कायनात की तमाम साज़िशों के बावजूद गणित’ज्ञ’ नहीं हो सके हम. ‘क’ पर ही निपट लिया मामला. उतनी ही गणित सीख सके जितनी बाज़ार से सौदा सुलुफ लाने में काम आ सके. आज भी कोई बच्चा अगर किताब लिए हमारी तरफ बढ़ता है तो नास्तिक मन भी प्रार्थना में जुट जाता है कि सवाल गणित का न हो. लट्ठे की लम्बाई जानने वाले सवाल पर तो आज भी दिल सूख कर लट्ठा हो जाता है. पांचवीं में था ये बवाल. इस सवाल की याद इसलिए क्योंकि इसके बाद का कोई सवाल उसी शक्ल में मुझे याद नहीं जिस शक्ल में वो हमारे सामने उपस्थित हुआ था.
मुझे तो वो डरावनी रातें आज भी हॉन्ट करती हैं जब लाइट जाने के बाद चल रही सुरीली अंताक्षरी, नुकीली पहेलियों के रास्ते पथरीले पहाड़ों में घुस जाती थी. हमारे बड़े भाई साहब, प्रेमचंद की कहानी से उलट कतई ज़हीन, गणित के सर्गेई बुबका थे. अपनी ही बनाई पहेलियां तोड़ते रहते. हमसे किताब के सवाल हल न होते और वो चलते-चलते सवाल बना लेते. हमारी तो दांतों तले उंगली क्या पूरी हथेली आ जाती. आश्चर्य किवां डर की वजह से कि कहीं सवाल का पोल इधर न चुभा दें. कहा न बुबका थे, अपना ही रिकॉर्ड तोड़ते रहते. हम बचने के लिए वॉल्ट ढूंढते. तारने आतीं छोटकी दीदी. वो भी गणित की कुछ थीं मतलब. रिश्तेदार विश्तेदार. हमें बचाती ज़रूर पर सशर्त. बदले में पहाड़ा रटना पड़ेगा. उस उम्र में ही हम पर ये राज़ खुल चुका था कि पहाड़ा, पहाड़ से डिराईव हुआ शब्द है, जिसके दोनों तरफ ढलान है. हम एक तरफ से हांफते हुए चढ़ते दूसरी तरफ से लुढ़क जाते. दीदी का हमें कुछ बताना दरअसल पूछना हुआ करता था.
आठ छंग बहत्तर तो तेरह सत्ते केतना
हम इठला के कहते ‘ई चालाकी… अपने को तो आठ का सरल वाला हमको तेरह का’
तो वो सेकेंड के पांचवें हिस्से में ही पहेली बदल देती
सतरह पचे पचासी तो बारह नवईयाँ
बमुश्किल अगर उत्तर जान पाते तो भी `एकोठाठ’ जैसा कुछ निकलता मुंह से और इलहाम होता कि गणित में हाथ ही नहीं ज़ुबान भी तंग है. इसी तंग ज़ुबानी में वैवाहिक जीवन में प्रवेश करें आप और पता चले कि पत्नी भी गणित की विशेषज्ञ है तो समझिये आसमान से टपके और वहीं, उसी लट्ठे पर अटके. आप ए प्लस बी का होल स्क्वायर करते रहिये आपका एक्स्ट्रा टू ए बी निकल जाता है.
बचपन में किसी तरह खींचते-धकियाते इन पहाड़ों घाटियों से निकल ही रहे थे कि जीवन में उनकी एंट्री हुई जिनकी वजह से गणित के साथ हमारी लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप, डाइवोर्स के कगार पर आ लगी. सरजूडा! सरजू राम प्रजापति उर्फ़ सरजूडा. आठवीं और उसके बाद के हमारे गणित के मास्टर साहब. काक चेष्टा, बको ध्यानम वाले उत्तम छात्र के लक्षणों में गुरु का नामकरण करना भी छटवें गुण के रूप में शामिल था, जिसे बाद में किसी ने साजिशन हटा दिया था. अब फिर से आ गया है सिलेबस में. तो उसी लक्षण की पूर्ती के लिए फिल्म `कर्ज़’ के खतरनाक विलेन की तर्ज पर सरजू राम प्रजापति का नाम `सरजूडा’ कर दिया गया था.
