परिवार से अलग रहने के लिए मजबूर किया जाता है. हम जातिगत भेदभाव की बातें बहुत करते हैं लेकिन महावारी के समय महिलाओं के साथ अपने ही घर में होने वाले इस भेदभाव को हम अक्सर नजरअंदाज करते रहते हैं. आज भी कई अच्छे पढ़े-लिखे पहाड़ी घरों में महावारी को छूत मानने वाले लोग मिल जाते हैं और धीरे-धीरे यह बात उन परिवारों के लिए इतनी सामान्य हो जाती है कि किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ता.

अपने परिवार के लोगों को महावारी विषय पर शिक्षित बनाने की जगह हम उसके सामाजिक पहलू को पकड़े इस कुरीति को आने वाली पीढ़ियों पर भी थोपने लगे हैं. कहॉं तो हमें करना यह चाहिए था कि अपनी मां-बहन-बेटियों को इस विषय की गंभीरता व सहजता समझाते लेकिन हमेशा हमने इस विषय पर बात करना नकारा ही है. आज हजारों बच्चियां ऐसी हैं जो 12 से 15 साल की उम्र में जब महावारी के इस चक्र में प्रवेश करती हैं तो सिर्फ इसलिए भयानक तरीके से डर जाती हैं क्योंकि उनकी पारिवारिक व प्राथमिक शिक्षा में हमने इस विषय पर कोई बात ही नहीं की. अगर हमने उन्हें इस मासिक चक्र के बारे में और इसकी सामान्यता तथा महत्व को समझाया होता तो वो इसे बहुत आसानी से स्वीकार कर लेती.

समय की मांग यही है कि मासिक चक्र को एक बीमारी की तरह पेश करने की जगह उसके असल महत्व को महिलाओं और पुरुषों दोनों तक पहुँचाया जाए. महिलाओं को यह एहसास करवाया जाए कि यह कोई बीमारी नहीं बल्कि एक विशेषाधिकार है जो पुरुषों के पास नहीं होता. सामाजिक कुरीति के रूप में फैली छूत की इस कुप्रथा का घर परिवार में ही पुरजोर विरोध किया जाए और इस विरोध का पहला मुखर स्वर पुरुषों के मुँह से निकले ताकि महावारी के समय तरह-तरह की समस्याएँ व असहनीय पीड़ा झेल रही महिलाओं को बल मिल सके. इस दौरान महिलाओं की खूब देखभाल की जाए और 24 घंटे काम करने वाली इन कुशल नारियों को कुछ दिन का आराम देकर खुद किचन, घर और बच्चों को सँभाला जाए. एक बार कर के देखिएगा. सुकून मिलेगा और अच्छा भी लगेगा.

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

नानकमत्ता (ऊधम सिंह नगर) के रहने वाले कमलेश जोशी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक व भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्ध संस्थान (IITTM), ग्वालियर से MBA किया है. वर्तमान में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग में शोध छात्र हैं.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Sudhir Kumar

View Comments

Recent Posts

बचपन से छीन ली गई बचपन की तस्वीर

यह दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत तस्वीर है. इस से पहले मैंने ऐसी तस्वीर नहीं देखी,…

1 hour ago

खसों पर हुए वैज्ञानिक अध्ययन

डीएनए, आनुवंशिकी और मानवशास्त्र की दृष्टि से एक वैज्ञानिक समीक्षा भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में यदि…

2 days ago

वह माला के गेट पर सुबह-शाम पहरा देते मिलता

माला नाम था उसका. छरहरी काया, बला की ख़ूबसूरत. लेडीज साइकिल से जब कॉलेज आती,…

3 days ago

पहाड़ो में भूस्खलन

उत्तराखण्ड का अधिकांश भूभाग हिमालय की पर्वतीय श्रृंखलाओं में स्थित है, जहाँ तीव्र ढाल, गहरी नदी घाटियाँ, युवा…

6 days ago

जर्मन की लड़ाई और रुद्रनाथ की चढाई

पनार बुग्याल के ऊपरी छोर वाले रास्ते पर अब हम चल रहे हैं. पनार चोटी…

6 days ago

हिमालय की सामाजिक-आर्थिक संरचना पर प्रोफेसर पूरन चंद्र जोशी

पिछली कड़ी : कुमाऊं का सबसे बड़ा सामाजिक समूह “खस” रहा : आर. डी. सनवाल सन 1928 में अल्मोड़ा…

6 days ago