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कितनी भी बड़ी हो तोप, एक दिन तो होना ही है उनका मुँह बन्द!

पहली बार उनका नाम प्रोफेसर श्योराज सिंह बेचैन से सुना था कि बाबा साहेब आंबेडकर की पत्रकारिता पर उनके रिसर्च के गाइड वीरेन डंगवाल थे. फिर जीवन में वीरेन दा लगातार आते चले गए. उनकी कविताएँ आईं, फिर वे साक्षात आ गए. अशोक पांडे जरिया बने. अनुराधा से मिले. उनकी कविताएँ पढ़ीं. कैंसर ने हमें एक दूसरे के और क़रीब ला दिया. बंगाल की मिठाई संदेश उन्हें प्रिय थी और चित्तरंजन पार्क से हर बार मैं वही लेकर उनके पास जाता था. वीरेन दा के बारे में उनके हर परिचित को लगता है कि वे सबसे ज्यादा प्यार उनसे ही करते हैं. मैं भी उनमें एक हूँ : दिलीप मंडल

तोप

कविता को रुचिता तिवारी की आवाज़ में सुनने के लिए प्लेयर पर क्लिक करें

कम्पनी बाग़ के मुहाने पर
धर रखी गई है यह 1857 की तोप
 
इसकी होती है बड़ी सम्हाल
विरासत में मिले
कम्पनी बाग की तरह
साल में चमकायी जाती है दो बार
 
सुबह-शाम कम्पनी बाग में आते हैं बहुत से सैलानी
उन्हें बताती है यह तोप
कि मैं बड़ी जबर
उड़ा दिये थे मैंने
अच्छे-अच्छे सूरमाओं के छज्जे
अपने ज़माने में
 
अब तो बहरहाल
छोटे लड़कों की घुड़सवारी से अगर यह फारिग हो
तो उसके ऊपर बैठकर
चिड़ियाँ ही अकसर करती हैं गपशप
कभी-कभी शैतानी में वे इसके भीतर भी घुस जाती हैं
ख़ासकर गौरैयें
 
वे बताती हैं कि दरअसल कितनी भी बड़ी हो तोप
एक दिन तो होना ही है उनका मुँह बन्द!

वीरेन डंगवाल (1947-2015)

वीरेन डंगवाल (5 अगस्त 1947 – 27 सितम्बर 2014) समकालीन हिन्दी कविता के सबसे लोकप्रिय कवियों में गिने जाते हैं. साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता इस कवि के तीन कविता संग्रह – ‘इसी दुनिया में’, ‘दुश्चक्र में सृष्टा’ और ‘स्याही ताल’ प्रकाशित हुए. हाल ही में उनकी सम्पूर्ण कविताएँ नवारुण प्रकाशन से छपकर आई हैं.

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Girish Lohani

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