गठीले बदन और उतने ही गठीले चेहरे वाले हमारे सरजूडा फ़िल्मी सरजूडा की तरह गूंगे तो नहीं थे, पर बड़ी सिनेमाई किस्म की एक एक्स्ट्रा पन्नी ओढ़े रहते गम्भीरता की. हमारी कल्पना में तो वो गिलास पर टन टना टन बजा कर ही बोलते जिसे कल्पना के मैक मोहन हमारे लिए डीकोडिफाई करते `सरजूडा ये कहना चाहते हैं…’ उन्हें हंसते देखना अरवी की सब्जी में स्वाद मिल जाने के बराबर था. उन्नत ललाट पर एक लहरदार छोटी सी लट ही इकलौती चीज़ थी जो ज़रा कोमल भावोत्पादक थी उनके शरीर में. बकिया सब बड़ा तीखा. आवाज़, अंदाज़, अल्फाज़ सब. सबसे तीखी तो थीं मूंछें. इतनी बारीक कि सेमी क्लीन शेव कह सकते हैं. ऐसा लगता कि जैसे शेव करते वक्त उनसे होठों ने कहा हो ये मोटा कम्बल हटा दो एक पतली सूती चादर डाल दो बस.
गुरु-शिष्य परम्परा के ध्वज और ध्वज लगाने वाला डंडा वाहक सरजूडा, बताते कम पूछते ज़्यादा थे. कक्षा में प्रवेश करते ही थे कुछ पूछते हुए. `अरे शैलेन्द्र अपनी सीट पर जाने का कुछ लोगे? हैं भई? बताओ, हैं?’ कक्षा से जाते भी पूछते ही जाते `कौन-कौन ऐसा है जो दिया सवाल नहीं कर पाएगा? हैं भई? बताओ, हैं?’ दौराने कक्षा तो खैर! पाठ के आखिर में दिए सवालों के अतिरिक्त बाईस बटे सात गुना सवाल करते. मारते तभी थे जब मारने का कारण स्थूल रूप में उपस्थित हो. जैसे सवाल न बता पा रहे हों छात्र, गृह कार्य न करके आएं हों छात्र, कॉपी लाना भूल गए हों छात्र. छात्र यहाँ स्थूल कारण हैं. यहाँ बहुवचन का प्रयोग व्याकरण की गलती नहीं है. उनकी मारक क्षमता की वजह से है. बस कोई एक स्थूल कारण अपने अवयवों के साथ उपस्थित होता और वो दस बजे की लाइन से दो बजे की लाइन के बीच में पड़ने वाले सारे कारणों को निपटा देते. दो बजे की लाइन के आगे छात्राएं बैठती थीं और दस बजे की लाइन के पहले छात्राओं के जैसे सुगढ़ छात्र. जिन्हें सब आता है. गणित जैसी वायवीय चीज़ भी.
हमारे लिए तो पाठ में दिए सवाल ही बाउंसर होते थे. ये अतिरिक्त सवाल स्लॉग ओवर के यॉर्कर के जैसे पड़ते. हमें हवा ही न लगती और स्टम्प छटक के दूर धूल चाटते नज़र आते. ब्लैक बोर्ड पर सवाल लिख देते फिर उंगली के इशारे से छात्रों को खड़ा होने को कहते. सफेद चॉक से लिखे वाले हिस्से पर ब्लैक बोर्ड हमें ज़्यादा ब्लैक दिखाई देता. पहले पहल तो पूर्ण कृष्णिका. सब सोख लेने वाला. हमारी निगाह सवाल पर पड़ती और वहीं जम के रह जाती. `तेरे चेहरे से नज़र नहीं हटती नज़ारे हम क्या देखें’ गाना हमारे लिए ही बनाया गया जान पड़ता था. हमारी काली किस्मत यही नज़ारे लिखे थे! फिर हमने कनखी निगाह से निखिल की कॉपी में झांकने की अदा विकसित की. अब मिसइंटरप्रेट हो गए. सिली पॉइंट पर धर लिए गए क्योंकि निखिल के दाहिने लड़कियों की लाइन थी. उसके बाद पूछने की कवायद ईजाद की. पूछना भी ऐसे कि लगे कि बता रहे हों. `इसका उत्तर तो सत्ताईस मिनट होगा न.’ जिस तरह के छेद गणित ने हमारे ईमान पर किये हैं उतना महीन काम तो घूस के पैसे भी न कर सके.
