हैडलाइन्स

इंटरनेशनल टाइगर डे: 442 बाघों के साथ उत्तराखंड तीसरे स्थान पर

बाघों की संख्या में उम्मीद से ज़्यादा बढ़ोत्तरी हुई है जो विलुप्ति की कगार पर खड़ी इस प्रजाति के लिए और हम सब के लिए राहत की बात है. इंटरनेशनल टाइगर डे के दिन आई इस ख़ुशख़बरी के अनुसार 2014 की तुलना में 2018 में बाघों की संख्या में 33% की वृद्धि हुई है. 2014 में जहॉं 2226 बाघों की गणना की गई थी वह 2018 तक 2967 हो गई है. भारत के लिए यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है. दुनिया के तीन चौथाई यानि कि लगभग 70% बाघ भारत में पाए जाते हैं जिस वजह से भारत के जंगलों को बाघों के लिए सबसे सुरक्षित वास माना जाता है.

बाघों की संख्या के लिहाज़ से मध्यप्रदेश (526) अव्वल स्थान पर, कर्नाटक (524) दूसरे और उत्तराखंड (442) तीसरे स्थान पर है. इसके बाद महाराष्ट्र (312) व तमिलनाडु (214) का नंबर आता है. वहीं अगर 2014 की बात की जाए तो कर्नाटक 406 बाघों के साथ नंबर एक पर व मध्यप्रदेश 308 बाघों के साथ नंबर दो पर था.

उत्तराखंड के जिम कॉर्बेट में बाघों की संख्या क़रीब 250 गिनी गई है बाकि बाघ राजाजी नेशनल पार्क व अन्य पार्कों में गिने गए हैं. 442 का आँकड़ा उत्तराखंड के हिसाब से बहुत सुखद है.

2006 तक देश में बाघों की संख्या लगभग 1411 थी. जो 2010 तक आते-आते 5.22% की वृद्धि के साथ 1706 हुई. 2010 से 2014 के बीच बाघों की संख्या 7.62% की बढ़ोत्तरी के साथ लगभग 2226 पहुँची. 2014 से 2018 के बीच सबसे ज़्यादा 8.32% की वृद्धि के साथ बाघों की संख्या अब लगभग 2967 पहुँच गई है.

बाघों की बढ़ती संख्या के साथ ही शिकारियों के हौसले भी बढ़ने लगे होंगे. देश में सबसे ज़्यादा बाघ अवैध शिकार की वजह से मारे गए और बाघों की जमकर कालाबाज़ारी की गई. अवैध शिकार के साथ ही जंगलों के कटाव व प्राकृतिक आपदाओं की वजह से भी बाघों की संख्या में कमी देखी गई है. हाल ही में असम की बाढ़ से प्रभावित एक बाघ को जान बचाने के लिए किसी के घर के बेडरूम में शरण लेनी पड़ी. असम में ही कई गैंडों को अपनी जान बचाने के लिए एक टीले में शरण लेते देखा गया.

बाघों का संरक्षण सिर्फ सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है बल्कि हर नागरिक की ज़िम्मेदारी है. आप कहेंगे कि आख़िर हम बाघों का संरक्षण कैसे करें? बाघ पालने लगें क्या? जी नही! आपको बाघ नहीं पालने हैं लेकिन बाघों के घर यानि जंगल को सुरक्षित रखना है. पेड़ काटने की जगह पेड़ लगाने हैं. अवैध कटान को रोकना है और सूचना जंगलायत को देनी है. अपने घर की चाहत में बाघों के घर में नहीं घुसना है. शिकारियों पर नज़र रखनी है और अवैध व्यापार कोई करता है तो उसकी तुरंत शिकायत करनी है. कोई बाघ ग़लती से आबादी क्षेत्र में आ जाए तो उसे मारने की जगह उसकी सूचना फ़ॉरेस्ट विभाग को देनी है और उसके रेस्क्यू में मदद करनी है.

नानकमत्ता (ऊधम सिंह नगर) के रहने वाले कमलेश जोशी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक व भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्ध संस्थान (IITTM), ग्वालियर से MBA किया है. वर्तमान में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग में शोध छात्र हैं.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Girish Lohani

Recent Posts

पहाड़ का वह बूढ़ा पिता

पहाड़ के एक छोटे-से गाँव में एक पिता रहता था. उम्र अब ढलने लगी थी,…

6 days ago

कुमाऊं में रामलीला की परम्परा

सांस्कृतिक परम्परा की दृष्टि से उत्तराखण्ड एक समृद्ध राज्य है. समय-समय पर यहां के कई…

1 week ago

‘पायर’ फिल्म के सुलगते सवाल…

जाने-माने पत्रकार, साहित्यकार और फिल्म निर्देशक विनोद कापड़ी से कल शाम मुलाकात हुई. दरअसल,उनके निर्देशन में…

1 week ago

हुक्का क्लब अल्मोड़ा की रामलीला से एक्सक्लूसिव तस्वीरें

उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी अल्मोड़ा के मुख्य आकर्षण में से एक रामलीला का मंचन इन…

1 week ago

‘पायर’ पहाड़ की ठोस पीठ है

लोग इसे पहाड़ और पलायन की कहानी की तरह देखेंगे. लोग इसे खंडहर होते जा…

2 weeks ago

धन सिंह राणा ‘संघर्षनामा’

पिछली कड़ी : सागर से शिखर तक : स्वामी मन्मथन संघर्षनामा का ये किस्सा आजादी…

2 weeks ago