ये तरीका भी कारगर न रहा तो उन सवाली बाउंसर्स के लिए हमने हुक शॉट ईजाद कर लिया. डाइरेक्ट. सवाल पड़ते ही बाउंड्री के पार. उत्तरमाला! किताब का सबसे हसीन और डरावना भाग. जी हाँ दोनों. डरावना इसलिए क्योंकि किसी प्रश्न को हल कर जब हम बाईं हथेली से प्रश्न पृष्ठ दाबे दाहिनी की तर्जनी से अतिशय महीन फॉन्ट में खुदे उत्तर का मिलान करते तो हमारी समझ में ये नहीं आता कि जिस सवाल में हम उत्तर, जीरो के बाद दशमलव के तीन अंको में लाते उसमें बारह के आगे चार सुन्ने क्यों लिखे मिलते. ठीक से अध्याय मिलाते हुए जिस प्रश्न के उत्तर में हमारा हिसाब पूर्ण अंक में होता वहां पाई जैसा कुछ लिखा मिलता. हद तो तब हो जाती जब हम उत्तर, मीटर प्रति सेकेंड में निकालते और वहां उत्तर में पैतालीस डिग्री जैसा कुछ लिखा मिलता. फिर वो हुक शॉट वाला फार्मूला ईजाद किया गया और उत्तरमाला हसीं होने लगा हमारे लिए. उत्तर से प्रश्न तक पहुँचने का फार्मूला. स्टम्प के पीछे छक्का मारने का ये तरीका हमने विवियन रिचर्ड की बैटिंग से प्रेरित होकर बनाया था. इससे सवाल हल तो नहीं होता, `लह’ जाता था. इसी तरह से लहा-लहा के बड़े कारनामे किये हमने. इससे गणित तो आनी न थी, न आई पर बड़ा क्रिएटिव सैटिसफैक्शन मिला. वो भी बड़ी चीज़ है. सरकारी नौकरी में आने के बाद इसका महत्व ज़्यादा समझ में आया.
`बहुत काम आएगा गणित आगे जीवन में’ कहते थे सरजूडा. इतने शुष्क थे कि उनकी भाषा भी पुल्लिंग होता था, बोली तो बोली न होकर बोला होता था. जब वो थोड़े दार्शनिक मूड में होते, और अमूमन वो उस दिन होते जब सुबह की प्रार्थना में समय पर न पहुँच पाते, तो कहते `गैलीलियो कहता है प्रकृति का किताब गणित की भाषा में लिखा हुआ है!’
इस वाक्य को सुनने के बाद, अब क्या छुपाएँ आपसे, हम पेड़-पौधों, पत्थरों-ढेलों से भी खौफज़दा रहने लगे महीनो तक. बड़े डरते-डरते कंकड़ पर पैर मारते कि जाने कौन सा पन्ना किताब का मुड़ा-तुड़ा घुसा हो इसमें और गणित के जाने किस सवाल से साबका हो जाए. पर आज हम रोजमर्रा के कामों में जब गणित का सदुपयोग देखते हैं, तो बड़ी खुशी मिलती है. जैसे तिरसठ मिली लीटर दाल में नौ औंस नमक डालने से स्वाद आता है. या ये चुटकी में डिसाइड कर लेना कि बाइस किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दाहिने से आती हुई बाइक और चालीस किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से बाएँ से आती हुई कार के बीच से सड़क पार करने में पैदल चलना ठीक रहेगा या दौड़ना पड़ेगा. या ये सोच लेने में कि दस फुट ऊंची छत से गिर रहे पंखे से बचने के लिए किस गति से बाईं ओर को छलांग मारी जाए. खरीदारी का सामान और अपने पास उपलब्ध रुपयों का हिसाब भी हम लघुत्तम-महत्तम समापवर्त्य निकाल कर आसानी से कर लेते हैं. कितनी लौकियाँ खरीदें कि इतने रू. बच जाए कि हम अधिकतम प्याज़ खरीद सकें. हम तो प्रत्येक दस रू दाम बढ़ोत्तरी पर दो फांकें कम कर देते हैं प्याज की. अनुपात यू नो. फिर एक दिन ऐसा भी आया कि छिलके-छिलके से सलाद बनने लगा. स्वाद गया पर गणित रह गयी अपने पास.
जिस दिन दार्शनिक होते सरजी उस दिन बड़ी दार्शनिक पिटाई होती हमारी. उस दिन वो न किताब में देख रहे होते न ब्लैक बोर्ड पर. उनके हाथों में न चाक होती न डस्टर. उनके कदम न क्लास में जा रहे दिखते न आ रहे. जाने किस निर्देशांक में टंगी निगाह, कदम और हाथ के सम्मिलित प्रयास से वो, वो वाले प्रश्न पूछते जो न लडकियों को आते न लड़कों को और न ही लडकियों जैसे लड़कों को. फिर हम लाइन बनाकर उनके आगे से गुजरते जाते और हमारी पीठ, कान और गाल पर तीन ताल के ठेके पड़ते जाते. पट्ट… चुईं… घम्म… पट्ट… चुईं… घम्म… पट्ट… चुईं… घम्म! सारे द्वैत मिट जाते उस दिन.
हम अक्सर इस बात को लेकर खासे बहस तलब रहते कि सुबह के टाइम क्यों करते हैं सरजूडा ट्यूशन. लेट हो जाते हैं, बड़ी मैडम उर्फ़ प्रिंसीपल की डांट खाते हैं, दार्शनिक हो जाते हैं और फिर पट्ट… चुईं… घम्म!
`हम बताएं सरजूडा काहें सुबहिये के टाइम ट्यूशन लेते हैं’ रंजीत की आँखें चमक रही थीं उस दिन. हम न भी पूछते तो भी वो बताता. `क्योंकि शाम को इनके पास समइए नहीं है.’ हम आगे न भी पूछते तो भी…. `बताएं क्या… चलो दिखा देते हैं, कौन-कौन देखना चाहता है?’
दुखी लोगों के रोस्टर में हमारा नाम सबसे ऊपर था सो हम तो गए ही. तीन और दोस्त साथ हो लिए. रंजीत का एक दोस्त था. शहर के एक बड़े सुनार का लड़का. स्कूल से छूटकर हम सीधे उसके घर गए. पुरानी बड़ी तिनमंजिला कोठी थी उसकी. उसी में नीचे दुकान. हम अन्दर दोस्त के कमरे में बैठे. वहां से वो कोठरी दिखती थी जिसमें कुछ खुलासा होने को था. थोड़ी ही देर में हुआ भी.
जो दिखा वो अकल्पनीय था. सरजूडा ज़मीन पर बिछे बिना जाजिम के गद्दे पर बैठे हुए थे. उनके आगे एक छोटी मेज़ रक्खी थी. कमरे में एक पीला बल्ब जल रहा था. झुके हुए थे कुछ बही खातों पर सरजूडा. हिसाब लगाते हुए. उनकी परछाईं आधा रजिस्टर घेरे हुए थी. दुकान का नौकर कनसुग्गवा बाहर दुकान से ला-लाकर कागज़ उनके आगे पटकता जा रहा था. अभी-अभी दुकान की ओर जाते हुए उसने कहा था `मालिक कहत हैन आज भगिह जिन, दिवाली के पहिले क कुल निपटाय दिह तबै जाई क मिली… अबै और बा’
`जी पर मुझे आज बच्चे की दवाई लेने…’ सरजूडा उन्हें जी लगा कर बात कर रहे थे. वो गिलास बजाकर कह नहीं रहे थे.., सरजूडा ये कहना चाहते हैं… बल्कि सुन रहे थे. कमरे में हमें कोई मैक मोहन भी नहीं दिख रहा था. `काहें तनखा कटवावे प तुला हय…?’ कनसुग्गा दरवाज़े पर रूककर धीमी आवाज़ में बोल रहा था… `जी ठीक है… लाइए’ सरजूडा बही खाते पर और झुक गए थे. उनकी परछाईं कागजों का घेरा तोड़कर उनके मुड़े हुए दाहिनी जांघ पर बैठ गयी थी.
समय के साथ ऊंचे उठते आर्थिक आवश्यकताओं के लट्ठ के बरक्स झुकते जाते थे सरजूडा. उसी अनुपात में. उनकी परछाई की लम्बाई आंककर उनकी ज़रूरतों की लम्बाई मापी जा सकती थी. गणित वाकई उनके काम आ रहा था. बुक ऑफ़ हिज़ नेचर वाज़ रियली रिटेन इन दि लैंग्वेज़ ऑफ़ मैथेमैटिक्स…
अमित श्रीवास्तव. उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं. 6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता) और पहला दखल (संस्मरण) .
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